Assembly Elections: लोकसभा चुनाव के बाद कितनी कमजोर हुई कांग्रेस? Strike Rate से समझिए
Assembly Elections 2024: लोकसभा चुनाव के 5 महीने ही हुए हैं। तब कांग्रेस पार्टी ने 543 में से 99 सीटें जीतकर 10 साल बाद लोकसभा में विपक्ष के नेता का पद हासिल किया तो ऐसा संदेश दिया गया कि यह पार्टी बीजेपी के मुकाबले फिर से खड़ी होने के लिए तैयार हो चुकी है। लेकिन, उसके बाद हुए चार विधानसभा चुनाव के नतीजे बताते हैं कि कांग्रेस की वह मजबूती अचानक कमजोरी में तब्दील हो चुकी है।
लोकसभा चुनावों के बाद जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी को पहली बार निचले सदन में नेता प्रतिपक्ष के रूप में कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिला तो संसद और संसद के बाहर पार्टी नेताओं का बॉडी लैग्वेज बदल गया। क्योंकि, एक दशक बाद बीजेपी अपने दम पर बहुमत पाने में नाकाम रही थी। जबकि, तब कांग्रेस देशभर में कुल 328 सीटों पर लड़कर 99 सीटें ही जीती थी।

लोकसभा चुनावों के बाद फीका पड़ने लगा कांग्रेस का असर
लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की यह स्ट्राइक रेट 30% से कुछ ज्यादा थी। पार्टी ने एक दशक बाद इतना बढ़िया प्रदर्शन किया था। लेकिन, जून में आए लोकसभा चुनावों के चार महीने बाद ही जब हरियाणा और जम्मू और कश्मीर विधानसभा के नतीजे आए तो कांग्रेस का ग्राफ एक बार फिर से नीचे गिरना शुरू हो गया।
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हरियाणा में पार्टी लोकसभा चुनावों में 10 में से 5 सीट जीतने के बाद पूरी तरह से सत्ता में वापसी को लेकर निश्चिंत थी। मतदान के नतीजे आने से पहले ही कांग्रेस खेमे में मंत्री पद को लेकर कयासबाजियां शुरू हो गई थीं। लेकिन, पार्टी फिर से नाकाम हो गई।
हरियाणा में भी नहीं दोहरा सकी लोकसभा चुनाव वाला प्रदर्शन
90 विधानसभा सीटों वाली विधानसभा के लिए पार्टी ने 89 उम्मीदवार उतारकर 37 सीटें ही हासिल की। यह 41% से कुछ ज्यादा की स्ट्राइक रेट है। जबकि, हरियाणा में हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी की स्ट्राइक रेट करीब 55% रही थी। यहां पार्टी को उस पार्टी से मुकाबला करना था, जिसके पीछे एक दशक की एंटी-इंकंबेंसी बताई जा रही थी।
जम्मू-कश्मीर में भी कांग्रेस बहुत ही खराब रहा प्रदर्शन
हरियाणा के साथ ही एक दशक बाद जम्मू और कश्मीर विधानसभा के लिए भी चुनाव करवाए गए। यहां कांग्रेस पार्टी 90 सीटों वाली विधानसभा में नेशनल कांफ्रेंस से गठबंधन के साथ कुल 39 सीटों पर चुनाव लड़ी। कांग्रेस ने 7 सीटों पर नेशनल कांफ्रेंस के साथ दोस्ताना मुकाबला भी किया था और पार्टी वह सभी सातों सीटें हार गई।
वैसे 30 सीटों में से कांग्रेस मात्र 6 सीटों पर ही चुनाव जीत सकी और उसकी यह स्ट्राइक रेट करीब 15% रही। 2014 के चुनावों में वहां कांग्रेस 12 सीटें जीती थी। सबसे बड़ी बात की हिंदू बहुल जम्मू डिविजन में कांग्रेस को इस बार सिर्फ 1 सीट मिली है।
जबकि, उसकी सहयोगी और गठबंधन की अगुवा नेशनल कांफ्रेंस 56 सीटों पर लड़ी और 42 सीटें जीती। इस हिसाब से यह स्ट्राइक रेट 71% से अधिक की है।
महाराष्ट्र में घटक दलों में सबसे बुरा रहा कांग्रेस का प्रदर्शन
लेकिन, जब महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों की चर्चा होगी तो कांग्रेस को अपनी स्ट्राइक रेट और भी शर्मनाक नजर आएगी। राज्य में पार्टी ने महा विकास अघाड़ी के तहत 288 में से सबसे ज्यादा यानी 101 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और उसे मात्र 16 सीटें मिलीं। यह स्ट्राइक रेट 16% से भी कम है।
जबकि, इसी चुनाव में उसकी सहयोगी शिवसेना (यूबीटी) की स्ट्राइक रेट 21% से अधिक और एनसीपी (एससीपी) 11% से ज्यादा रही है।
लोकसभा चुनाव में 76% से भी ज्यादा थी स्ट्राइक रेट
जबकि, इसी साल लोकसभा चुनावों में कांग्रेस एकमात्र पार्टी थी,जिसे महाराष्ट्र में दहाई अंकों में सीटें आई थीं और उसकी स्ट्राइक रेट वहां 76% से भी ज्यादा थी। पार्टी मात्र 17 सीटों पर लड़कर 13 पर जीती थी।
झारखंड में भी सहयोगियों से पिछड़ी कांग्रेस
अलबत्ता कांग्रेस को इस महीने हुए झारखंड विधानसभा चुनाव में अच्छी खबर मिली है, जहां उसे 81 में से 16 सीटें जीतने का मौका मिला है। पार्टी को जेएमएम ने वहां 30 सीटें दी थीं और इस हिसाब से उसकी स्ट्राइक रेट 53% रही है।
लेकिन, कांग्रेस के लिए इस आंकड़े का उत्साह भी तब फीका पड़ जाता है, जब गठबंधन के बाकी सभी सहयोगियों की स्ट्राइक रेट इससे कहीं ज्यादा रही है।
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मसलन, जेएमएम के मामले में यह 79% है और आरजेडी के मामले में 57%.यही नहीं, झारखंड में आगे से हेमंत सोरेन की अगुवाई में जेएमएम ही चुनाव लड़ रही थी और चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस पर सहयोगी दलों के नेताओं की ओर से यह भी आरोप लगाए गए थे कि उसे बंटवारे में ज्यादा सीटें मिल गई हैं।












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