समलैंगिक शादियों को लेकर दिल्ली HC में केंद्र सरकार ने रखा पक्ष, कहा- भारतीय संस्कृति में इसकी इजाजत नहीं
नई दिल्ली: समान सेक्स यानी समलैंगिक विवाहों को मान्यता देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार ने गुरुवार को अपना पक्ष रखा। केंद्र सरकार ने याचिकाओं का विरोध करते हुए कहा कि समलैंगिक शादी का विचार भारतीयों के लोकाचर और संस्कृति के पक्ष में नहीं है। केंद्र सरकार ने एलजीबीटीक्यू समुदाय से संबंधित चार लोगों की ओर से दिल्ली हाई कोर्ट में दायर याचिका के जवाब में कहा कि कानून केवल पुरुष और महिला के बीच विवाह को मान्यता देता है। याचिकाकर्ताओं ने दिल्ली उच्च न्यायालय से आग्रह किया था कि विशेष विवाह अधिनियम (एसएमए) के तहत किसी भी दो व्यक्तियों के बीच विवाह की घोषणा की जाए।

केंद्र सरकार ने अपनी बात रखते हुए कहा कि समान लिंग का एक साथ रहना और एक ही व्यक्ति से यौन संबंध बनाना, एक पति, पत्नी और बच्चों की भारतीय परिवार इकाई की अवधारणा के साथ तुलना नहीं की जा सकती। सरकार ने यह बात समान लिंग वाले दंपतियों की दायर याचिकाओं के एक जवाबी हलफनामे में कही है, जो पार्टनर की पसंद के मौलिक अधिकार को लागू करने की मांग करता हैं। सरकार ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के हटाने के बावजूद याचिकाकर्ता समान विवाह के लिए मौलिक अधिकार का दावा नहीं कर सकते हैं। केंद्र सरकार ने साफ कर दिया कि आर्टिकल 21 के तहत समलैंगिक विवाह किसी भी सूरत में मौलिक अधिकारों की श्रेणी में नहीं आता है।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि वो पहले की याचिकाओं पर जवाब दाखिल करेगी, जिसके बाद 20 अप्रैल तक सुनवाई टल गई है। केंद्र सरकार ने पहले हाई कोर्ट को बताया था कि समान लिंग वाले जोड़ों के बीच विवाह अनुमति नहीं है। क्योंकि इसे हमारा कानून, समाज और हमारी संस्कृति मान्यता नहीं देती।












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