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चीन कर रहा है अमेरिका से भिड़ने की तैयारी, भारत तो सिर्फ एक बहाना है

नई दिल्ली- चीन इस वक्त अपने कई पड़ोसियों से उलझने की कोशिशों में जुटा हुआ है। लेकिन, उसका हर ऐक्शन ऐसा हो रहा है, जिससे वह कहीं न कहीं अमेरिका को उसकाने की कोशिश कर रहा है। भारत हो, जापान हो, वियतनाम हो या ताइवान चीन ने सबके साथ उलझने की कोशिश की है, सभी के क्षेत्रों में घुसपैठ का प्रयास किया है। गलवान घाटी की घटना के बाद गुरुवार को अमेरिका ने जो प्रतिक्रिया दी है, लगता है कि चीन उस स्थिति के लिए खुद को काफी समय से तैयार कर रहा है। आज की स्थिति ये है कि उसने अपनी सैन्य ताकत कहीं ज्यादा बढ़ा ली है। समंदर में उसने अमेरिका के भी दांत खट्टे करने की हैसियत बना ली है। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि चीन ने अपने पड़ोसियों को उकसा कर किस तरह से अमेरिका को संकेत देने की कोशिश की है, जो सटीक निशाने पर जाकर लगा भी है। अब चीन का आंकलन सही साबित होता है या गलत ये तो बाद में पता चलेगा, लेकिन जिस तरह से कोरोना के कारनामे के बाद मुंह छिपाने की जगह वह दादागीरी करने की कोशिश कर रहा है, उससे लगता है कि उसने जरूर कुछ न कुछ बहुत बड़ा सोच रखा है।

पड़ोसियों को उकसाने में जुटी है चीन की सेना

पड़ोसियों को उकसाने में जुटी है चीन की सेना

15 जून की रात जब पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में चीनी सेना ने भारतीय सैनिकों के साथ खूनी संघर्ष किया, उसी हफ्ते चाइनीज पनडुब्बी जापान के समुद्री इलाके के पास से होकर गुजरी थी। इसके चलते जापान के लड़ाकू विमानों और जहाजों ने उसका पीछा करना पड़ा था। चीन के लड़ाकू विमान और कम से कम एक बमवर्षक विमानों ने तकरीबन हर रोज ही ताइवान के एयरस्पेस में घुसपैठ की है। यूं समझिए की दुनिया कोरोना वायरस महामारी में उलझी रही और चीन की सेना इस दौरान पूरे समय अपने ही पड़ोसियों के इलाकों में अतिक्रमण की कोशिशों में जुटी रही। चीन की सेना ने जिस तरह से अपनी ताकत दिखाने की कोशिश की है, उससे पूरे एशिया ही नहीं वॉशिंगटन तक के कान खड़े हुए हैं।

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    कोरोना के बीच चीन अपनी ताकत दिखाना चाहता है

    कोरोना के बीच चीन अपनी ताकत दिखाना चाहता है

    एनवाईटी में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक यह चीन का सैन्य आत्मविश्वास और क्षमता तो दिखाता ही है, लेकिन कोरोना वायरस के बाद अमेरिका से टकराव, हॉन्ग कॉन्ग के भविष्य और उन सभी मुद्दों पर चीन की सोच को भी दिखाता है, जिसे वह अपनी संप्रभुता और राष्ट्र गौरव का केंद्र समझता है। वैसे चीन ने अपनी हर सैन्य कार्रवाई को रक्षात्मक बताया है, लेकिन इन सबसे युद्ध का जोखिम बढ़ा है, चाहे वह इस मानसिकता से किया जा रहा हो या नहीं। 15 जून की रात गलवान घाटी में उसके सैनिकों ने जिस तरह से भारत के जवानों के साथ हिंसक झड़प में उलझे वह भी उसी जोखिम को बयां करता है। भारत-चीन के बीच उस इलाके में 1967 के बाद से ऐसी खूनी हिंसा नहीं हुई थी। चाइनीज विश्लेषकों, भारतीय न्यूज रिपोर्ट्स और अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि इसमें चीनी सेना हताहत हुई हैं, जो कि उसके साथ 1979 के वियतनाम युद्ध के बाद पहलीबार हुआ है।

    कोरोना काल में 6.6% बढ़ाया रक्षा बजट

    कोरोना काल में 6.6% बढ़ाया रक्षा बजट

    चीन ने अबतक अपने इलाके और अपने हितों को ताकत के साथ संभाला है, लेकिन अब उसकी सैन्य शक्ति पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा बढ़ चुकी है। ऑस्ट्रेलिया के कैनबरा में चाइना पॉलिसी सेंटर के डायरेक्टर एडम नी कहते हैं, 'इसकी (चीन की) शक्ति दूसरे क्षेत्रीय ताकतों से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ी रही है।....इससे बीजिंग को अपने ज्यादा मुखर और आक्रामक एजेंडे को आगे बढ़ाने का हथियार मिल गया है। ' ऊपर से चीन की कमान इस वक्त बहुत ही महत्वाकांक्षी और अधिनायकवादी नेता शी जिनपिंग के हाथों में है। उन्होंने धीरे-धीरे चीन पर और चीन की पूरी सेना पर अपना प्रभुत्व कायम कर लिया है। दुनिया वुहान से निकले कोरोना वायरस में उलझी है और चीन ऐसे वक्त में भी अपनी सेना का बजट पिछले महीने 6.6 % बढ़ाने की घोषणा कर चुका है। इससे चीन का रक्षा बजट बढ़कर करीब 18,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर हो जाएगा, जो अमेरिकी रक्षा बजट का करीब एक-चौथाई है। ये हालात तब हैं जब कोरोना संकट के चलते दुनियाभर में सरकारें अपने खर्च में कटौती कर रही है।

    नौसेना में अमेरिका को भी दे सकता है टक्कर

    नौसेना में अमेरिका को भी दे सकता है टक्कर

    चीनी की सेना के बारे में आमतौर पर माना जाता है कि वह अमेरिका से काफी पीछे है। लेकिन, नौसेना के मामले में खासकर एंटी-शिप और एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइलों के मामले में इसने अपनी ताकत अमेरिका से कहीं ज्यादा बढ़ा ली है। पिछले साल के अंत तक अमेरिका के पास 285 जंगी जहाज थे, जबकि चीन के पास उससे कहीं ज्यादा 335 जंगी जहाज थे। अमेरिकी कांग्रेस की एक रिसर्च रिपोर्ट कहती है कि चीन अब पश्चिमी प्रशांत महासागर में अमेरिकी नौसेना के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन चुका है और दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने ऐसी चुनौती नहीं झेली है। इसी दम पर चीन कभी दक्षिण चीन सागर में अतिक्रमण बढ़ता है तो कभी ताइवान को और कभी वियतनाम के इलाके में घुसपैठ करता है। इसी तरह पूर्वी चीन सागर में वह जापान को उकसाने की कोशिश कर रहा है।

    पड़ोसियों से अमेरिका की नजदीकी खटक रही है

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    लेकिन, हाल के महीनों में चीन ने अपने पड़ोसियों को जहां कहीं भी उकसाने की कोशिश की है, उसकी सेना की सैन्य शक्ति की परीक्षा हो नहीं पायी है। पहली खूनी झड़प गलवान घाटी में हुई है, लेकिन यह लड़ाई भी चीनियों ने पत्थरों और कीलों वाले डंडों से लड़ी है, जिससे फिर एकबार उसे अपनी सेना की तैयारियों और असल क्षमता का अंदाजा नहीं लग पाया है। चीन की सेना को वहां कितना नुकसान हुआ है, इस की पुष्टि कर पाने की स्थिति में चीन के अलावा कोई नहीं है। वैसे कई भारतीय मीडिया रिपोर्ट्स और अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट बताती हैं कि चीन जानबूझकर हताहतों की संख्या छिपा रहा है और उसे अच्छा-खासा नुकसान हुआ है। माना जा रहा है कि वह इसलिए भी चुप हो सकता है क्योंकि, अगर उसे भारत से कम नुकसान हुआ है तो भारत में उसके खिलाफ भावना और ज्यादा भड़क सकती हैं, जबकि अगर वह संख्या कम बताता है तो उसका मनोबल पहले ही टूट सकता है। वैसे चीन के लिए भारत से तनाव महत्त्वपूर्ण तो है ही, लेकिन फिलहाल उसका असल निशाना अमेरिका है, जिसकी अपने आसपास की मौजूदगी उसे बहुत ज्यादा खटक रही है; और सच्चाई ये है कि अमेरिका दक्षिण चीन सागर में तो अपने सहयोगियों के साथ उसपर नजर रख ही रहा है, अब भारत से उसकी करीबी भी पहले से कहीं ज्यादा बढ़ चुकी है।

    दक्षिण चीन सागर में भिड़ंत की आशंका

    दक्षिण चीन सागर में भिड़ंत की आशंका

    चीन के इरादे से अमेरिका भी पूरी तरह से वाकिफ है। इसलिए वह भी खुलकर सामने आने की घोषणा कर चुका है। अमेरिका ने चीन को भारत के लिए खतरा मानते हुए और दक्षिण-पूर्व एशिया में उसकी हरकत का हवाला देते हुए यूरोप में मौजूद अपनी सेना की संख्या घटाने का ऐलान किया है। अमेरिका के सेकरेटरी ऑफ स्टेट माइक पोम्पियो ने चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी की कारगुजारियों को 'भारत के लिए खतरा' और वियतनाम, इंडोनेशिया मलेशिया, फिलीपींस और दक्षिण चीन सागर के लिए चिंता का विषय माना है। उन्होंने कहा है कि अमेरिका पीएलए को जवाब देने के लिए पूरी तरह से अपनी स्थिति को सुनिश्चित करना चाहता है। उन्होंने कहा कि यह हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौती है और हम ये सुनिश्चित कर लेना चाहते हैं कि हमारी सारी तैयारियां पुख्ता हों। यही वजह है कि इसी हफ्ते बीजिंग में एक कॉन्फ्रेंस के दौरान साउथ चाइनी सी के नेशनल इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष वू शिकुन ने कहा था, 'मुझे लगता है कि एक आकस्मिक गोले दागे जाने की संभावना बढ़ रही है।'

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