माओत्से तुंग की राह चल रहे शी जिनपिंग, इन कारणों की वजह से भारत से ले रहे पंगा

नई दिल्ली। भारत और चीन के बीच सीमा पर एक बार फिर तनाव बढ़ गया है। हाल ही में अपने एक इंटरव्यू में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी कहा है कि सीमा पर स्थिति 1962 के युद्ध से भी ज्यादा गंभीर है। दोनों देश की सेनाओं के बीच पूर्वी लद्दाख में तनाव बरकरार है। पैंगोंग झील के दक्षिणी हिस्‍से में 29-30 अगस्‍त को चुशुल में भारत और चीन के सैनिकों की झड़प भी हुई है। सूत्रों का कहना है कि पीपुल्‍स लिब्रेशन आर्मी (पीएलए) के सैनिकों ने पैंगोंग झील के दक्षिणी किनारे पर स्थित ऊंची चोटियों पर कब्‍जा करने की कोशिश की थी। हालांकि भारतीय सेना ने उनकी ये कोशिश विफल कर दीं। इस बीच हर किसी के जहन में ये सवाल उठ रहा है कि अचानक चीन ऐसी हरकतें क्यों कर रहा है।

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    क्या है चीन का मकसद?

    क्या है चीन का मकसद?

    पांच मई से लद्दाख में जारी टकराव को लेकर कई कारण भी सामने आए हैं, जिनका मकसद सिर्फ एक ही दिखाई दे रहा है और वो है चीन के लोगों का ध्यान भटकाना। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, चीन भारत से ऐसे समय में भिड़ने की कोशिशों में लगा है, जब उसके यहां आंतरिक कलह मचा हुआ है। चीन में ना केवल खाने की किल्लत हो गई है बल्कि उद्योग पर भी बुरा असर पड़ा हुआ है। ऐसे में देश के लोगों में सरकार के प्रति विरोध उत्पन्न होना एक आम बात है, लेकिन विरोध की इन आवाजों को हिंसा नहीं बल्कि देशभक्ति याद दिलाकर खत्म करने की कोशिश हो रही है। यही तरीका साल 1962 में भी अपनाया गया था और अब 2020 में एक बार फिर इसी तरीके को अपनाया जा रहा है।

    साल 1962 में चीन में क्या हुआ था?

    साल 1962 में चीन में क्या हुआ था?

    कम्युनिस्ट नेता माओत्से तुंग ने 1962 के भारत-चीन युद्ध में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। उस वक्त उन्हें अपने ही देश में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। ग्रेट लेप फॉरवर्ड कार्यक्रम (Great Leap Forward programme) के तहत अपनाई जा रही नितियों के खिलाफ लोगों की आवाज उठने लगी थी। ये आवाज आम जनता से लेकर कम्युनिस्ट पार्टी में उनके प्रतिद्वंद्वि तक उठा रहे थे। इस कार्यक्रम की चर्चा बेहद कम ही होती है। लेकिन ऐसा कहा जाता है कि विरोध की आवाजों को बंद करने के लिए माओ ने भारत को उस समय एक सॉफ्ट टार्गेट समझा था। जानकारी के लिए बता दें ग्रेट लेप फॉरवर्ड कार्यक्रम को चीन की अर्थव्यवस्था और उद्योग में बढ़ोतरी के उद्देश्य से तैयार किया गया था। जो 1958 में शुरू होकर 1961 में खत्म हुई थी। इसकी नीतियों से सामाजिक और आर्थिक विपदा आई, लोगों का शोषण बढ़ा। किसानों को रात दिन काम करने को कहा जाता था।

    आज क्या है चीन की परेशानी?

    आज क्या है चीन की परेशानी?

    वहीं आज के चीन की बात करें तो वहां कुछ इसी तरह की स्थिति पनपी हुई है। यहां खाने की किल्लत हो रही है, कोरोना वायरस महामारी का असर अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। जिसके कारण राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने दो अभियानों को शुरू किया है। शी जिनपिंग बीते कुछ हफ्तों से घरेलू खपत बढ़ाने के लिए अभियान चला रहे हैं और उन्होंने 'क्लीन प्लेट ड्राइव' पहल को भी लॉन्च किया है। इनमें घरेलू खपत को बढ़ाने से साफ पता चलता है कि चीन की अर्थव्यवस्था गिर रही है। बेशक सरकार कितने भी दावे करे कि उसने कोविड-19 महामारी से हुए नुकसान की भरपाई कर ली है। लेकिन इस तरह के अभियान उसकी सच्चाई साफ दिखा दे रहे हैं। रिपोर्ट्स से पता चलता है कि चीन में प्रति व्यक्ति औसत खपत लगभग छह फीसदी कम हुई है। चीन में खुदरा बिक्री 11.5 प्रतिशत के करीब सिकुड़ गई है। जिससे शी जिनपिंग की चिंता बढ़ गई है।

    निर्यात पर अधिक टिकी है चीनी अर्थव्यवस्था

    निर्यात पर अधिक टिकी है चीनी अर्थव्यवस्था

    चीन की अर्थव्यवस्था निर्यात पर अधिक टिकी हुई है और दुनियाभर में फैले वायरस के कारण अन्य देशों के साथ व्यापार को लेकर जिनपिंग चिंता में हैं। जानकारी के अनुसार, चीनी सरकार ने संतुलन बनाए रखने के लिए निर्यात उन्मुख फैक्ट्रियों को घरेलू खपत के लिए काम करने को कहा है। इसके अलावा जैसी समस्या इस समय भारतीय झेल रहे हैं वैसी ही समस्याएं चीन के लोग भी झेल रहे हैं। जैसे बेरोजगारी बढ़ना और कमाई में कमी होना। इसके अलावा बेल्ट एंड रोड परियोजना के चलते चीनी खजाने को नुकसान पहुंच रहा है, जिसके कारण शी जिनपिंग को अपनी ही पार्टी के कुछ नेताओं की नाराजगी भी झेलनी पड़ रही है। अब शी जिनपिंग भी पार्टी में पनपे विरोध का माओत्से तुंग की तरह ही जवाब दे रहे हैं।

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