धर्म की आंड़ में और सत्ता की छांव में मथुरा में चल रहा था कब्जे का खेल

लखनऊ। भारत में किस तरह से स्वतंत्रता संग्राम के हीरो रहे नेताजी सुभाषचंद्र बोस के नाम पर लोग धन उगाही करके संगठन और साम्राज्य खड़ा कर ले रहे हैं उसकी एक बानगी मथुरा में देखने को मिली है। जयगुरुदेव जोकि मूलरूप से इटावा के रहने वाले हैं और उनका नाम तुलसी यादव है। इन्होंने बोस के नाम से एक संस्था बनाकर दुनियाभर के लोगों से 20 करोड़ रुपए का चंदा इकट्ठा किया और यूपी में 15 हजार करोड़ रुपए से अधिक का साम्राज्य स्थापित कर लिया।

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जयगुरुदेव की मृत्यु के बाद शुरु हुआ संपत्ति का खेल

जयगुरुदेव का वर्ष 2013 में निधन हो गया था जिसके बाद इनके तीन चेलों ने अरबों की इस संपत्ति पर अपनी नजर गड़ाना शुरु कर दिया। मथुरा में जिस तरह से पुलिस मुठभेड़ में 28 से अधिक लोगों की मौत हो गयी है उसमें शिवपाल सिंह यादव का भी नाम सामने आया है।

चूंकि जयगुरुदेव इटावा के थे और मुलायम सिंह यादव का यह गृह जनपद है तो शिवपाल सिंह व रामगोपाल यादव भी यहीं से संबंध रखते हैं लिहाजा उनके समर्थकों का भी जयगुरुदेव से संबंध था। बाबा जयगुरुदेव की संपत्ति पर मुख्य रूप से तीन चेले कब्जा करना चाहते थे और तीनों के बीच विवाद भी शुरु हो गया था। उनके तीन चेलों में पहला पंकज यादव जोकि बाबा का ड्राइवर था। दूसरा चेला रामबृक्ष यादव था जोकि बाबा का सेवक था वह गाजीपुर का निवासी थी और तीसरा चेला उमाकांत तिवारी था।

पंकज यादव ने इस संपत्ति को अपने कब्जे में करने के लिए शिवपाल सिंह से करीबी बढ़ानी शुरु की और इसी बदौलत वह मथुरा से दिल्ली के बीच तमाम आश्रम बनवाये और कई संपत्तियों पर कब्जा कर लिया। बताया जाता है कि इन संपत्तियों की कीमत 15 हजार करोड़ रुपए से अधिक थी। पंकज यादव ने अपने बढ़ते प्रभाव के दम पर आश्रम पर कब्जा करना शुरु कर दिया और रामबृक्ष को आश्रम से बाहर का रास्ता दिखा दिया।

लोकसभा चुनाव में रामबृक्ष ने निभायी थी अहम भूमिका

लेकिन 2014 में फिरोजाबाद से जब रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव ने जब लोकसभा चुनाव तो रामबृक्ष यादव ने उनका जमकर प्रचार किया। जबरदस्त चुनाव प्रचार के बाद जब अक्षय को जीत मिली तो रामबृक्ष की रामगोपाल यादव से करीबी बढ़ गयी।

रामगोपाल यादव की वजह से मिली थी अनशन की इजाजत

स्थानीय लोगों की मानें तो रामगोपाल यादव की शह के चलते ही रामबृक्ष ने कुछ बेसिर पैर की मांगों के साथ जवाहर बाग पर कब्जे के इरादे से अनशन शुरु किया। यही नहीं सूत्रों की मानें तो रामगोपाल के निर्देश पर ही दो साल पहले तत्कालीन डीएम और एसएसपी ने रामबृक्ष को जवाहरबाग में अनशन करने की इजाजत दी थी।

डीएम की नियुक्ति रामबृक्ष के इशारे पर

रामबृक्ष ने रामगोपाल के साथ अपने संबंधों का भरपूर इस्तेमाल किया और अपनी पसंद के डीएम राकेश यादव को यहां का डीएम नियुक्त कराया और इस तरह से उसे पूरी तरह से प्रशासनिक शरण प्राप्त हो गयी और वह जवाहरबाग में अपने व्यापार को बढ़ाने लगा।

कोर्ट में जाने की वजह से बर्बाद हुआ खेल

रामबृक्ष और पंकज यादव के बीच संपत्ति के वर्चस्व के बीच शिवपाल सिंह यादव और रामगोपाल यादव अपने हित साध रहे थे। लेकिन इन सब के बीच जब यह मामला कोर्ट में पहुंचा तो कोर्ट ने जगह को खाली कराने का निर्देश दे दिया और मुठभेड़ में दो पुलिस अधिकारियों की मृत्यु हो गयी जिसने पूरी योजना को तहस नहस कर के रख दिया।

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