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कोरोना वायरस: बैन के बावजूद कैसे मिल रहा है पान मसाला और गुटखा?

कोरोना वायरस
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कोरोना वायरस

"पान मसाला और गुटखा पर प्रतिबंध लगा है, दुकानें बंद हैं इसलिए पान की भी किल्लत है लेकिन ऐसा नहीं है कि जो पान और पान मसाला खाने वाले हैं उन्हें अभी तक कोई ख़ास दिक़्क़त हुई हो. जहां चाह है, वहां राह है. जो खाने का शौक़ीन है, वो ढूंढ़ ही ले रहे हैं."

प्रयागराज में रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता और कांग्रेस पार्टी के नेता अभय अवस्थी यह जवाब मेरे इस सवाल पर देते हैं कि आख़िर पान मसाले के शौक़ीन लोग इसे बिना खाए दिन कैसे बिता रहे हैं.

कांग्रेस पार्टी के नेता अभय अवस्थी

देश भर में लॉकडाउन के तुरंत बाद ही यानी 25 मार्च को उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य में पान-मसाला और गुटखा बनाने, उसके वितरण करने और उसकी बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया. यह आदेश जारी करते वक़्त कहा गया कि पान मसाला खाकर थूंकने और पान मसाले के पाउच के उपयोग से भी कोरोना वायरस के संक्रमण की आशंका रहती है.

पान, गुटखा, पान मसाला, तंबाकू जैसी नशीली वस्तुओं का उत्तर प्रदेश में न सिर्फ़ सेवन आम है बल्कि पान मसालों के उत्पादन में भी यह राज्य अग्रणी है और पान मसाला बनाने वाली ज़्यादातर फ़ैक्ट्रियां उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों में हैं. राजधानी लखनऊ और कानपुर में पान मसाले की खपत ख़ासतौर पर काफ़ी ज़्यादा है.

दूसरे शहरों में भी पान मसाला को लोग बड़े शौक से खाते हैं. साथ ही पान और तंबाकू का भी यहां बड़ी संख्या में लोग शौक रखते हैं. लॉकडाउन होने से एक तो दुकानें बंद हैं और दूसरी ओर तंबाकू उत्पादों और पान मसाले जैसी चीजों के उत्पादन, सेवन और बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध है. ऐसे में इन चीजों के शौकीन लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है.

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काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर और ख़ुद पान खाने के शौक़ीन कौशल किशोर मिश्र कहते हैं, "जिस बनारस में पान के बिना जीवन की कल्पना करना मुश्किल है वहां के लोगों को भी कोरोना ने पान छोड़ने पर मजबूर कर दिया है. पान की सप्लाई बंद है. पान मसाला पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, अब लोगों को पत्ते वाली खैनी ही मिल पा रही है."

लेकिन बनारस में ही रहने वाले एक व्यवसायी राजेश केसरवानी कहते हैं कि प्रतिबंध भले ही लगा हो लेकिन लोग चोरी-छुपे इसे बेच भी रहे हैं और ख़रीद भी रहे हैं.

कुछ ऐसी ही बात प्रयागराज में अभय अवस्थी भी कहते हैं.

कानपुर में एक वरिष्ठ पत्रकार नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, "मैं 28 साल से पान मसाला खा रहा हूं. कॉलेज के दिनों में ही लत लग गई थी जो आज भी क़ायम है. लॉकडाउन में भी अभी तक मिल ही रहा है, आगे की देखी जाएगी."

कानपुर को पान मसालों का गढ़ माना जाता है. न सिर्फ़ उत्पादन में यह शहर अग्रणी है बल्कि पान मसाला के जो तमाम बड़े ब्रांड्स हैं, उनमें से कई यहीं पर हैं. इसके अलावा छोटे-मोटे स्तर पर भी कई पान मसाले का उत्पादन होता है.

पान मसाले के व्यवसाय से जुड़े राम नरेश बताते हैं कि अकेले कानपुर में क़रीब साठ लाख पाउच (छोटे पैकेट) मसाला लोग खाकर थूंक देते हैं. उनके मुताबिक़, सरकार को इससे हर महीने क़रीब 130 करोड़ के राजस्व की प्राप्ति होती है. एक अध्ययन के मुताबिक, भारत में पान मसाले का व्यवसाय क़रीब 42 हज़ार करोड़ रुपये का है और इसमें ज़्यादातर हिस्सा उत्तर प्रदेश का है.

लेकिन सवाल उठता है कि यदि पान मसाले के उत्पादन, बिक्री और सेवन पर सरकार ने प्रतिबंध लगा रखा है तो यह लोगों को मिल कैसे रहा है?

कानपुर में पान मसाले के एक बड़े ब्रांड से जुड़े रहे व्यवसायी विक्रम कोठारी कहते हैं कि उत्पादन तो बंद है लेकिन यदि लोगों को मिल रहा है तो जो पहले का स्टॉक रखा है, वही मिल रहा होगा. हालांकि पिछले दो हफ़्तों में कई दुकानों में छापेमारी हुई है और लाखों रुपये के पान मसाले ज़ब्त भी किए जा चुके हैं.

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पान मसालों की खपत न सिर्फ़ लखनऊ, कानपुर जैसे बड़े शहरों में है बल्कि गांवों और क़स्बों में भी इसके शौक़ीन लोगों की कमी नहीं है.

कानपुर में स्थानीय पत्रकार प्रवीण मोहता कहते हैं, "आमतौर पर पान मसाला पान की दुकानों पर मिलता है. ये दुकानें भले ही बंद हो गई हों लेकिन कुछ किराने की दुकानों पर भी लोग-चोरी छिपे बेच रहे हैं और पान की जो छोटी-मोटी दुकानें बंद हो गई हैं, वो दुकानदार भी छिटपुट तौर पर अपना वो स्टॉक बेच रहे हैं जो उनके पास रखा हुआ था. यही नहीं, ये सारी चीजें महंगे दामों पर बिक रही हैं और खाने वाले शौक़ से ख़रीद रहे हैं."

उत्तर प्रदेश में गुटखे पर पहले से ही प्रतिबंध लगा हुआ है और साल 2017 में बीजेपी सरकार बनने के बाद सरकारी दफ़्तरों में पान या पान मसाला खाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. बहुत से लोग ऐसे हैं जो पान मसाला तो नहीं खाते लेकिन पान खाने का शौक़ रखते हैं. उनके सामने दिक़्क़त ये है कि पान की सप्लाई बंद है और पान ऐसी चीज़ भी नहीं है जिसे स्टोर करके रखा जा सके.

अभय अवस्थी कहते हैं, "इलाहाबाद में तो पान के शौक़ीन लोग हर साल नौ अप्रैल को तांबूल दिवस मनाते हैं. यह पहली बार है कि तांबूल के अभाव में हम लोग तांबूल दिवस मना रहे हैं. हालांकि पान की दुकान वाले अपने ग्राहकों की विवशता समझ रहे हैं और कहीं न कहीं से पान की ज़रूरत पूरी कर रहे हैं. अब कैसे कर रहे हैं, ये वही बता सकते हैं."

लखनऊ के अलावा नोएडा और ग़ाज़ियाबाद में भी पान मसाले के अभाव में कुछ लोगों को दिक़्क़तों का सामना करना पड़ रहा है. हालांकि ये चीज़ें यहां भी लोगों को वैसे ही मिल रही हैं जैसे अन्य जगहों पर. ये अलग बात है कि दाम ज़्यादा देना पड़ रहा है.

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उत्तर प्रदेश में फ़ूड सेफ़्टी एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन विभाग के उपायुक्त वीके वर्मा ने बीबीसी को बताया, "सरकार पूरी तरह से निगरानी कर रही है. कई जगह छापेमारी भी हुई है और इनकी बिक्री करते हुए लोग पकड़े गए हैं. पुराने स्टॉक की लोग अवैध बिक्री भले ही कर ले रहे हों लेकिन उत्पादन पर पूरी तरह से रोक है."

पान मसाले पर प्रतिबंध की घोषणा करते वक़्त राज्य के अपर मुख्य सचिव अवनीश अवस्थी ने कहा था कि सरकार उन विकल्पों की भी तलाश कर रही है कि कैसे इन चीज़ों पर स्थाई प्रतिबंध लगाया जा सकता है. लेकिन नोएडा में एक टीवी चैनल में काम करने वाले वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, "इन पर स्थाई प्रतिबंध लगाना बड़ा मुश्किल है. पान मसाले पर प्रतिबंध लग जाएगा तो उसकी जगह पर वैसी ही कोई और चीज़ आ जाएगी. और पान पर तो प्रतिबंध लगा भी नहीं सकते हैं क्योंकि वो तो सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़ी हुई चीज़ है. सबसे बड़ी बात ये कि प्रतिबंध लगाकर लोगों को इनके सेवन से रोक पाना असंभव सा है."

लेकिन नोएडा की एक कंपनी में काम करने वाले सौरभ शर्मा कहते हैं कि लॉकडाउन के दौरान पान मसाला न मिलने के कारण उनकी आदत लगभग छूट गई है. वो कहते हैं, "मैं बनारस का रहने वाला हूं और मेरे घर में बचपन से ही सभी लोग पान खाते थे. कॉलेज में मेरी भी आदत पड़ गई लेकिन अब तो लगता है कि छूट ही जाएगी क्योंकि क़रीब दस दिन से मैंने मसाला बिल्कुल नहीं खाया है. कुछ दिन इलायची से काम चलाया और अब उसकी भी ज़रूरत नहीं पड़ रही है."

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