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सपा-बसपा से कट-बंधन के लिए कांग्रेस है जिम्मेदार, पढ़ें वो वादे जिनसे मुकर गई कांग्रेस

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नई दिल्ली। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों के लिए चुनाव की तारीखें घोषित हो गई हैं। दोनों प्रदेशों में चुनावी गहमामगहमी तेज होने लगी है। लेकिन कांग्रेस ने इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) पर स्पष्ट बढ़त हासिल करने का मौका गंवा दिया है। कांग्रेस न केवल बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन करने में विफल रही बल्कि समाजवादी पार्टी और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (जीजीपी) जैसे छोटे राजनीतिक दलों को भी वो साथ लाने में असफल रही। जनजातीय क्षेत्रों में जीजीपी का प्रभाव है और उसके पास इन राज्यों में ढाई प्रतिशत से ज्यादा वोट बैंक हैं। वहीं सपा के पास भी मध्यप्रदेश में एक फीसदी से ज्यादा मत हैं।

mp congress

नेतृत्व के चलते नहीं हुआ गठबंधन

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में एक या दो प्रतिशत वोट महत्वपूर्ण हैं क्योंकि मध्यप्रदेश में 2 से 2.5 प्रतिशत वोट और छत्तीसगढ़ में एक प्रतिशत वोट ही भाजपा और कांग्रेस के बीच पिछले कुछ चुनावों में जीत का मार्जिन बना रहे हैं। सूत्रों ने कहा है कि मध्यप्रदेश नेतृत्व के कारण ही कांग्रेस बसपा, एसपी और जीजीपी के साथ गठबंधन करने में नाकाम रही है। जब समान विचारधारा वाले राजनीतिक दलों के साथ बातचीत शुरू हुई थी तो इन पार्टियों का मानना था कि कांग्रेस इन दोनों राज्यों में छोटे राजनीतिक दलों को साथ लेकर चलेगी।

साथ आना चाहते थे छोटे दल

साथ आना चाहते थे छोटे दल

सूत्रों का कहना है कि इन छोटी पार्टियों के नेता कांग्रेस नेतृत्व के साथ अपने मतभेदों को भूलने के लिए तैयार थे क्योंकि फिलहाल बीजेपी को सत्ता में आने से रोकने के अलावा और कोई बड़ा मकसद नहीं है। दिलचस्प बात ये है कि 201 9 में मोदी को रोकने के लिए विधानसभा सीटों के मामले में ये छोटे राजनीतिक दल लचीला रुख अपनाने के लिए राजी थे। एसपी और जीजीपी की मांग बहुत कम थी लेकिन जब इन दलों के नेताओं के साथ बातचीत की गई तो इन्हें तवज्जो नहीं दी गई और उनकी बातों को हल्के में लिया गया। कहा जा रहा है कि छत्तीसगढ़ के कांग्रेस नेताओं से तो इस बारे में पूछा तक नहीं गया और छत्तीसगढ़ के किसी कांग्रेस नेता की कमलनाथ की तरह राहुल गांधी तक सीधी पहुंच नहीं है।

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वादे से पलटी कांग्रेस

वादे से पलटी कांग्रेस

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक छत्तीसगढ़ में कांग्रेस नेता इतने असहाय थे कि वो राहुल गांधी को इस बारे में भी आगाह नहीं कर पाए कि छत्तीसगढ़ में बसपा के साथ गठबंधन पर बातचीत असफल होने की दिशा में जा रही है। दरअसल कमलनाथ ने बीएसपी को विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के कुछ उम्मीदवारों को अपने टिकट पर चुनाव लड़वाने के लिए कहा था। कमलनाथ को लग रहा था कि बसपा के पास अपने ऐसे उम्मीदवार नहीं हैं जो चुनाव जीत सकते हैं। इसका मतलब ये था कि कई कांग्रेस उम्मीदवार जिन्हें पार्टी टिकट नहीं देती वो बीएसपी के टिकट चुनाव लड़ते। इसके अलावा कांग्रेस अपने उस वादे से भी मुकर गई जिसमें उसने बीएसपी के चुनाव खर्च को उठाने की बात कही थी।

कांग्रेस की बढ़ी मुश्किल

कांग्रेस की बढ़ी मुश्किल

अब हालात ये हैं कि इन दोनों राज्यों में जो रास्ता बीजेपी के लिए मुश्किल और कांग्रेस के लिए कुछ आसान दिख रहा थी वो अब कांग्रेस के लिए मुश्किल होता दिख रही है। बीजेपी को इस गठबंधन के न होने से सबसे ज्यादा फायदा होगा। जो वोट पहले एकजुट होकर बीजेपी के खिलाफ पढ़ते उनमें अब बिखराव होगा। इसके अलावा दोनों राज्यों में कई और छोटे राजनीतिक दल हैं जो वोट कटवा का काम करेंगे। जयस और सपाक्स जैसे संगठन भी चुनौती पेश कर रहे हैं। अगर ये बीजेपी को कुछ नुकसान पहुंचाएंगे तो कांग्रेस को भी नुकसान होगा और कांग्रेस के लिए बेहतर ये होता कि वो विपक्षी एकता को एक साझा मंच देती।

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English summary
Congress has broken the promise made to alliance partners, now it’s tough contest in MP and Chhattisgarh
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