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कोरोना: तीसरी लहर के डर के बीच क्या ये स्कूल खोलने का सही वक़्त है?

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कह चुके हैं कि जब तक राज्य में पूरी आबादी को वैक्सीन नहीं लग जाती, तब तक स्कूल नहीं खुलेंगे.

लेकिन अरविंद केजरीवाल के इस फ़ैसले को अब स्वास्थ्य विशेषज्ञ चुनौती दे रहे हैं.

मंगलवार को भारत में हुए चौथे देशव्यापी सीरो सर्वे में पता चला है कि 6 से 9 साल के 57 फ़ीसदी बच्चों में एंटीबॉडी मिली है. वहीं 10 से 17 साल के 62 फ़ीसदी बच्चों में एंटीबॉडी मिली है.

इस आधार पर तर्क दिया जा रहा है कि अब भारत में प्राइमरी क्लास के बच्चों के लिए स्कूल खोले जा सकते हैं.

ग़ौरतलब है कि भारत में ज़्यादातर राज्यों में प्राइमरी स्कूल पिछले साल मार्च से ही बंद हैं. 9वीं-12वीं कक्षा के छात्रों के लिए किसी-किसी राज्य ने थोड़ी छूट दी थी, लेकिन प्राइमरी कक्षा के छात्रों को वो मौक़ा पिछले डेढ़ साल से नहीं मिला है.

तीसरी लहर के डर के बीच, आईसीएमआर के सीरो सर्वे की जानकारी अभिभावकों की तरफ़ से मिली-जुली प्रतिक्रिया लेकर आई है.

कुछ अभिभावकों के मन में अब भी शंका है.

स्कूल खोलने के मुद्दे पर लोकल सर्कल्स नाम के कम्युनिटी सोशल प्लेटफ़ॉर्म ने भारत के 19 हज़ार अभिभावकों पर एक सर्वे किया था. जून में हुए इस सर्वे में 76 फ़ीसदी अभिभावकों ने कहा कि वो अपने बच्चों को स्कूल तब तक नहीं भेजना चाहते, जब तक उनको वैक्सीन न लग जाए या कोविड 19 बीमारी के मामले उनके इलाक़े में शून्य तक न पहुंच जाएं.

ऐसे में ये जानना दिलचस्प है कि किस आधार पर स्वास्थ्य विशेषज्ञ प्राइमरी स्कूल खोलने का तर्क दे रहे हैं.

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स्कूल खोलने के पीछे क्या हैं तर्क

बीबीसी ने इस बारे में बात की भारत के जाने माने जन-नीति और स्वास्थ्य तंत्र विशेषज्ञ डॉक्टर चंद्रकांत लहरिया से.

हाल ही में कोरोना महामारी पर आई किताब 'टिल वी विन: इंडियाज़ फ़ाइट अगेंस्ट कोविड-19 पैन्डेमिक' के वो सह-लेखक भी हैं.

डॉक्टर लहरिया की मानें, तो स्कूल खोलने की शुरुआत प्राइमरी क्लास से करने की ज़रूरत है.

वो अपने बयान के पीछे कई तर्क देते हैं.

  • महामारी के दौरान विश्व के कई देशों ने प्राइमरी क्लास के बच्चों के लिए स्कूल खोले रखा, वहां बच्चों को महामारी से ज़्यादा ख़तरा नहीं हुआ.
  • आज भी विश्व के 170 देशों में स्कूल खुले हुए हैं.
  • बच्चों में कोविड 19 का इंफेक्शन ज़रूर होता है, लेकिन बीमारी गंभीर रूप नहीं लेती है. कुछ स्टडी ऐसी भी आई हैं, जिनमें पता चला है कि बच्चों को कोविड 19 के मुक़ाबले ज़्यादा ख़तरा सीज़नल फ़्लू की वजह से है.
  • अमेरिका की संस्था सेंटर फ़ॉर डिजीज़ कंट्रोल (सीडीसी) ने इसी साल फ़रवरी में कहा था कि टीचर्स को वैक्सीन लगाना स्कूल खोलने की पहली शर्त नहीं होनी चाहिए.
  • वैक्सीन अभी दुनिया के किसी देश में 11 साल से कम उम्र के बच्चों को नहीं लगाई जा रही है. न ही इसके लिए लाइसेंस की प्रक्रिया शुरू हुई है. यानी प्रक्रिया आज शुरू भी होगी तो एक साल से पहले 11 साल तक के बच्चों के लिए उपलब्ध नहीं होगी.
  • बच्चों की वैक्सीन के बारे में अभी ये पुख़्ता तौर पर पता भी नहीं है कि कोविड 19 से लड़ने के लिए वैक्सीन की ज़रूरत है भी या नहीं.

इतना ही नहीं, दिल्ली के कुछ स्लम क्लस्टर में बच्चों में 80-90 फ़ीसदी एंटीबॉडी पाई गई है. राष्ट्रीय स्तर पर भी ये आंकड़े 55-60 फ़ीसदी के बीच हैं.

ये वो वैज्ञानिक तर्क हैं जिनके आधार पर स्वास्थ्य विशेषज्ञ दावा कर रहे हैं कि प्राइमरी क्लास के बच्चों के लिए स्कूल खोलने का भारत में सही वक़्त आ गया है.

उनका कहना है कि 9-12वीं के बच्चों के लिए पहले स्कूल खोलने का तर्क वैज्ञानिक आधार पर सही नहीं है. शुरुआत प्री प्राइमरी, प्राइमरी और मिडिल स्कूल से बच्चों से की जानी चाहिए क्योंकि वहाँ ख़तरा कम है.

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राज्यों में स्कूल खोलने की स्थिति

एक तरफ़ जहाँ स्वास्थ्य विशेषज्ञ सेकेंडरी स्कूलों को बाद में और प्राइमरी स्कूलों को पहले खोलने की बात कर रहे हैं, वहीं राज्य सरकारें इसके उलट दिशा निर्देश जारी कर रही हैं.

स्कूली शिक्षा राज्यों का विषय है. इस वजह से भारत में अलग-अलग राज्यों में स्कूल बंद रखने को लेकर अलग-अलग स्थिति है. जैसे:-

  • झारखंड, असम, राजस्थान, दिल्ली, जम्मू कश्मीर, तमिलनाडु, तेलंगाना में स्कूल पूरी तरह से बंद हैं.
  • उत्तराखंड में शिक्षकों के लिए स्कूल खुले हैं और छात्रों के लिए बंद हैं. उत्तर प्रदेश में भी फ़िलहाल सब बंद हैं. केवल सेकेंडरी स्कूल के दफ़्तर खुले हैं.
  • मध्यप्रदेश में 11वीं और 12वीं की कक्षाएं 26 जुलाई से लगनी शुरू हो जाएंगी. इसकी घोषणा पिछले सप्ताह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने की है. वहीं कक्षा 9वीं और 10वीं की कक्षाएँ 5 अगस्त से शुरू की जाएंगी. मुख्यमंत्री ने एलान किया है कि पहले 50 फ़ीसदी उपस्थिति से स्कूल शुरू किए जाएं.
  • बिहार में 7 जुलाई से 11वीं और 12वीं की कक्षाएं, 50 फ़ीसदी उपस्थिति के साथ शुरू हैं. सरकारी सूचना के मुताबिक़ अगले महीने 6 अगस्त तक ये ऐसे ही जारी रहेगा.
  • गुजरात में भी 11वीं 12वीं के स्कूल खुल चुके हैं.
  • पंजाब में 10वीं से 12वीं के लिए स्कूल 26 जुलाई से खुलेंगे. शर्त ये रखी गई है कि टीचर्स और स्टाफ़ दोनों टीके लगवा चुके हों.
  • हरियाणा में 9वीं से 12वीं के स्कूल 16 जुलाई से खुल चुके हैं और 6 से 8वीं तक के स्कूल 23 जुलाई से खुलेंगे.

ऐसे में एक डर माता-पिता के अंदर तीसरी लहर का भी है, जिसमें 40 फ़ीसदी आबादी के लिए कोरोना का ख़तरा अब भी माना जा रहा है. आख़िर उसका क्या?

डॉक्टर लहरिया कहते हैं कि फ़ैसला आख़िरकार अभिभावकों को ही लेना है, कि वो बच्चों को स्कूल भेजेंगे या नहीं. हम वैज्ञानिक आधार ही बता सकते हैं.

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स्कूल न जाने से बच्चों पर असर

एम्स के डायरेक्टर रणदीप गुलेरिया ने एक निजी टेलीविज़न चैनल इंडिया टुडे से बातचीत में कहा कि उनके ख़्याल से स्कूलों को खोलने के प्लान पर अब विचार करना चाहिए.

इसके पीछे उन्होंने कई तर्क भी गिनाए हैं. जैसे:-

बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के लिए ही नहीं, बल्कि उनके सर्वांगीण विकास के लिए ये बेहद ज़रूरी है.

स्कूलों में मिलने वाली मिड-डे मील योजना से बहुत से बच्चों का पेट भरता है.

डिजिटल डिवाइड की वजह से कई ग़रीब बच्चे ऑनलाइन क्लास नहीं कर पा रहे हैं. कई बच्चे इस वजह से स्कूल सिस्टम से निकल चुके हैं, वैसे बच्चों के लिए स्कूल जाकर पढ़ाई करना समय की मांग है.

रणदीप गुलेरिया भारत सरकार की तरफ़ से बनाई गई टास्क फ़ोर्स के सदस्य भी हैं. ऐसे में उनकी इस राय को सरकार की राय से जोड़ कर देखा जा रहा है.

'प्रथम' एनजीओ फ़ाउंडेशन की सीईओ रुक्मिणी बनर्जी प्राइमरी शिक्षा क्षेत्र से जुड़ी हैं. बीबीसी से बातचीत में वो कहती हैं, "बच्चे स्कूल केवल पढ़ाई के लिए नहीं जाते. बच्चों का स्कूल जाना सोशल और इमोशनल ग्रोथ के लिए भी ज़रूरी होता है. अपने घर-परिवार से दूर रह कर अपने उम्र के दोस्तो और बच्चों के साथ कैसे रहना होता है, बच्चा स्कूल में ये भी सीखता है."

"प्रथम की ओर से तैयार की गई 'असर 2018' की रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण भारत में लगभग 70 फ़ीसदी बच्चे अपनी कक्षा के स्तर से पीछे हैं. उदाहरण के तौर पर तीसरी में पढ़ने वाले बच्चे पिछले डेढ़ साल से स्कूल नहीं गए हैं. उनको तीसरी का पाठ्यक्रम अब देना सही नहीं होगा. बच्चों के 'लर्निंग आउटकम लेवल' को देख कर आज की पढ़ाई शुरू करनी होगी. बच्चों में 'लर्निंग लॉस' ज़रूर हुआ होगा, लेकिनआज हमें 'लर्निंग गेन' की तैयारी करनी होगी."

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स्कूल खोलने के लिए प्लान ज़रूरी

हालांकि रणदीप गुलेरिया एक प्लान के तहत ही राज्यों को स्कूल खोलने की सलाह देते है. इसी तरह की सलाह आईसीएमआर के डीजी बलराम भार्गव भी देते हैं.

उनके मुताबिक़ बच्चे जवान लोगों से ज़्यादा बेहतर तरीक़े से कोविड 19 के वायरल लोड को संभाल पाते हैं.

हालांकि उन्होंने आगाह ये भी किया कि स्कूल खोलने के पहले कुछ बातों का ध्यान रखा जाए. जैसे :-

•पहले प्राइमरी स्कूल से शुरुआत की जाए, फिर सेकेंडरी स्कूलों के बारे में सोचा जाए.

•स्कूल के सपोर्टिंग और रेगुलर स्टाफ़ को वैक्सीन पहले से लगा दी जाए.

•जिन इलाक़ों में पॉज़िटिविटी रेट कम है, उन्हीं इलाक़ों में प्राइमरी स्कूल खोलने से शुरुआत की जा सकती है.

•इसके लिए क्लास रूम में ज़रूरी बदलाव करना होगा.

•क्लास में वेंटिलेशन अच्छा होना चाहिए.

•कुछ बच्चों को एक दिन और कुछ बच्चों को दूसरे दिन बुलाने पर भी विचार किया जा सकता है.

•हफ़्ते में एक से दो दिन के क्लास पर भी विचार किया जा सकता है.

बलराम भार्गव ने स्कैन्डिनेवियाई देशों और यूरोप के दूसरे देशों का उदाहरण भी दिया, जहाँ स्कूल कोरोना के किसी भी लहर में बंद नहीं हुए.

स्वीडन, फ़्रांस, नीदरलैंड्स और कुछ हद तक सिंगापुर वो देश है, जहाँ बच्चों को स्कूल भेजने के लिए कई तरह के बदलाव किए, लेकिन स्कूल बंद नहीं किए गए. भारत उन देशों से इस मामले में सीख सकता हैं.

यहां एक बात ध्यान देने वाली है कि भारत की तुलना इन देशों से नहीं की जा सकती, इस वजह से अपनी आबादी और स्कूलों को ध्यान में रख कर ही क़दम उठाने की ज़रूरत है.

https://www.youtube.com/watch?v=Ij3cEJwvVjg

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