कला जगत को क्या झकझोर कर रख देगा कॉपीराइट का मुद्दा- दुनिया जहान
साहित्य और प्रकाशन की दुनिया में कॉपीराइट के नियम काफ़ी स्पष्ट हैं और लागू भी होते हैं लेकिन संगीत और फ़िल्मों में इस पर स्पष्टता की कमी दिखाई दी है. क्या आने वाले समय में यह बड़ा मुद्दा बनेगा.
कॉपीराइट का उल्लंघन या कहिए कला की नकल और चोरी - बीते कई दशकों से इस तरह के मामले संगीत और सिनेमा जगत में उठाए जाते रहे हैं.
फ़िल्मी संगीतकारों पर विदेशी गानों की धुन चुरा कर लोकप्रिय गाने बनाने के आरोप लगते रहे हैं. ऐसे किस्से हमने फ़िल्मों के बारे में भी सुने हैं कि हॉलीवुड की फ़िल्मों की कहानियों पर आधारित फ़िल्में बना ली जातीं थीं वो भी मूल लेखक या निर्माताओं को बिना कोई श्रेय दिए.
जब इस पर मीडिया में सवाल उठने लगे तो कुछ फ़िल्म निर्माताओं ने ढुलमुल तरीके से यूं श्रेय दिया कि उनकी फ़िल्म फ़लां-फ़लां फ़िल्म से 'प्रेरित' है.
लेकिन पिछले कुछ सालों से अब फ़िल्म निर्माता ना तो सिर्फ मूल लेखक या उसके निर्माता को पूरा श्रेय देते हैं बल्कि बाकायदा फ़ीस देकर उस फ़िल्म की कहानी के कॉपीराइट ख़रीद कर ही अपनी फ़िल्म बनाते हैं.
मिसाल के तौर पर हॉलीवुड की मशहूर फ़िल्म 'फॉरेस्ट गंप' पर आधारित आमिर ख़ान की फ़िल्म 'लाल सिंह चड्ढा' के निर्माताओं ने कॉपीराइट ख़रीद कर अपनी फ़िल्म बनाई.
संगीत की दुनिया में कॉपीराइट का मामला अभी भी विवाद का विषय बना हुआ है. लता मंगेशकर और आशा भोसले के मशहूर गानों में हल्के-फ़ुल्के फेरबदल करके कई गाने बने हैं जिन्हें रीमिक्स कहा जाता है. ऐसे गाने मशहूर भी होते हैं और रीमिक्स बनाने वाले इससे लाखों रुपये भी कमाते हैं.
एआर रहमान सहित कई संगीत कलाकारों ने इन रीमिक्स्ड गानों को भौंडा और अनैतिक बताते हुए कॉपीराइट के सवाल भी उठाए लेकिन इससे ज़मीनी स्तर पर कुछ ख़ास फर्क नहीं पड़ा.
साहित्य और प्रकाशन की दुनिया में कॉपीराइट के नियम काफ़ी स्पष्ट हैं और लागू भी होते हैं लेकिन संगीत और फ़िल्मों में इस पर स्पष्टता की कमी दिखाई दी है. मगर अब यह मुद्दा कला की दुनिया को भी झकझोरने को तैयार दिख रहा है.
अमेरिका के मशहूर कलाकार एंडी वारहोल की दो कलाकृतियों के कॉपीराइट से जुड़ा मामला अब अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है.
हम जानने की कोशिश करेंगे कि क्या कॉपीराइट का मुद्दा भविष्य में कलाकारों की सृजनात्मकताऔर कला को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर सकता है? क्या कला निर्माण के तरीकों को बदल सकता है?
लोकप्रियता की ज़िंदगी
अक्तूबर 2022 में संस्कृति को लेकर एक बहस छिड़ गई. मामला अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया.
इस विवाद के केंद्र में हैं संगीत जगत की एक सबसे जानी मानी हस्ती प्रिंस के दो पोट्रेट. इस विवाद को विस्तार से समझने के लिए बीबीसी ने बात की कला और सांस्कृतिक मामलों की स्वतंत्र पत्रकार एला फ़ेल्डमन से.
इस विवाद पर रोशनी डालते हुए उन्होंने कहा, "लिन गोल्डस्मिथ मशहूर फ़ोटोग्राफ़र हैं और उन्होंने कई मशहूर संगीत कलाकारों की तस्वीरें खींची हैं इसमें रोलिंगस्टोन, बॉब डायलन, माइकल जैक्सन और प्रिंस भी शामिल हैं."
"1981 में लिन गोल्डस्मिथ ने प्रिंस की कुछ तस्वीरें खींची और न्यूज़ वीक पत्रिका को यह कह कर छापने के लिए दी कि प्रिंस एक उभरते हुए संगीत कलाकार है जो भविष्य के सूपरस्टार हैं. कुछ तस्वीरें उन्होंने अपने स्टूडियो में खींची था और कुछ प्रिंस के संगीत कार्यक्रमों के दौरान खींची गयी थीं. न्यूज़वीक ने संगीत कार्यक्रमों की तस्वीर छाप दी."
तीन साल बाद लिन गोल्डस्मिथ की भविष्यवाणी सही साबित हुई और प्रिंस एक बहुत बड़े सुपरस्टार बन गए. वैनिटी फ़ेयर पत्रिका ने यह कहते हुए लिन गोल्डस्मिथ से प्रिंस का पोट्रेट मांगा कि उसके इलस्ट्रेशन अर्टिस्ट इलस्ट्रेशन मॉडल के लिए इसका इस्तेमाल करना चाहेंगे.
एला फ़ेल्डमन कहती हैं, "गोल्डस्मिथ नहीं जानती थीं कि वो इलेस्ट्र्शन आर्टिस्ट मशहूर कलाकार एंडी वारहोल के साथ काम करते हैं. ऐंडी वारहोल को पॉप आर्ट का जनक कहा जाता है जो 1960 के दशक में मशहूर हो गए थे और उन्होंने जानमानी अभिनेत्री मर्लिन मनरो के पोट्रेट की सैच्यूरेटेड रंगों से सिल्कक्रीन प्रिंट फ़ोटो बनाई थी जो बहुत मशहूर हो चुकी थी."
एंडी वारहोल का बनाया मर्लिन मुनरो का सिल्क स्क्रीन प्रिंट पोर्ट्रेट 2022 में 19.5 करोड़ डॉलर्स में बिका था जो बीसवीं सदी की सबसे मंहगी बिकने वाली पेंटिंग साबित हुई थी.
कहानी में नाटकीय मोड़
एला फ़ेल्डमन कहती हैं प्रिंस की तस्वीर के आधार पर बनाई गई अपनी पेंटिंग के बारे में एंडी वारहोल ने कहा था कि यह पेंटिंग यह दर्शाती है कि आम लोग मशहूर लोगों को कैसे देखते हैं उनसे कैसा बर्ताव करते हैं. गोल्डस्मिथ का कहना है कि वारहोल ने उनकी पंद्रह तस्वीरों का इस्तेमाल कर के अपनी पेंटिंग बनाई.
वो कहती हैं, "1987 में वारहोल की मौत के बाद उनके काम के सारे अधिकार एंडी वारहोल फ़ाउंडेशन के पास आ गये. 2016 में प्रिंस की मौत के बाद कोंडे नास्ट पत्रिका ने अपने अंक में प्रिंस को श्रद्धांजलि देने के लिए वारहोल फ़ाउंडेशन से प्रिंस की ओरेंज श्रृंखला पेंटिंग छापने की अनुमति मांगी और वारहोल फ़ांउडेशन ने दस हज़ार डॉलर की फ़ीस लेकर यह अनुमति दे दी. मगर इसमें लिन गोल्डस्मिथ पूरी तरह नदारद थीं."
लिन गोल्ड स्मिथ ने वैनिटी फ़ेयर को तस्वीर इस शर्त पर दी कि वो केवल एक बार 1994 के एक अंक में छापी जाएगी. इसके लिए उन्हें 400 डॉलर मिले और श्रेय भी मिला.
मगर बाद में वारहोल ने इस तस्वीर का इस्तेमाल अपनी कलाकृति के लिए किया और यहीं से कहानी में नाटकीय मोड़ आया. लिन गोल्डस्मिथ की मूल फ़ोटो ब्लैक एंड व्हाइट थी जिसे वारहोल ने अपनी पेंटिंग में सैच्यूरेटेड या गहरे धुले हुए नारंगी रंग में ढाल दिया था, कुछ और छोटे बदलाव भी किए थे.
एला फ़ेल्डमन का कहना है, "अगर आप दोनों तस्वीरों को आसपास रख कर देखें तो स्पष्ट होता है कि वारहोल ने गोल्डस्मिथ कि तस्वीर का इस्तेमाल किया था. क्योंकि वारहोल की पेंटिंग में प्रिंस के चेहरे पर वही भाव हैं जो गोल्डस्मिथ द्वारा खींची तस्वीर में थे."
"गोल्डस्मिथ को पहली बार यह पेंटिंग सोशल मीडिया पर दिखी तब उन्होंने वारहोल फ़ाउंडेशन से संपर्क किया. उनका कहना था यह उनके कॉपीराइट का उल्लंघन है. वारहोल फाउंडेशन ने कहा कि एंडी वारहोल ने मूल तस्वीर को बदल कर पेंटिंग बनायी है. 2017 में वारहोल फ़ाउडेशन ने लिन गोल्डस्मिथ के दावे के ख़िलाफ़ उन पर मुकदमा ठोक दिया और पलट कर गोल्डस्मिथ ने वारहोल फ़ाउंडेशन के ख़िलाफ़ कॉपीराइट उल्लंघन का मुकदमा दायर कर दिया."
निचली अदालत में फ़ैसला वारहोल फ़ाउंडेशन के हक में गया लेकिन दूसरी अदालत ने उस फ़ैसले को पलट दिया और आख़िर में मामला अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है.
ध्यान से देखिए
एस्टेल लोवेट कला इतिहासकार हैं और उनका कहना है पेंटिंग की कला एक लंबे समय से आर्ट फ़ोटोग्राफ़ी से प्रेरत होती रही हैं.
वो कहती हैं, "1839 में जब पहली बार कैमरे का आविष्कार हुआ तभी से कलाकार फोटोग्राफ़ी से प्रेरित होते रहे हैं. डेलाकुआ और सेज़ां जैसे कई पेंटरों की कला इससे प्रभावित हुई. शुरुआत में फ़ोटो खींच कर उसे छापने में घंटों लग जाते थे. 1870 में इंप्रेशनिस्ट कलाकारों की पहली पहली कला प्रदर्शनी में क्लॉड मोने सहित कई कलाकारों की पेंटिंग्स फ़ोटोग्राफ़ी से प्रभावित हुई थीं."
हालांकि शुरुआती फ़ोटोग्राफ़ केवल सीपिया टोन में छापे जा सकते थे और पेंटर अपनी पेंटिंग मनचाहे रंगों में बना सकते थे. और फ़ोटोग्राफ़ की छवि को पेंटिंग में और बेहतर बना सकते थे और बदल सकते थे.
इस तरह फ़ोटोग्राफ़ से प्रेरित पेंटिंग को 'अप्रोप्रिएशन आर्ट' भी कहा जाता था. और यह फ़ोटोग्राफ़ी के अस्तित्व में आने से पहले भी होता रहा है.
इसका इसका उदाहरण देते हुए एस्टेल लोवेट ने बताया, "एडुवार्ड मेने की मशहूर पेंटिंग दी पिकनिक 1816 में ड्रेजेने सोलारे की कॉपर एचिंग से बनाई गई तस्वीर से प्रेरित थी और सोलारे की पेंटिंग 1515 में रे मोंडे द्वारा बनायी गयी पेंटींग 'जजमेंट ऑफ़ पैरिस' से प्रेरित थी. रे मोंडे की पेंटिंग में कोने मे तीन लोग खड़े दिखते हैं. बेशक मेने ने यह कंपोज़िशन उसी पेंटिंग से ली थी. इस तरह के कई उदाहरण देखने को मिलते हैं."
अब टेक्नोलॉजी की वजह से इस तरह के उदाहरण और भी अधिक दिखाई देने लगे हैं. हो सकता है यह आपने भी किया हो या किसी ने आपकी खींची तस्वीर के साथ किया हो.
एस्टेल लोवेट कहती है, "कई बार आप सोशल मीडिया से किसी फ़ोटोग्राफ़र की तस्वीर लेते हैं, उसके रंग फ़ोटोशॉप के ज़रिए बदल देते हैं या उसकी काट छांट करते हैं और एक नयी इमेज बना लेते हैं. तो क्या आपको यह करने के लिए उस फ़ोटोग्राफ़र से अनुमति लेनी चाहिए? यह एक पेचिदा सवाल है कि आप किस हद तक मूल इमेज को बदल सकते हैं और इससे मूल इमेज कितनी नष्ट हो सकती है?"
विवाद
अमेरिका में कॉपराइट कानून के अनुसार किसी मूल सामग्री का इस्तेमाल करने के लिए कुछ मापदंड तय किए गए हैं मिसाल के तौर पर रिपोर्टिंग या अकादमिक कामों के लिए सीमित हद तक कुछ सामग्रियों का इस्तेमाल हो सकता है. मगर कला के मामले में यह मापदंड जटिल हो जाते हैं.
एरन मॉस जो कॉपीराइट मामलों के वकील और विशेषज्ञ हैं. वो कहते हैं कि यह एक पेचीदा सवाल है कि क्या संस्कृति को कानून के हिसाब से ढलना चाहिए या क़ानून को संस्कृति के अनुसार बदलना चाहिए?
एरन मॉस ने इस विवाद पर कहा, "सुप्रीम कोर्ट को प्रिंस श्रंखला से जुड़े विवाद पर फ़ैसला देते समय ऐसे मापदंड अपनाने होंगे जो कॉपीराइट कानून के मूल सिद्धांतों को बरकररार रखें ताकि लोग अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति को संवारने और गढने के लिए प्रोत्साहित हों."
"वहीं सुप्रीम कोर्ट के जजों को यह भी देखना होगा कि मौजादा सामग्री के इस्तेमाल से दूसरे लोग और कलाकार नई अभिव्यक्तियों का सृजन कर पाएं और मौजूदा अभिव्यक्तियों और कला को नए आयाम और अर्थ दे पाएं."
इस पेचीदा मामले में फ़ैसला सुनाते समय सुप्रीम कोर्ट के जजों को यह भी बताना होगा कि किन मापदंडों के आधार पर उन्होंने फ़ैसला किया है.
एरन मॉस इस विषय में कहते हैं, "यह कई मापदंडों के आधार पर हो सकता है. मिसाल के तौर पर कलाकार की गवाही ले कर यह तय किया जाएगा कि उसने मूल इमेज में फेर बदल कर के बनायी अपनी पेंटिंग मे क्या नयी अभिव्यक्ति या नया अर्थ दिया है."
"मगर एंडी वारहोल की मृत्यू हो चुकी है इसलिए इस मामले में यह संभव नहीं है. या आम दर्शकों से बात कर के यह पूछा जा सकता है कि क्या वो दोनों कलाओं में विशेष अंतर देखते हैं. तीसरा यह सवाल भी पूछा जा सकता है कि क्या वाकई अपनी पेंटिंग बनाने के लिए वारहोल को गोल्डस्मिथ द्वारा प्रिंस की ख़ींची तस्वीर का इस्तेमाल करने की ज़रूरत थी?"
अमेरिका में ज़्यादातर मामले निचली अदालतों मे ही निपटा लिए जाते हैं और सुप्रीम कोर्ट के सामने बहुत कम मामले आते हैं. एरन मॉस कहते हैं कि 1994 में आख़िरी बार रचनात्मकता के क्षेत्र में फ़ेयर यूस कॉपीराइट का एक मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था जब रॉय ओर्बीसन के एक गाने प्रेटी वूमन की पैरोडी टू लाइव क्रू ने बनाई थी.
लेकिन प्रिंस की ओरेंज प्रिंट को लेकर वारहोल फ़ाउंडेशन और लिन गोल्ड स्मिथ के बीच का विवाद ऐसा मामला जिससे सुप्रीम कोर्ट को पहली बार निपटना पड़ रहा है.
एरन मॉस का कहना है, "कलाकृतियों के कॉपीराइट के बारे में एक ग़लतफ़हमी यह है कि कॉपीराइट उसमें निहित है. अगर आपने एंडी वारहोल या किसी भी कलाकार की एक पेंटिंग ख़रीद ली है तो आप उसे किसी को भी बेच सकते हैं. अपने घर में या किसी प्रदर्शनी में प्रदर्शित कर सकते हैं लेकिन उसकी नकल बना कर पेश नहीं कर सकते या उसके पोस्टर बना कर बेच नहीं सकते."
एरन मॉस की राय है कि सुप्रीम कोर्ट जो भी फ़ैसला सुनाए कलाकार फिर भी अपने काम के लिए कलाकृतियों को इस्तेमाल करने का रास्ता निकाल ही लेंगे.
आगे क्या होगा?
मगर कला का बाज़ार इस मामले को कैसे देखते है और उस पर इस फ़ैसले का क्या असर पड़ेगा यह जानने के लिए बीबीसी ने बात की नताशा डीगन, फ़ैशन इन्स्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलॉजी में कला बाजार की प्रोफ़ेसर हैं.
उनका कहना है इस कलाकृतियों के कॉपीराइट के विषय में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का कला निर्माण पर गहरा असर पड़ेगा.
लिन गोल्डस्मिथ द्वारा ली गई तस्वीरें बड़े पैमाने पर संगीत की अलबम और पोस्टरों और पत्रकाओं में इस्तेमाल होती रही हैं. अगर फ़ैसला लिन गोल्डस्मिथ के हक़ में गया तो कई युवा और उभरते कलाकारों पर इसका ख़ास असर पड़ेगा.
नताशा डीगन कहती हैं, "ऐसी चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं कि कई कलाकार जो युवा हैं औ इतने धनी नहीं हैं कि मुकदमा लड़ पाएं, उनके काम करने के तरीके पर इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा. कई कलाकार जो वारहोल के तरीके से काम करते रहे हैं और उनकी सोच यह रही है कि इस प्रकार सामग्री का इस्तेमाल फ़ेयर यूस या जायज़ इस्तेमाल के दायरे में आता है उनके लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है."
लेकिन अगर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला एंडी वारहोल फ़ाउंडेशन के हक़ में गया तो क्या होगा?
इस बारे में नताशा डीगन का कहना है, "अगर फ़ैसला एंडी वारहोल फ़ाउंडेशन के पक्ष में गया तो ज़ाहिर है कई कलाकार जो आज़ादी के साथ सामग्रियों का इस्तेमाल करना चाहते हैं वो ख़ुश होंगे. लेकिन इससे दूसरी समस्याएं खड़ी हो सकती हैं."
"हॉलीवुड में कई फ़िल्में उपन्यास या कहानियों पर आधारित होती हैं. तो हो सकता है कि कुछ फ़िल्म निर्माता उपन्यास की कहानी में फेर बदल कर के या उसका अंत बदल कर फ़िल्में बनाने लगें जो कि ट्रांसफोर्मेटिव बदलाव होगा और मूल लेखकों को कोई फ़ीस नहीं मिलेगी."
नताशा डीगन कहती हैं कि इसका असर एंडी वारहोल की उन पेंटिंग की कीमत पर भी पड़ेगा जो उन्होंने दूसरों द्वारा खींची गयी तस्वीरों के आधार पर बनायी थी. मिसाल के तौर पर मर्लिन मनरो, लिज़ टेलर या एल्विस प्रेसली पेंटिंग. लाखों डॉलर्स में बिकने वाली इन पेंटिंग्स की कीमत गिर सकती है.
"वहीं 1980 के दशक के कई कलाकार वारहोल की तरह काम बनाते थे उनकी कलाकृतियों की कीमत भी प्रभावित हो सकती है. रॉशेनबर्ग, जेफ़ कू्न्स और बार्बरा क्रूगर जैसा कलाकार जों पत्रकाओं और दूसरी जगहों पर मौजूद सामग्री का इस्तेमाल कर के अपनी कलाकृतियां बनाते थे उनकी कीमत भी प्रभावित हो सकती है. और आज के मौजूदा कलाकारों को भी इस तरह दूसरी सामग्री का इस्तेमाल अपनी कलाकृति में करते समय कई बार सोचना होगा."
कॉपीराइट संबंधी कानून में अस्पष्टता या पेचीदगी से कुछ कलाकारों को फ़ायदा हुआ तो कुछ को नुकसान. इस रचनात्मकता के क्षेत्र में कॉपीराइट पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला जून तक आने की उम्मीद है लेकिन हमारे विशेषज्ञों को यह उम्मीद नहीं है कि इस फ़ैसले से कॉपीराइट कानून की अस्पष्टता ख़त्म हो जाएगी.
सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला ऐसे मामलों में निचली अदालतों के लिए एक दिशानिर्देश तो बन सकता है लेकिन हर मामले में उसका अर्थ लगाना निचली अदालतों का काम होगा जो निर्विवाद नहीं होगा और ना ही आसान होगा.
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