क्‍या राष्‍ट्रपति से मंंजूरी मिलने के बाद खत्‍म हो सकता है वक्‍फ विधेयक? SC में चैलेंज किए जा चुके ये कानून

Waqf Act: राष्‍ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी और हस्ताक्षर के बाद वक्फ संशोधन विधेयक अब कानून बन गया है। विपक्षी पार्टियों के तमाम विरोध और हंगामे के बावजूद ये विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित हो गया। सरकार इस कानून को लेकर आशावादी दिख रही है, लेकिन विपक्ष और मुस्लिम समुदाय का विरोधी बता रहा है। इतना ही नहीं वक्‍फ एक्‍ट के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में हिंसा भड़क उठी। वहीं अन्‍य कई राज्‍यों में इसका विरोध हो रहा है।

कांग्रेस और एआईएमआईएम और आप ने सुप्रीम कोर्ट में इस कानून को चुनौती दी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्‍या राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद भी इस कानून को रद्द किया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट क्‍या वक्‍फ विधेयक को र रद्द कर सकता है? जानिए क्‍या कहता है कानून

Waqf Law

संविधान के अनुसार भले ही कोई विधेयक लोकसभा और राज्‍यसभा दोनों में पारित हो चुका हो और राष्‍ट्रपति ने इसे मंजूरी देकर इसे अनुमोदित किया हो तो भी सुप्रीम कोर्ट वक्‍फ विधेयक को रद्द कर सकता है। अगर ये साबित हो जाता है कि कानून संविधान के मूल ढांचे को चुनौती देता है तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। न्यायिक समीक्षा की यह शक्ति सर्वोच्च न्यायालय को यह निर्धारित करने की अनुमति देती है कि कोई कानून संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन करता है या नहीं।

भारत के संविधान में ऐसे कानूनों को चुनौती देने की व्यवस्था है, जो कानूनी व्यवस्था के आधारभूत ढांचे का उल्लंघन करते हैं। अनुच्छेद 32 के तहत, कोई भी पक्ष यह तर्क दे सकता है कि कोई नया अधिनियमित कानून या विधेयक संविधान के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करता है। यह प्रावधान सर्वोच्च न्यायालय को विधायी कार्रवाइयों की समीक्षा करने और संभावित रूप से उन्हें पलटने का अधिकार देता है।

सर्वोच्च न्यायालय में अक्सर मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आरोपों के तहत मामले जब आते हैं तो भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) द्वारा गहन जांच की जाती है।

वक्‍फ विधेयक से पहले सुप्रीम कोर्ट में सीएए-एनआरसी विवाद और अनुच्छेद 370 को चुनौती दी जा चुकी है। इन मामलों को भी मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के दावों को न्यायपालिका के समक्ष विचार के लिए लाया गया था।

विपक्ष के लिए मुख्य चुनौती सुप्रीम कोर्ट में यह साबित करना है कि यह कानून संविधान को चुनौती देता है। विपक्ष का तर्क है कि यह कानून गैर-मुसलमानों को वक्फ बोर्ड में भाग लेने की अनुमति देकर मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है, जिससे उनके अधिकारों को नुकसान पहुंच सकता है। अगर अदालत विपक्ष के तर्कों से सहमत होती है, तो सरकार को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

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