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Chhattisgarh: क्या 66 रुपये की दिहाड़ी इंसानी जान से सस्ती है?छत्तीसगढ़ में हक मांगते-मांगते दो रसोइयों की मौत

Chhattisgarh Midday Meal Cooks Death: सिस्टम की नजर में आम जनता की जिंदगी की कीमत कितनी होती है, इसका ताजा और दर्दनाक उदाहरण छत्तीसगढ़ में देखने को मिला है। स्कूलों में मध्याह्न भोजन (Mid-Day Meal) बनाने वाली रसोइयों की मौत ने पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

अपने हक और बेहतर वेतन की मांग करते-करते दो महिला रसोइयों की जान चली गई। दरअसल, छत्तीसगढ़ में मिड-डे मील रसोइयों का अनिश्चितकालीन आंदोलन बीते 31 दिनों से जारी है।

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नया रायपुर के तूता धरना स्थल पर हजारों महिलाएं लगातार धरने पर बैठी हैं। इसी आंदोलन के दौरान दो रसोइयां-बलौद जिले की रुक्मणी सिन्हा और बेमेतरा जिले की दुलारी यादव-की तबीयत बिगड़ गई और इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।

Mid-Day Meal Meal Cooks Death: रसोइयों की कैसे हुई मौत?

रसोइया संघ ने आरोप लगाया है कि कड़कड़ाती ठंड और सरकार की बेरुखी इन मौतों की मुख्य वजह है। मृतकों में बालोद जिले की रहने वाली करीब 50 वर्षीय रुक्मणी सिन्हा और बेमेतरा जिले की करीब 60 वर्षीय दुलारी यादव शामिल हैं। दोनों महिलाएं छत्तीसगढ़ स्कूल मध्यान्ह भोजन रसोइया संयुक्त संघ के बैनर तले चल रहे आंदोलन में हिस्सा ले रही थीं, जिसमें दैनिक मजदूरी को 66 रुपये से बढ़ाकर 340 रुपये करने की मांग की जा रही है।

रुक्मणी सिन्हा: थकान समझकर किया गया नजरअंदाज

बालोद जिले की रहने वाली 50 वर्षीया रुक्मणी सिन्हा 24 जनवरी को प्रदर्शन स्थल पर बीमार पड़ गई थीं। उनके दामाद मुकेश कुमार के अनुसार, उन्हें लगा कि थकान और नींद की कमी के कारण उनकी तबीयत बिगड़ी है। लेकिन उसी रात हालत बिगड़ने पर उन्हें पहले बालोद और फिर राजनांदगांव मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया, जहाँ 26 जनवरी (गणतंत्र दिवस) को उन्होंने अंतिम सांस ली। डॉक्टरों के अनुसार, वे मधुमेह से पीड़ित थीं और कार्डियक अरेस्ट उनकी मौत का कारण बना।

दुलारी यादव की तबीयत बिगड़ी, अस्पताल में नहीं बची जान

60 वर्षीया दुलारी यादव बेमेतरा जिले से थीं। वे 23 जनवरी को आंदोलन में शामिल होने रायपुर आई थीं। 26 जनवरी को उनकी तबीयत बिगड़ने की खबर परिवार को मिली। उन्हें भिलाई के शंकराचार्य मेडिकल इंस्टीट्यूट में भर्ती कराया गया, जहाँ 27 जनवरी को उनकी मौत हो गई। अस्पताल के डॉक्टरों के अनुसार, उन्हें गंभीर 'निमोनिया' था और सांस लेने में भारी तकलीफ के कारण उन्हें वेंटिलेटर पर रखना पड़ा था।

₹66 Daily Wage Cooks: 66 रुपये बनाम 340 रुपये-रसोइयों की मांग क्या है?

'छत्तीसगढ़ स्कूल मध्याह्न भोजन रसोइया संयुक्त संघ' के बैनर तले लगभग 87,000 रसोइया हड़ताल पर हैं। उनकी मांग है कि कलेक्टर दर पर भुगतान किया जाए। वर्तमान में इन्हें मात्र 66 रुपये प्रतिदिन (2,000 रुपये प्रति माह) मिलते हैं। रसोइयों की मांग है कि इसे बढ़ाकर कम से कम 340 से 400 रुपये प्रतिदिन किया जाए।

पूर्णकालिक कर्मचारी का दर्जा दिया जाए। हड़ताल कर रहे लोगों का कहना है कि वे सुबह 9 बजे से शाम 3 बजे तक काम करती हैं, लेकिन सरकार उन्हें केवल अंशकालिक मानती है। इसके साथ ही उनकी मांग है कि उन्हें नौकरी की सुरक्षा की गारंटी दी जाए। स्कूलों के विलय या संख्या कम होने पर रसोइयों को हटाए जाने का डर बना रहता है।

सरकार व्यवस्था पर सवाल?

आंदोलन के बीच सरकार ने मानदेय में 25% की वृद्धि (करीब 500 रुपये महीना या 16.6 रुपये प्रतिदिन) का प्रस्ताव रखा है, जिसे रसोइयों ने मजाक बताते हुए ठुकरा दिया है। वहीं, लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) ने स्पष्ट किया है कि इन मौतों का आंदोलन से कोई सीधा संबंध नहीं है और ये महिलाएं पहले से ही अन्य बीमारियों से ग्रसित थीं।

आंदोलनकारी महिलाओं का दर्द सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। कई रसोइयों का कहना है कि 66 रुपये में आज के समय में एक किलो तेल भी नहीं आता। कड़ाके की ठंड में खुले आसमान के नीचे बैठी ये महिलाएं अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं।

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