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छत्तीसगढ़: मनरेगा में काम नहीं, जाएं तो जाएं कहां...

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    महिला मजदूर
    Alok Putul/BBC
    महिला मजदूर

    "मुझे इस साल केवल 10 दिन काम मिला. और काम मिलता तो मैं और काम करती. लेकिन इसके बाद काम मिलना बंद हो गया."

    रेखा साहू धमतरी ज़िले के दरबा गांव में रहती हैं. इसी गांव के लेखन सपहा ने 12 दिन काम किया, जबकि भगवानदास सतनामी को याद ही नहीं है कि उन्होंने कितने दिन काम किया.

    रेखा साहू को नहीं पता कि छत्तीसगढ़ में मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना) के तहत 150 दिन काम दिए जाने का प्रावधान है.

    वहीं राज्य के सूखा प्रभावित इलाकों में सरकार ने अतिरिक्त 50 दिन यानी कुल 200 दिन रोजगार की गारंटी दी है.

    सरकार का 150 दिनों की रोज़ी-रोटी देने का दावा हकीकत से दूर दिखता है. लेकिन सरकार की अपनी दलील है.

    राज्य के पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के सचिव और रोज़गार गारंटी योजना के आयुक्त पीसी मिश्रा का कहना है कि गांव के लोग काम ही नहीं मांगते, इस कारण कार्य दिवस कम हैं.

    अलग-अलग तस्वीर

    वैसे लोगों को गांव में कुल कितने दिन काम मिला है, इसे लेकर भी मतभेद हैं.

    दरबा के पंचायत सचिव ज्ञानेंद्र चंद्राकर के मुताबिक़ मनरेगा के तहत गांव में तालाब को गहरा करने और नाला सफ़ाई करने का काम हुआ है और लोगों को औसतन 18 दिन का काम मिला है.

    दूसरी ओर पंचायत के रोज़गार सचिव मेहतरु सारंग के अनुसार लोगों को औसतन 40 दिन का काम मिला है.

    सरपंच हुमन साहू
    Alok Putul/BBC
    सरपंच हुमन साहू

    लेकिन गांव की सरपंच हूमन साहू कहती हैं, "मुझे याद है कि गांव में लोगों को औसतन 20 दिन का ही काम मिला है."

    हालांकि पंचायत की फ़ाइलों और भारत सरकार की वेबसाइट के आंकड़ों की पड़ताल से हमें पता चला कि दरबा पंचायत में 786 सक्रिय मज़दूरों को कुल 9,841 दिन काम मिला.

    इसका औसत निकालें तो पता चलता है कि प्रत्येक मज़दूर को 12.52 दिन काम मिला.

    रोज़गार की गारंटी

    दरबा गांव, राज्य के पंचायत विकास मंत्री अजय चंद्राकर के कुरुद विधानसभा का हिस्सा है. लेकिन रोज़गार गारंटी योजना का ये हाल केवल दरबा पंचायत या कुरुद भर का नहीं है.

    रायपुर से अपने गांव मुरा लौट रहे चंद्रहास को इस बात का दुख है कि उनके गांव में रोज़गार गारंटी का काम 12-15 दिन चला और फिर उन्हें मजदूरी की तलाश में रायपुर शहर का रुख़ करना पड़ा.

    चंद्रहास हर सुबह खाने का एक डब्बा पकड़ कर काम के लिए निकलते हैं. काम मिल गया तो ठीक नहीं तो दोपहर तक वो गांव लौट आते हैं.

    चंद्रहास कहते हैं, "पहले जब रोज़गार गारंटी शुरू हुआ था तो खूब काम मिलता था. लेकिन अब काम की तलाश में शहर जा कर भटकना पड़ता है."

    "काम न मिले तो भूखे पेट लौटता हूं क्योंकि खाना खा लिया तो एक तो काम का नुक़सान, फिर ऊपर से खाने का भी."

    मनरेगा
    Alok Putul/BBC
    मनरेगा

    श्रमिकों के जॉब कार्ड

    मुंगेली ज़िले के लिमहा में रहने वाले किसान नेता आनंद मिश्रा का कहना है कि पिछले चार सालों में सरकार ने जनता से सीधे तौर पर जुड़ी सारी योजनाओं को हाशिये पर कर दिया है.

    उनका दावा है कि रोज़गार गारंटी योजना में न तो मज़दूरी की गारंटी है और ना ही काम मिलने की.

    वो कहते हैं, "आप आंकड़े देखें तो छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार 150 और 200 दिन रोज़गार गारंटी की बात करती है लेकिन 2013-14 में इस सरकार ने 52 दिन, 2014-15 में 32 दिन, 2015-16 में 47 दिन, 2016-17 में 42 दिन और 2017-18 में 52 दिन का रोजगार दिया है. इस साल के आंकड़े तो और भी डराने वाले हैं."

    क्या कहते हैं केंद्र सरकार के आंकड़े?

    रोज़गार गारंटी को लेकर भारत सरकार की वेबसाइट की मानें तो 18 जुलाई 2019 तक छत्तीसगढ़ में रोजगार गारंटी के तहत कुल 87 लाख सात हज़ार 936 श्रमिक पंजीकृत हैं. इनमें से 59 लाख 69 हज़ार 460 सक्रिय श्रमिक हैं.

    इस वर्ष रोज़गार गारंटी योजना में मानव श्रम दिवस (मैनडेज़) की बात करें तो यह कुल 6 करोड़ 37 लाख 95 हज़ार 760 दिवस रहे. श्रमिकों के हिसाब से देखें तो प्रत्येक श्रमिक को इस साल महज़ 7.32 दिन ही काम मिला है.

    अगर रोज़गार गारंटी योजना के तहत छत्तीसगढ़ में बनाये गए लगभग 38 लाख 45 हज़ार जॉब कार्ड के हिसाब से देखें तो भी प्रति परिवार जो रोज़गार मिला है, वो केवल 16.59 दिन ही होता है.

    पंचायत कार्यालय
    Alok Putul/BBC
    पंचायत कार्यालय

    मज़दूरी भुगतान

    पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के सचिव पीसी मिश्रा के पास अपनी दलीलें हैं.

    वो कहते हैं, "हमारे पास मान लें कि 38 लाख परिवार हैं. उनमें से 15 लाख परिवार कभी रोजगार मांगते ही नहीं. रोजगार गारंटी योजना तो मांग आधारित है, जो मांगेगा उसे देंगे."

    "पिछले साल तो 3 लाख 27 हजार लोगों ने 100 दिन से अधिक दिन काम किया था."

    मामला केवल काम के दिन का नहीं है. रोज़गार गारंटी योजना में 15 दिन के भीतर मज़दूरी भुगतान के मामले में भी छत्तीसगढ़ फिसड्डी साबित हुआ है.

    इसी महीने तीन जुलाई को विधानसभा में राज्य के पंचायत मंत्री अजय चंद्राकर ने जो आंकड़े पेश किये हैं, उनके अनुसार 2016-17 की रोज़गार गारंटी का 56.88 लाख रुपये का भुगतान अभी भी लंबित है.

    इसी तरह 2017-18 की रोज़गार गारंटी योजना का 4878.46 लाख रुपये और 2018-19 का 8242 लाख रूपये का भुगतान सरकार ने अब तक नहीं किया.

    महिला मज़दूर
    Alok Putul/BBC
    महिला मज़दूर

    छत्तीसगढ़ सरकार पर आरोप

    रायपुर की ज़िला पंचायत अध्यक्ष शारदा देवी वर्मा का आरोप है कि कई मामलों में तो मज़दूरों का भुगतान कहीं और जमा कर दिया गया है और मज़दूर इस मामले में यहां से वहां भटक रहे हैं.

    उनका दावा है, "असल में देश के सभी डाकघरों को कोर बैंकिंग सॉल्यूशन से जोड़ने के चक्कर में पांच अंकों का खाता अब 10 नंबर का हो गया. इसके कारण राज्य में हज़ारों मज़दूरों की मज़दूरी किसी दूसरे के खाते में जमा हो गई."

    "खुद मेरे गांव के कई मज़दूरों के पैसे तो राजस्थान के डाक विभाग के खाते में जमा कर दिये गये हैं."

    छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता शैलेश नितिन त्रिवेदी कहते हैं, "रोज़गार गारंटी योजना अब गरीब किसानों और मजदूरों के लिए धोखाधड़ी वाली योजना साबित हो रही है."

    "आज से पहले कभी भी बस्तर से आदिवासियों का पलायन नहीं होता था. लेकिन सरकार की ओर से रोज़गार गारंटी योजना में काम नहीं दिए जाने के कारण बस्तर के आदिवासी आज आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र समेत दूसरे राज्यों की तरफ पलायन कर रहे हैं."

    "कहीं काम मिल रहा है तो बरसों-बरस काम के पैसे नहीं दिए जा रहे हैं. राज्य और केंद्र की भाजपा सरकार काम नहीं देने और काम कराने के बाद पैसे नहीं देने की गुनहगार है."

    प्रवासन
    Alok Putul BBC
    प्रवासन

    क्या कहते हैं मंत्री?

    राज्य के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री अजय चंद्राकर इन आरोपों से इनकार करते हैं.

    उनका कहना है, "कुछ जगहों में भुगतान में विलंब हुआ है लेकिन राज्य सरकार अधिकांश मामलों में समय पर मज़दूरी का भुगतान की कोशिश कर रही है."

    "डाकघरों के खातों में बदलाव के कारण मजदूरों के पैसे दूसरे ज़िले या दूसरे राज्य में जमा होने की शिकायत मिली थी. लेकिन अब लगभग 96 प्रतिशत श्रमिकों के खाते बैंकों में खुल गए हैं, इसलिए भविष्य में ऐसी किसी गड़बड़ी की आशंका नहीं है."

    छत्तीसगढ़ में 150 दिन और सूखाग्रस्त इलाकों में 200 दिन रोजगार की गारंटी देने के दावे पर चंद्राकर कहते हैं, "मनरेगा के प्रावधान के तहत हमारी सरकार ने प्रति परिवार 32 दिन का रोजगार उपलब्ध कराया है. अगर देश का औसत देखें तो यह केवल 28 दिन है. ऐसे में यह मानने का कोई कारण नहीं है कि हम रोजगार देने में पीछे हैं."

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    BBC Hindi
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    English summary
    Chhattisgarh there is no work in MNREGA so where we should go

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