बीजेपी के 'ब्रम्हास्त्र' से क्या होगी गुजरात में कांग्रेस की वापसी? क्या हिला पाएगी भाजपा का सिंहासन?

Congress Convention: देश की सियासत में कांग्रस अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। लोकसभा चुनावों के साथ-साथ हाल ही में हुए महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली राज्य विधानसभा चुनावों में भी उसे करारी हार का सामना करना पड़ा। गुजरात की राजनीति में तीन दशकों से सत्ता से बाहर रही कांग्रेस अब एक बार फिर अपनी खोई हुई जमीन को पाने की कोशिश में है। हाल ही में हुए पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन को इस 'मिशन गुजरात' का शंखनाद माना जा रहा है।

कांग्रेस ने 8 अप्रैल को हुए अपने दो दिवसीय अधिवेशन में 'मिशन गुजरात' की रणनीति पर चर्चा की जिसमें पार्टी ने इस बार बीजेपी को उसके गढ़ में मात देने के लिए उसी का हथियार अपनाया। आगामी विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी बीजेपी का ब्रम्हास्त्र 'पन्ना मॉडल' को अजमाने की कोशिश में है।

Congress-Convention

सवाल ये है कि क्या कांग्रेस इस स्ट्रैटेजी से राज्य और सियासत में अपनी खोई हुई शोहरत वापस पा सकेगी? इस मॉडल से अन्य राज्यों में क्या फायदा मिलेगा? विस्तार से जानिए..

64 साल बाद गुजरात में हुए कांग्रेस के दो दिवसीय अधिवेशन में कई अहम बातें निकल कर सामने आई। इस में कांग्रेस ने पार्टी के भीतर और जमीनी स्तर पर कई बदलाव लाने पर जोर दिया। इतना ही नहीं कांग्रेस कार्य समिति (CWC) के सदस्य डॉ. शशि थरूर ने पार्टी को एक "नई शुरुआत" का संदेश दिया।

उन्होंने कहा कि कांग्रेस को पिछली गलतियों से सबक लेते हुए भविष्य की ओर देखना चाहिए, और रचनात्मक आलोचना व सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना होगा। थरूर ने दो टूक कहा, "कांग्रेस को उम्मीद की पार्टी होनी चाहिए, नाराजगी की नहीं, भविष्य की पार्टी, न कि केवल अतीत की। हमें रचनात्मक आलोचना के जरिए जनता से जुड़ना है, न कि निरंतर नकारात्मकता से।"

Congress National Convention: माइक्रो मैनेजमेंट से बदलेगी तस्वीर

कांग्रेस के युवा नेता सचिन पायलट ने कहा कि हम जिलाध्यक्षों को अधिक पॉलिटिकल पावर देकर हम ब्लॉक, मंडल, गांव, देहात और बूथ स्तर तक अपनी पहुंच बनाना चाहते हैं। इस बार संगठनात्मक सुधार, जमीनी स्तर पर माइक्रो मैनेजमेंट और पार्टी के भीतर मौजूद 'स्लीपर सेल' जैसे भीतरघातियों पर शिकंजा कसने की योजना बनाई है।

सचिन पायलट के इस बयान से साफ संदेश गया कि कांग्रेस इस बार के चुनावी मैदान में फ्रंटफुट पर खेलेगी और नई रणनीति के साथ उतरेगी। इस साल के अंत में बिहार विधानसभा और 2026 में तमिलनाडु, पं. बंगाल जैसे अहम राज्यों में चुनाव होने हैं ऐसे में कांग्रेस की ये स्ट्रैटजी उसके लिए डुबते को तिनके का सहारा बन सकता है।

देखिए गुजरात में 2027 में विधानसभा चुनाव होंगे। राज्य की राजनीति में भाजपा का एकतरफा वर्चस्व है और कांग्रेस तीन दशक से गायब है। ऐसे में पार्टी BJP को उसके गढ़ में मात देने के लिए उसके ही मॉडल से उसे टक्कर देने तैयारी कर रही है।

Congress Adhiveshan में 'एक व्यक्ति, एक वोट' की पैरवी

कांग्रेस अब जनहित के मुद्दों को लेकर नए जोश से जनता के बीच उतरने की तैयारी कर रही है। पार्टी का फोकस न केवल संगठन को मजबूत करने पर है, बल्कि चुनावी पारदर्शिता को सुनिश्चित करने पर भी है। पार्टी के नेताओं ने वोटर लिस्ट की गड़बड़ियों और फर्जी वोटों के खिलाफ भी अभियान चलाने की बात कही है।

'एक व्यक्ति, एक वोट' के अधिकार को सही मायने में लागू करवाने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। ब्लॉक, मंडल, शहर और जिला स्तर पर पुराने ढर्रे की बजाए नए तरीके से काम करने की तैयारी है। अब पोलिंग बूथ, विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों के आधार पर नई इकाईयां बनाने पर जोर देने की बात कही गई है।

Congress Session: बिहार और अन्य राज्यों पर भी दिखेगा असर

राजनीतिक विश्लेषणों का मानना है कि कांग्रेस की इस रणनीति का गुजरात में क्या फायदा मिलेगा ये देखने वाली बात है लेकिन अगर यही फार्मुला बिहार और अन्य राज्यों के चुनावों में भी अपनाया गया तो चुनावी परिणामों पर इसका असर पड़ेगा। यही वजह है कि गुजरात को अब सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि एक रणनीतिक प्रयोगशाला की तौर देखा जा रहा है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, "यह सिर्फ गुजरात की लड़ाई नहीं है, बल्कि पूरे देश में कांग्रेस को मजबूत करने की दिशा में पहला कदम है।"

Congress National Convention 2025: गुजरात में हार की वजहें क्या रहीं?

गुजरात में कांग्रेस की 30 साल से सत्ता से दूर रहने की कई वजहें रही हैं। राजनीति पर पकड़ रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि "कांग्रेस के कमजोर होने की मुख्य वजह बीजेपी की सोची-समझी रणनीति रही है। बीजेपी ने कांग्रेस के जनाधार वाले प्रभावशाली नेताओं को अपने पाले में किया। शंकरसिंह वाघेला जैसे दिग्गज नेता का पार्टी छोड़ना इसका बड़ा उदाहरण है। इन नेताओं के जाने से गुजरात कांग्रेस पर भारी असर पड़ा और इससे वहां पर पार्टी की जमीनी ताकत कमजोर हो गई।

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