CJI BR Gavai ने नेहरू-इंदिरा सरकार पर लगाया मनमर्जी का आरोप, जानें चीफ जस्टिस की नाराजगी की वजह
CJI BR Gavai: न्यायपालिका की निष्पक्षता और जजों की नियुक्ति मामले पर चीफ जस्टिस बीआर गवई ने कहा कि सरकार और न्यायपालिका के बीच कई बार टकराव की स्थिति रही है। उन्होंने न्यायपालिका की निष्पक्षता पर जोर देते हुए कहा कि जजों की नियुक्ति भय और पक्षपात के आधार पर नहीं होनी चाहिए। चीफ जस्टिस ने कहा, 'नेहरू और इंदिरा गांधी के कार्यकाल में जजों की नियुक्ति मनमाने तरीके से की गई थी। जजों की नियुक्ति की ताकत जब सरकार के हाथ में थी, तो दो बार गलत तरीके से भारत के मुख्य न्यायधीश की नियुक्ति की गई थी।'
CJI BR Gavai ने नेहरू और इंदिरा के कार्यकाल का दिया हवाला
न्यायिक वैधता और जनविश्वास मामले पर बोलते हुए सीजेआई ने कहा, '1993 तक जजों की नियुक्ति का अधिकार कार्यपालिका के पास था। इस दौरान दो बार कार्यपालिका ने वरिष्ठतम न्यायधीशों को दरकिनार कर दिया गया था। 1964 में खराब स्वास्थ्य का हवाला देकर पंडित नेहरू ने न्यायमूर्ति सैयद जफर इमाम को मुख्य न्यायधीश नहीं बनाया था। 1977 में जस्टिस खन्ना को इंदिरा सरकार की नाराजगी की वजह से चीफ जस्टिस का पद खोना पड़ा था।'

बता दें कि जस्टिस खन्ना ने एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला मामले में सरकार के फैसले को पलट दिया था। जस्टिस खन्ना ने कहा था कि आपातकाल में भी नागरिकों के मौलिक अधिकार स्थगित नहीं हो सकते हैं। इस वजह से जस्टिस खन्ना को तत्कालीन इंदिरा गांधी के गुस्से का भी शिकार होना पड़ा था। उनकी वरिष्ठता को दरकिनार कर न्यायमूर्ति बेग को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया था। इससे आहत होकर जस्टिस खन्ना ने त्यागपत्र दे दिया था।
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न्यायिक नियुक्तियों में विवाद पर दी प्रतिक्रिया
चीफ जस्टिस बीआर गवई ने कहा, 'भारत में न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया को लेकर हमेशा विवाद रहा है। न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका या न्यायपालिका में से किसे प्रमुखता दी जानी चाहिए, इस पर लंबी चर्चा होती रही है।' सीजेआई ने कहा कि 1993 और 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम प्रणाली की संवैधानिक व्याख्या की थी। चीफ जस्टिस ने कहा कि न्यायपालिका की निष्पक्षता और न्यायिक समीक्षा का अधिकार लोकतंत्र में बने रहना चाहिए।
उन्होंने न्यायधीशों के रिटायर होने के बाद सरकारी पद लेने या चुनाव लड़ने की प्रवृति पर निराशा जताई। सीजेआई गवई ने कहा, 'न्यायिक निष्पक्षता और न्यायपालिका में भरोसे को मजबूत करने के लिए मैंने और मेरे कुछ साथियों ने तय किया है कि हम रिटायरमेंट के बाद ऐसा कोई पद नहीं लेंगे। न्यायिक व्यवस्था से जुड़े लोग जब रिटायरमेंट के बाद सरकारी या राजनीतिक पद लेते हैं, तो इससे जनता में गलत संदेश जा सकता है। लोगों को लग सकता है कि अपने कार्यकाल में उन्होंने राजनीतिक हितों से प्रभावित होकर फैसले दिए होंगे।'
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