'2जी स्पैक्ट्रम पर सीएजी की रिपोर्ट सही थी'

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बहुचर्चित 2जी घोटाले में दूरसंचार मंत्री ए. राजा और कनिमोड़ी समेत सभी 17 अभियुक्तों को बरी कर दिया गया है. इन 17 अभियुक्तों में 14 व्यक्ति और तीन कंपनियां (रिलायंस टेलिकॉम, स्वान टेलिकॉम, यूनिटेक) शामिल थीं.

इन लोगों के ख़िलाफ़ धारा 409 के तहत आपराधिक विश्वासघात और धारा 120बी के तहत आपराधिक षडयंत्र के आरोप लगाए गए थे लेकिन अदालत को कोई सबूत नहीं मिला है.

ये घोटाला साल 2010 में सामने आया जब भारत के महालेखाकार और नियंत्रक (कैग) ने अपनी एक रिपोर्ट में साल 2008 में किए गए स्पेक्ट्रम आवंटन पर सवाल खड़े किए. सीएजी की जिस रिपोर्ट को आधार बनाकर ये मुकदमा चलाया गया था, उसे तैयार करने में आरबी सिन्हा ने अहम भूमिका निभाई थी.

सिन्हा उस वक्त सीएजी मुख्यालय में 'महानिदेशक, रिपोर्ट्स' के पद पर तैनात थे. वो दूरसंचार और रक्षा मामले देखते थे. 2जी घोटाले से जुड़ी रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया में वो शुरू से ही जुड़े थे. वो इस रिपोर्ट के लिए फ़ील्ड में काम कर रही टीम का मार्गदर्शन करते थे. उन्हीं के कार्यकाल में रिपोर्ट को संसद में पेश किया गया था.

बीबीसी संवाददाता मानसी दाश ने उनसे बातचीत की.

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आरबी सिन्हा का पक्ष

कोर्ट का ये फैसला मामले के क्रिमिनल एंगल को लेकर आया है, न कि स्पेक्ट्रम आवंटन की कमियों या गड़बड़ियों को लेकर. आवंटन करने में गड़बड़ियां तो निश्चित तौर पर हुई थी. सुप्रीम कोर्ट ने भी माना था मनमाने ढंग से आवंटन हुआ है और ए राजा की ओर से दिए गए 122 साइसेंस रद्द कर दिए थे.

लेकिन मामले में आपराधिक षडयंत्र को लेकर सीएजी की रिपोर्ट में कुछ नहीं लिखा गया था. ईडी और सीबीआई ने इसकी जांच की थी और वही इस मामले को स्पेशल कोर्ट लेकर गई थीं. सीएजी की रिपोर्ट में कोई कमी नहीं थी. हमारे पास सारे दस्तावेज थे.

सीएजी की रिपोर्ट अपने आप में बहुत ही विस्तृत दस्तावेज होता है, जिसे सरकार के दस्तावेजों की जांच कर बनाया जाता है. सीएजी की रिपोर्ट में ही कुछ सबूत भी डाले गए थे और उन सबूतों से साफ तौर पर पता चलता है कि गड़बड़ियां हुईं थी. जो एलिजिबल नहीं थे उन्हें आवंटन दिया गया.

रिपोर्ट में दो-तीन बातें प्रमुख रूप से कहीं गई थी. एक तो ये कि स्पेक्ट्रम का आवंटन सही ढंग से नहीं किया गया था. दरअसल स्पेक्ट्रम के आवंटन की प्रक्रिया सरकार की तय नीति के हिसाब से नहीं की गई थी. कुछ कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए उस नीति में छेड़छाड़ किया गया.

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सीएजी की रिपोर्ट में थे कई एस्टिमेट

वो कंपनियां जो टेलिकॉम सेक्टर में थी ही नहीं, उन्होंने जल्दबाज़ी में 15-20 दिनों में नई कंपनी बनाई. उन कंपनियों को लाइसेंस दे दिए गए, जो अभी कंपनी के तौर पर मान्य भी नहीं थी. स्पेक्ट्रम की निलामी कराए जाने की स्थिति में हमने तीन-चार एस्टिमेट दिए थे. उसमें से एक एस्टीमेट एक लाख 76 हज़ार रुपया का था.

दो और एस्टीमेट थे जिसमें एक 50-55 हज़ार से 65 हज़ार के बीच रिकवरी का था. इसलिए ये कहना गलत होगा कि सीएजी ने सिर्फ एक एस्टिमेट- एक हज़ार 76 हज़ार रुपए के नुकसान का ही दिया था. क्योंकि ये इवेंट हो चुके थे, इसलिए इसका अनुमान लगाना बहुत ही कठिन काम था.

सीएजी ने किस तरह से आकलन किया इसके भी तीन तरीके बताए गए थे. आकलन के तरीकों में ज्यादातर एक लाख 76 हज़ार को निकालने का तरीका था, इसलिए मीडिया ने इसे पिक कर लिया. हमारी रिपोर्ट को गलत नहीं ठहराया गया है.

ऐसा संवैधानिक प्रावधान है, कि सीएजी की रिपोर्ट पब्लिक अकाउंट्स कमिटी (लोक लेखा समिति) में जाती है. फिर पीएसी उसपर संसद में रिपोर्ट देती है. सात साल हो गया इसपर चर्चा नहीं हुई. वहां भी ये राजनीतिक कारणों से अटकी पड़ी है. हो सकता है पीएसी उसपर एक्शन ले.

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