छत्तीसगढ़: गोंड आदिवासी शव जलाने के बदले अब दफ़नाएंगे
छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के अंतिम संस्कार को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है.
राज्य के कबीरधाम ज़िले में दो दिनों तक चले गोंड आदिवासियों की महासभा में यह फ़ैसला लिया गया कि गोंड समाज में अब शवों को जलाया नहीं जाएगा, बल्कि उन्हें दफनाया जाएगा.
इस गोंड महासभा और युवक युवती परिचय सम्मेलन में सामाजिक और पारिवारिक कार्यक्रमों में शराब पर भी पाबंदी का प्रस्ताव पारित किया गया. इसके अलावा गोंड समाज में अमात गोंड, ध्रुव गोंड, राज गोंड जैसे विभाजनों को भी समाप्त करने का फ़ैसला लिया गया.
कबीरधाम ज़िले में गोंड समाज के महासचिव सिद्धराम मेरावी ने कहा, "पिछले कुछ सालों में तेज़ी से पेड़ कटे हैं. शवों को जलाने में बड़ी संख्या में लकड़ी का उपयोग होता है. ऐसे में पेड़ों को बचाने के दृष्टिकोण से यह ज़रूरी फ़ैसला है, जिसे हमने अपने संविधान में शामिल किया है."

राज्य में सर्व आदिवासी समाज के निवृत्तमान अध्यक्ष बीपीएस नेताम का कहना है कि आदिवासियों में शुरू से ही शवों को दफनाने की परंपरा थी लेकिन हिंदु धर्म के प्रभाव में आकर कुछ इलाकों में शवों को जलाया जाता है. अब इस फ़ैसले से उन पर भी असर पड़ेगा.
लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस फ़ैसले को सही नहीं मान रहा है.
छत्तीसगढ़ में संघ के प्रचार प्रमुख कनीराम नंदेश्वर ने बीबीसी से कहा, "जहां किसी परिवार में अग्नि संस्कार की परंपरा अनादि काल से चली आ रही है, ऐसे में अचानक ये बदलने का निर्णय जब हुआ है तो साज़िशन होगा या कुछ सोच कर किया होगा. हमने कहा है कि समाज प्रमुखों को इस पर बैठक कर के तय करना चाहिए कि जो फ़ैसला लिया गया है, उसे वह ग़लत मानते हैं कि सही मानते हैं, यह तय करें."
कनीराम नंदेश्वर इस फ़ैसले को किसी 'षड्यंत्र' का हिस्सा मानते हैं और इसे वे अच्छी स्थिति नहीं मानते हैं. लेकिन उनकी राय है कि इस पर अंतिम फ़ैसला आदिवासी समाज के प्रमुखों को ही लेना चाहिए.

कितनी पुरानी है परंपरा
2011 की जनगणना के अनुसार छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की आबादी 78.22 लाख थी, जो कुल आबादी का 30.62 फ़ीसदी थी.
आदिवासियों की इस आबादी में सबसे बड़ी संख्या गोंड आदिवासियों की है और राज्य में इनकी 40 से अधिक उपजातियां हैं.
राज्य के दक्षिण हिस्से में तो आम तौर पर आदिवासियों में शवों को दफ़नाने की ही परंपरा रही है. लेकिन पूर्वी हिस्से और बीच के मैदानी इलाक़ों में शवों को जलाने की भी प्रथा रही है.
राज्य के अलग-अलग इलाक़ों में गोंड आदिवासियों में दफनाई हुई जगह पर मृतक स्तंभ भी बनाने की परंपरा है.
इन लकड़ी, लोहा या सीमेंट से बनाए गए मृतक स्तंभ में मृतक के कामकाज या उसकी प्रिय वस्तु की तस्वीर या मूर्ति बनाई जाती है.
छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की अनुसूचित जनजाति मोर्चा के अध्यक्ष विकास मरकाम शवों को दफनाये जाने के फ़ैसले को राजनीतिक चश्मे से देखे जाने के ख़िलाफ़ हैं.
विकास मरकाम का कहना है कि यह कोई राजनीतिक फ़ैसला नहीं है, यह समाज का फ़ैसला है. विकास इसे एक सही फ़ैसला ठहरा रहे हैं.
उनका कहना है कि पहले भी लोग शवों को अपने खेत-खलिहान में दफनाते ही थे.

किसने किया समर्थन?
उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से यह ठीक क़दम है. दाह संस्कार में बहुत सारी लकड़ियों को जलाना पड़ता है. एक दाह संस्कार में कई क्विंटल लकड़ी लगता है. समाज के इस फ़ैसले से पेड़ बचेंगे."
भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे आदिवासी नेता बीपीएस नेताम का कहना है कि आदिवासी प्रकृति पूजक रहा है और कबीरधाम ज़िले में गोंड समाज ने जो फ़ैसला लिया है, वो बिल्कुल उसी के अनुरूप है.
वे कहते हैं, "आदिवासियों में शवों को दफ़नाने की ही परंपरा रही है. जलाते वो लोग हैं, जो अपने आप को सभ्य समाज, ज्यादा पढ़े-लिखे, ज़्यादा ऊंचे पद के अपने आप को मानते हैं. दूसरे समाज की देखा-देखी, नक़ल कर के भले जलाते हैं, जला कर उसे गंगा में विसर्जन करेंगे. लेकिन गोंड़ समाज में ऐसा नहीं है."
बीपीएस नेताम बताते हैं कि दूसरे समाज में किसी के अंतिम संस्कार में महिलाएं शामिल नहीं होतीं लेकिन गोंड आदिवासी समाज में महिलाएं बराबरी से अंतिम संस्कार में शामिल होती हैं और दफनाने की प्रक्रिया में भी शामिल होती हैं.
वे कहते हैं, "इस फ़ैसले से दुखी वही लोग हैं, जो आदिवासियों की सांस्कृतिक पहचान के ख़िलाफ़ हैं. आदिवासी समाज ऐसे लोगों को पहचान चुका है."
राज्य में सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी भी आदिवासियों के इस निर्णय में उनके साथ है.
पार्टी के मीडिया प्रमुख शैलेष नितिन त्रिवेदी का कहना है कि उनकी सरकार आदिवासियों के इस निर्णय के साथ है.
वे कहते हैं, "संविधान ने आदिवासियों को रीति रिवाजों के मामले में विशेष अधिकार दिये हैं जिन्हें आदिवासियों के फ़ैसले में षड्यंत्र नज़र आ रहा है, वे असल में संविधान विरोधी हैं."
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