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जब शहीद की आखिरी इच्छा पूरी करने के लिए 74 साल के पिता चढ़ गए 16000 फीट का पहाड़

नई दिल्ली: कारगिल युद्ध की शुरुआत 3 मई 1999 को हुई थी, जो 26 जुलाई 1999 को खत्म हुआ। इस लड़ाई में भारतीय सेना ने अपने अद्मय साहस का परिचय देते हुए पाकिस्तानी घुसपैठियों से सारी जमीन छुड़ा ली, लेकिन इसकी भारी कीमत भी हमको चुकानी पड़ी। इस युद्ध में हमारे देश के करीब 527 जवान शहीद हुए थे। इसमें एक नाम था कैप्टन विजयंत थापर का, जिनकी बहादुरी के किस्से आज भी अमर हैं।

ज्वाइनिंग के 6 महीने बाद युद्ध

ज्वाइनिंग के 6 महीने बाद युद्ध

26 दिसंबर 1976 को जन्मे विजयंत के पिता, दादा, परदादा सब भारतीय सेना में रहे। अपने परिवार की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने भी 12 दिसंबर, 1998 को भारतीय सेना के राजपूताना राइफल्स में कमिशन प्राप्त किया। उनकी सर्विस को 6 महीने भी नहीं हुए थे कि कारगिल की जंग शुरू हो गई और उनको वहां पर तैनात किया गया।

'थ्री पिम्पल्स' के पास हुए शहीद

'थ्री पिम्पल्स' के पास हुए शहीद

राजपूताना राइफल्स को तोलोलिंग की पहाड़ी का कब्जा करने की जिम्मेदारी मिली थी। वहां पर दुश्मन इतनी स्ट्रांग पोजिशन में था कि भारतीय जवानों को ऊपर जाने का मौका ही नहीं मिल पा रहा था। इस युद्ध में अपनी टीम का कुशल नेतृत्व करते हुए विजयंत की टीम ने तोलोलिंग पर तिरंगा फहराया। इसके बाद उनको 'थ्री पिम्पल्स' पर कब्जा करने की जिम्मेदारी मिली। उनकी टीम ने वो इलाका दुश्मन से छीन लिया, लेकिन विजयंत इस जंग में शहीद हो गए। इसके बाद उनके परिवार को एक खत मिला, जिसको पढ़कर सबकी आंखों में आंसू आ गए।

खत में थीं ये बातें

खत में थीं ये बातें

खत में विजयंत ने लिखा था कि डियर पापा-मम्मी, जब ये खत आपको मिलेगा, तो मैं दूर ऊपर आसमान से आपको देख रहा होऊंगा। अगर मैं दोबारा पैदा हुआ तो इंडियन आर्मी में जाऊंगा। मुझे उम्मीद है कि मेरी फोटो मेरे यूनिट के मंदिर में करनी माता के साथ रखी जाएगी। आप अनाथालय में कुछ पैसे देना और कश्मीर की रुखसाना को हर महीने 50 रुपये भेजते रहना। अगर हो सके तो आप जरूर उस जगह को आकर देखना, जहां आपके कल के लिए भारतीय सेना लड़ रही है।

74 की उम्र में चढ़ा पहाड़

74 की उम्र में चढ़ा पहाड़

विजयंत के जाने के कई सालों बाद उनके पिता कर्नल (सेवानिवृत्त) विजेंद्र थापर शहीद बेटे की आखिरी इच्छा पूरी करने निकल पड़े। उन्होंने 74 साल की उम्र में 16 हजार फीट की चढ़ाई चढ़ी और उस जगह पर पहुंचे, जहां विजयंत लड़ते हुए शहीद हुए थे। वहां पर उन्होंने काफी वक्त बिताया और अपने बेटे को याद किया। विजयंत की शहादत पर पूरे देश को गर्व है। इस वजह से सरकार ने उनके नाम पर नोएडा की एक सड़क का भी नाम रखा है।

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