बंद होने की ओर अग्रसर कोयला आधारित पावर प्लांट
बेंगलुरु। भारत सरकार ने पेरिस समझौते की शर्तों को पूरा करने के संकल्प के साथ तमाम योजनाएं चला रही है। नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम भी उसका एक हिस्सा है। अब तक तो सरकार ही प्रदूषण को रोकने के लिये जोर देती आ रही थी, लेकिन अब कंपनियों के रुख को देख ऐसा लग रहा है कि बहुत जल्द कोरबा, सिंगरौली, हलदिया और घाटमपुर जैसे शहरों के लोगों को स्वच्छ हवा मिल सकेगी। असल में देश की तमाम वित्तीय कंपनियां कोयला आधारित बिजलीघरों को कर्ज देने से अनखा रही हैं। 2018-18 के वित्तीय वर्ष के आंकड़ों पर गौर करें ता कोयला बिजली घरों को दिये जाने वाले कर्ज में 90 प्रतिशत की गिरावट आयी है। यानी अब इन बिजली घरों के शटर गिरने का समय जल्द ही आने वाला है।

आईआईटी मद्रास में आयोजित एनर्जी फाइनेंस कॉन्फ्रेंस 2019 में जारी की गई वार्षिक ऊर्जा निवेश ट्रेंड रिपोर्ट 'द कोल वर्सेस रिन्यूएबल्स 2018' से यह पता चलता है कि कोयले से चलने वाली बिजली परियोजनाओं को मिलने वाले कर्ज में वर्ष 2017 के मुकाबले 90 प्रतिशत गिरावट आई है। सेंटर फॉर फाइनेंशियल एनालीसिस, नई दिल्ली द्वारा जारी की गई रिपोर्ट में उन 54 ऊर्जा परियोजनाओं को दी गई फाइनेंस लेंडिंग का विश्लेषण किया गया है, जिनकी 31 दिसंबर 2018 को वित्तीय क्लोजिंग हुई ह।
अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं को दे रहे प्राथमिकता
रिपोर्ट के आंकड़े साफ दर्शाते हैं कि वित्तीय संस्थान अब कर्ज देने के लिये अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं। अध्ययन में शामिल जिन परियोजनाओं को कर्ज़ मिला है उनमें से 80 फीसद परियोजनाएं अक्षय ऊर्जा की जबकि 20% परियोजनाएं कोयला बिजली घरों की हैं। वर्ष 2018 में कुल 3.8 गीगावॉट उत्पादन क्षमता वाली केवल पांच कोयला बिजली परियोजनाओं को कुल 6081 करोड़ 850 मिलीयन डालर का कर्ज़ मिला है। जबकि बीते वर्ष कुल 17 गीगावॉट उत्पादन क्षमता वाले वाली 12 कोयला बिजली परियोजनाओं को 7767 करोड़ 9.35 अरब डॉलर का कर्ज़ हासिल हुआ था।
रिपोर्ट के अनुसार सार्वजनिक बैंकों और सरकार के स्वामित्व वाले वित्तीय संस्थानों में ज्यादातर फाइनेंशियल लेंडिंग अब भी कोयला बिजली परियोजनाओं को समर्पित हैं। वहीं निजी बैंक और संस्थान अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं पर ही दांव लगा रहे हैं।
नई परियोजनाओं को कोई पैसा देने को तैयार नहीं
रिपोर्ट के मुताबिक नई वित्तीय संस्थान नई परियोजनाओं को पैसा देने के लिये तैयार नहीं दिख रहे हैं। नई परियोजनाओं को दिये जाने वाले कर्ज में 93 प्रतिशत गिरावट दर्ज हुई है। वर्ष 2017 में नई परियोजनाओं को 17,224 करोड़ रुपए का कर्ज दिया गया था, जबकि 2018 में पावर कंपनियां महज 1207 करोड़ रुपये ही जुटा पायीं। कुल पांच कोयला परियोजनाओं में से एक को प्राइमरी फंडिंग मिली, वहीं चार अन्य को मौजूदा कर्ज की रीफाइनेंसिंग के तहत ऋण मिला। इसके विपरीत अक्षय ऊर्जा से जुड़ी 49 परियोजनाओं में से 80 प्रतिशत को प्राइमरी फाइनेंस यानी नया प्लांट लगाने के लिये ऋण मिला।

कर्नाटक, मध्य प्रदेश, गुजरात आगे
वर्ष 2018 में कुछ भारतीय राज्यों ने अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए अपने दरवाजे पूरी तरह खोल दिए। कर्नाटक, मध्यप्रदेश और गुजरात में स्थापित होने वाली परियोजनाओं ने पूरे देश में सौर तथा वायु बिजली की कुल 23 अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं को दिए जाने वाले कर्ज़ का आधा हिस्सा हासिल कर लिया है। इस बीच, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल ने एक भी अक्षय ऊर्जा परियोजना के बजाय कोयले से चलने वाली तीन बिजली परियोजनाओं के लिए कर्ज़ हासिल किया।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला का कहना है कि भारत में वायु प्रदूषण एक संकट का रूप ले चुका है। इससे सेहत को भी गम्भीर नुकसान हो रहा है। अगर सरकार को नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम में निर्धारित लक्ष्य हासिल करने हैं तो प्रदूषण को उसके स्रोत पर ही रोकना होगा। वायु प्रदूषण फैलाने में कोयला बिजलीघरों का बड़ा योगदान है। हालांकि इसे इस तरह देखा और समझा नहीं जाता है। इस तथ्य के मद्देनजर कि कोयला आधारित बिजली परियोजनाओं पर होने वाले निवेश में उल्लेखनीय गिरावट आयी है, यह जरूरी है कि ऊर्जा के स्वच्छ स्रोतों की तरफ कदम बढ़ाये जाएं और कोयला परियोजनाओं को चरणबद्ध तरीके से खत्म किया जाए। क्योंकि कोयला आधारित बिजली परियोजनाओं से जनस्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।
भारत में ट्रेंड है तेज़
इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एण्ड फाइनेंशियल एनालीसिस के एनर्जी इकोनॉमिस्ट विभूति गर्ग का कहना है कि सौर और वायु बिजली की उत्पादन लागत कोयले से बनने वाली बिजली की लागत से तुलना करने योग्य है। स्वच्छ ऊर्जा से होने वाले फायदे, जैसे- स्वास्थ्य, वायु की बेहतर गुणवत्ता, भूमि की गुणवत्ता का कम खराब होना, प्रदूषणकारी तत्वों के उत्सर्जन में कमी आदि की वजह से निवेश के मामले में यह क्षेत्र अधिक आकर्षक है। हम पूरी दुनिया में यही ट्रेंड देख रहे हैं। भारत में तो यह और भी जोर पकड़ रहा है।"
सेंटर फॉर फाइनेंशियल अकाउंटेबिलिटी के अधिशासी निदेशक जो अटियाली कहते हैं, "हमारे अध्ययन से जाहिर होता है कि कोयला बिजली परियोजनाओं में निवेश की मात्रा में उल्लेखनीय गिरावट आ रही है। यह रुख वैश्विक बाजार के अनुरूप है। बहरहाल, यह जानना महत्वपूर्ण है कि भारत में स्वच्छ ऊर्जा की तरफ कदम बढ़ाने के मामले में सरकारी वित्तीय संस्थाओं या सार्वजनिक बैंकों के मुकाबले निजी बैंक आगे चल रहे हैं। सरकार को चाहिये कि वह सार्वजनिक बैंकों तथा वित्तीय संस्थानों से कोयला बिजली के मुकाबले अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं को ज्यादा सहयोग देने को कहे।"
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