Congress का चीन से MoU और पाक से नरमी, क्या कांग्रेस की नीतियां भारत विरोधी नैरेटिव को ताकत दे रही हैं?
Congress China MoU: कांग्रेस पार्टी और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) के बीच 2008 में हुए एक रहस्यमयी "समझौता ज्ञापन" (MoU) को लेकर सवाल आज भी उठते हैं। इस समझौते के मुख्य बिंदु अब तक सार्वजनिक नहीं किए गए हैं, लेकिन इसे 'उच्च-स्तरीय आदान-प्रदान' और 'क्षेत्रीय व अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर परामर्श' का जरिया बताया गया।
हालांकि, इसके आस-पास हुई समय की अन्य घटनाओं ने इसे एक बड़े राजनीतिक विवाद का रूप दे दिया है। इस समझौते से जुड़ी सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि इसके ठीक आसपास भारत के गांधी परिवार और पाकिस्तान के भुट्टो परिवार को चीन की राजधानी बीजिंग में एक साथ देखा गया।

7 अगस्त 2008 को सोनिया गांधी, राहुल गांधी और गांधी परिवार के अन्य सदस्य चीन में मौजूद थे। अगले ही दिन, 8 अगस्त को, पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) के नेता बिलावल भुट्टो ज़रदारी और उनकी बहनें बीजिंग ओलंपिक्स में भाग लेने के लिए वहां पहुंचीं।
दोनों देशों के प्रमुख राजनीतिक परिवारों की एक ही समय पर और एक ही जगह उपस्थिति, साथ ही चीन के साथ गुप्त समझौते की टाइमिंग, राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यह एक बड़ा संदेह का विषय बन गया। खासकर तब, जब दो महीने बाद ही PPP ने भी CPC के साथ एक MoU पर दस्तखत किए।
क्या कांग्रेस की बयान बाजी पाकिस्तान के लिए वरदान?
हाल समय में कांग्रेस और राहुल गांधी की कुछ बयानों को पाकिस्तान की रणनीतिक जरूरतों के हिसाब से इस्तेमाल किया गया है। उदाहरण के लिए, 7 मई 2025 को भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में सीमा पार एयरस्ट्राइक की गई। इसके बाद पाकिस्तान ने एक झूठा प्रचार अभियान शुरू किया कि भारत के लड़ाकू विमान राफेल को नुकसान पहुंचा है।
इसी बीच कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने सरकार से यह पूछ डाला कि कितने विमान नष्ट हुए.. यह सवाल पाकिस्तान के दावों को ही बल देता नजर आया। उन्होंने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के बयान को गलत ढंग से प्रस्तुत किया और यह संकेत देने की कोशिश की कि भारत ने शायद पाकिस्तान को पहले ही हमले की सूचना दे दी थी।
यह पहली बार नहीं है। 2019 के पुलवामा हमले के बाद राहुल गांधी के बयानों को भी पाकिस्तान ने अपनी मीडिया ब्रीफिंग में प्रस्तुत किया था। इसके अलावा, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा पहलगाम हमले में सुरक्षा चूक पर सवाल उठाना भी पाकिस्तान के "ऑपरेशन सिंदूर" के प्रेस बयान में इस्तेमाल किया गया।
2004-2014: क्या कांग्रेस ने दिखाया नरमी का रुख?
UPA शासन के दौरान भारत की पाकिस्तान और चीन नीति को लेकर भी कई सवाल उठे हैं। 26/11 के मुंबई आतंकी हमलों के बाद भारत ने कोई सैन्य कार्रवाई नहीं की, सिर्फ कूटनीतिक दबाव डाला लेकिन इसका कोई ठोस नतीजा नहीं निकला।
उस वक्त कई वरिष्ठ राजनयिकों और अधिकारियों ने बताया कि भारत के पास पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों की जानकारी थी, फिर भी कार्रवाई से बचा गया। यह वह दौर था जब पाकिस्तान में PPP की सरकार थी - एक और संयोग, जो रणनीतिक नरमी के आरोपों को बल देता है।
चीन के मामले में भी यही रवैया देखा गया। 2004 से 2014 तक चीन की ओर से LAC पर कई बार घुसपैठ हुई, जैसे 2013 का देपसांग घुसपैठ, लेकिन भारत ने इन्हें अक्सर नजरअंदाज किया। इस दौरान भारत-चीन व्यापार घाटा तेजी से बढ़ता गया, जिससे आर्थिक निर्भरता में वृद्धि हुई।
परिवारवाद, सियासी गिरावट और रणनीतिक चूक
कांग्रेस और PPP दोनों ही एक साझा राजनीतिक संस्कृति में बंधे हुए प्रतीत होते हैं - एक तरफ वंशवाद, दूसरी तरफ सत्ता से गिरावट। दोनों ही पार्टियाँ अब विपक्ष में हैं, लेकिन उनके पारस्परिक संबंध और विदेश नीति के overlapping बिंदु आज भी जारी हैं।
कई विश्लेषकों का मानना है कि MoU और कुछ नेताओं की "मुलाकातें" मात्र प्रतीकात्मक नहीं हैं - ये उस चिंताजनक प्रवृत्ति की ओर इशारा करती हैं जिसमें भारत के विरोधी देशों के प्रति सहानुभूति या उदारता दिखती है।
कांग्रेस पार्टी को न सिर्फ 2008 के चीन MoU के बारे में पारदर्शिता बरतनी होगी, बल्कि यह भी स्पष्ट करना होगा कि बार-बार पाकिस्तान और चीन जैसे देशों के हितों के साथ मेल खाते उनके वक्तव्य और कदम महज संयोग हैं या कुछ और?












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