चारधाम सड़क योजना- जान लें कि ये महापरियोजना है क्या?

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उत्तराखंड के चार धामों को जोड़ने वाली 'ऑल वेदर रोड' परियोजना का काम धड़ाधड़ जारी है.

काम की तेज़ी और मशीनों का शोर इतना ऊँचा है कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी के नोटिसों की फड़फड़ाहट भला किसे सुनाई देगी.

ये बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री को आपस में चौड़ी और हर मौसम में खुली रहने वाली सड़क से जोड़ने की परियोजना है.

चौड़ी सड़कें भला किसे पसंद न होंगी, किसे चट्टानों के खिसकने से बेखौफ होकर निर्बाध पहाड़ी रास्तों पर सफ़र करना और समय पर अपने ठिकाने पर पहुंच जाना अच्छा नहीं लगेगा.

लेकिन ये सवाल क्या कम अहम है कि ये जंगल दोबारा मिल सकेगा?

ये पेड़, ये वनस्पति, ये मिट्टी, ये हवा, ये नमी, ये ज़मीन से झांकते नन्हें फूल, ऐन पहाड़ों की किसी नम फिसलन से अचानक प्रकट होते जाते ये जल-स्रोत. ये मोड़, ये घाटी का अनंत विस्तार.

उत्तराखंड के जंगलों में किन वजहों से फैली आग?

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आज का विकास इस रुमानियत को पहचान लेता और उसे न छेड़ता अगर वह सचमुच मानव और प्रकृति के रिश्ते को समझता.

हाईवे के लिए कटे 25 हज़ार पेड़

पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस हाइवे परियोजना का उद्घाटन किया था. अब तक करीब 400 किलोमीटर तक सड़कें चौड़ी की जा चुकी हैं लेकिन बताया जाता है कि इस दौरान करीब 25 हजार पेड़ काटे गये हैं.

पर्यावरणवादी चिंतित हैं लेकिन सरकार की तरफ़ से कोई टिप्प्णी नहीं आई है.

पर्यावरण मामलों पर कार्यरत रिटायर्ड प्रोफेसर बीएस नेगी कहते हैं, "मैंने इस परियोजना के काम को देखा है. पहाड़ जिस ढंग से काटे जा रहे हैं, मोड़ जिस तरह से निकाले जा रहे हैं, वो जोखिम भरा है. और मलबे की डंपिंग को लेकर कोई नीति नहीं है. मानक के प्रश्न तो हैं ही."

मई के आखिरी सप्ताह में पीएम मोदी ने शक्तिशाली ड्रोन कैमरों से परियोजना पर जारी कार्य को देखा.

इस मौके पर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा कि ये सर्वोच्च प्राथमिकता का काम है और जल्द से जल्द ये काम पूरा होना चाहिए.

राज्य के मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह ने मीडिया को बताया, "हम पहाड़ काटने या रिटेनिंग दीवार लगाने जैसे कार्यों पर भी नज़र रख रहे हैं.

गुणवत्ता बनाए रखने के साथ-साथ हमें पहाड़ी क्षेत्र की पारिस्थितिकीय और पर्यावरणीय संवेदनशीलता को भी ध्यान में रखना है."

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जान लें कि ये महापरियोजना है क्या?

केंद्र की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत चीन सीमा और चार धामों तक पहुंचने वाली सड़कों को उच्च स्तर का बनाया जाना है.

इसे चार धाम यात्रा मार्ग का पुनरुद्धार भी कहा जा रहा है.

करीब 12 हजार करोड़ रुपए की और 880 किलोमीटर से ज़्यादा सड़क चौड़ीकरण वाली इस परियोजना को अगले साल मार्च तक पूरा करने का लक्ष्य था.

लेकिन पिछले दिनों लोकसभा में सरकार ने बताया कि मार्च 2020 तक सामरिक, कारोबारी, और पर्यटनीय महत्त्व का ये नेटवर्क तैयार हो जाएगा.

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सड़क परिवहन और जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी इसे नये उत्तराखंड का सूचक तो बता ही चुके हैं.

यानी ये सड़क नेटवर्क, पहाड़ी राज्य के विकास को नयी गति देगा. और देखते ही देखते उत्तराखंड एक स्मार्ट, वाइब्रेंट, हाईफाई राज्य हो जाएगा.

'ऑल वेदर रोड' के बारे में सरकारी दावा है कि इससे राज्य की उन्नति होगी, पर्यटन बढ़ेगा, ग़रीबी दूर होगी, निवेश आएगा वग़ैरह.

दावे अपनी जगह सही हैं. विकास के सपनों में भी कोई हर्ज भी नहीं है, देखने ही चाहिए.

लेकिन ये सड़कें क्या उत्तराखंड के पर्यावरण को दुरुस्त कर देंगी या पलायन की तीव्र दर को रोक देंगी या रोजगार के नये अवसर पैदा कर पाएंगी- इस तरह के बहुत से सवाल आम लोगों से लेकर पर्यावरणवादियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं तक, सबके मन में हैं.

उत्तराखंड वालों के मन में हैं कई सवाल

टिहरी जिले के मूल निवासी अध्यापक लोकेश कहते हैं, "सड़कें चौड़ी तो होनी ही चाहिए. ये काम आज नहीं तो कल होना ही है. अब इसका फायदा हमारे लोगों को मिलेगा या नहीं, ये तो सब नेताओं के रवैए और यहां की सरकार पर ही निर्भर है."

ऋषिकेश गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग जो बड़ी तेजी से बन रहा है, वहां आगराखाल नाम के एक छोटे से कस्बे में चाय-नाश्ते की दुकान के आगे लंबी मोटी चद्दरें लटका दी गईं थीं. आगराखाल के छोले और रबड़ी बहुत मशहूर रहे हैं.

धूल की शिकायत करने पर काउंटर से अगल बगल देखकर, दुकानदार फुसफुसा कर बोला, "आप त यखीका छन. भैजी यनु छ, चीन का त बाखरा भी एगैन बल अर हमारा टैंक तोपी कनकै जाळा तख तलक. चीन कु जवाब कनकै दे सकळा...." (आप तो यहीं के हैं. बड़े भाई ऐसा है, चीन की तो बकरियां आ गई वहां तक और हमारे टैंक और तोप कैसे जाएंगें वहां तक. चीन को जवाब कैसे देंगे....)

फिर अपने ही तर्क पर आश्वस्त होते हुए सांस छोड़ते हुए बोला, "यांकी खातिर यी सड़की चौड़ी छन होणी. क्या बात आप कना." (इसीलिए सड़क चौड़ी की जा रही है. क्या बात करते हैं आप.)

धूल से ढकी है आवोहवा

एक नैरेटिव ये पहुंचाया गया है. सड़क निर्माण, बड़ा निवेश, कॉरपोरेट पूंजी, और मद्धम-मद्धम सैन्य राष्ट्रवाद.

यहाँ धूल की मोटी चादर वास्तविकता को ढँक चुकी है.

चार धाम सड़क परियोजना पर्यटकों को सुविधा देगी लेकिन इसका कोई निर्धारित पैमाना हो सकता है क्या.

क्या पहाड़ी सड़कों पर हम मैदानी हाइवे की तरह हवा से बात करने के लिए आते हैं?

इन सारे सवालों का जवाब ये परियोजना नहीं देती. इसकी मंशा तो मानो ये है कि पहाड़ की सड़कें हवा से बातें करें.

चौड़ा करने से पहले यातायात को नियंत्रित किए जाने की जरूरत है. वाहनों की भीड़, डीजल, पेट्रोल के प्रदूषण के अलावा प्लास्टिक ने भी हिमालय को तबाह कर दिया है.

एनजीटी ने केंद्र और राज्य सरकार को इस बारे में नोटिस भी दिया है.

ये कारण बताओ नोटिस सिटीजन्स ऑफ़ दून नामक स्वयंसेवी संस्था की उस याचिका के बाद आया जिसमें मीडिया खबरों के मुताबिक आरोप लगाया गया था कि इस सड़क प्रोजेक्ट के तहत 356 किलोमीटर के वन क्षेत्र में कथित रूप से 25 हजार पेड़ काट डाले गए.

इनवॉयरेन्मेंटल इम्पैक्ट असेसमेंट (ईआईए) को लेकर भी ये परियोजना खामोश है. तीसरी बात ये प्रोजेक्ट, उत्तरकाशी की भागीरथी घाटी के पर्यावरणीय लिहाज से संवेदनशील उस क्षेत्र से भी गुजरेगा जिसे इको सेंसेटिव ज़ोन घोषित किया जा चुका है.

चौथा आरोप ये है कि सड़क निर्माण का मलबा बड़े पैमाने पर नदी घाटियों में ही डंप किया जा रहा है. चार धाम प्रोजेक्ट के तहत 15 बड़े पुल, 101 छोटे पुल, 3596 पुलिया और 12 बाइपास सड़कें, बनाई जाएंगी.

मीडिया में आई खबरों की मानें तो एनजीटी ने फिलहाल अपना आदेश सुरक्षित रखा है.

क्या सोच-समझकर हुआ पर्यावरण का दोहन?

नोटिस के जवाब में केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने कहा है कि उसने कोई अनाप-शनाप पेड़ नहीं काटे हैं और राष्ट्रहित में ये परियोजना जरूरी है, चीन सीमा से जुड़ी सड़कों के चौड़ीकरण में देश का सामरिक हित भी जुड़ा हुआ है.

सरकार ने अपने जवाब में ये भी कहा है कि इस प्रोजेक्ट को इन्वॉयरोन्मेंटल क्लियरेंस की दरकार नहीं है क्योंकि इसके 53 खंडों में से कोई भी 100 किलोमीटर से अधिक नहीं है.

याचिका की शिकायत यही है कि जान-बूझकर इस टुकड़ों में रखा गया है ताकि मनमाने से तरीक़े से काम किया जा सके.

लेकिन ध्यान रहे इस परियोजना से इतर ऋषिकेश से श्रीनगर (गढ़वाल) तक रेलमार्ग परियोजना भी स्वीकृति हो चुकी है जिसमें बड़े पैमाने पर जंगल और वन्य जीवन प्रभावित होगा.

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पहाड़ों को काटकर सुरंगे और पुल निकाले जाने का प्रस्ताव है. टिहरी बांध विस्थापन के यथार्थ में जगमगा ही रहा है. उधर पिथौरागढ़ घाटी, पंचेश्वर की आने वाली बांध परियोजना से सहमी हुई है.

सरकार तो रोप-वे और केबल कार आदि को भी बढ़ावा देने की योजना बना रही है.

इन्हें पहाड़ों में यहां से वहां जाने के लिए सुगम साधन बताया जा रहा है. नितिन गडकरी ने तो ये आइडिया उछाल दिया है. आइडिया से भला क्या एतराज़, लेकिन प्राथमिकताएं भी तो देखनी होंगी.

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आप सोचिए, कुल मिलाकर हो क्या रहा है. हिमालय हलचल भरा पहाड़ भी है.

भूगर्भ के विक्षोभ को वही जन्म भी देता है. टेक्टोनिक प्लेटें उसके नीचे रगड़ खा रही हैं. इसकी अनदेखी के परिणाम भयावह हो सकते हैं.

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