कई राज्यों से ज़्यादा है बीएमसी का बजट

शिवसेना और भाजपा के तल्ख रिश्तों के कारण बीएमसी चुनाव हुआ मज़ेदार।

बृहनमुंबई महानगर पालिका
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बृहनमुंबई महानगर पालिका

बृहन्मुंबई महानगर पालिका यानी बीएमसी का सालाना बजट 37,052 करोड़ रूपए का है. यह भारत के 16 राज्यों के वार्षिक बजट से भी ज़्यादा है.

इन राज्यों में केरल, ओडिशा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड और उत्तराखंड जैसे राज्य शामिल हैं.

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यही वजह है कि बीएमसी के चुनावों को लेकर काफी गहमा-गहमी रहती है.

227 सीटों वाली बीएमसी में अबतक भाजपा-शिवसेना गठबंधन का बहुमत था. इस बार दोनों के रिश्तों में तल्खियों की वजह से यह चुनाव काफ़ी मज़ेदार हो गया है.

मुंबई
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भाजपा और शिव सेना का रिश्ता कुछ ऐसा है कि जब-जब शिवसेना मज़बूत होती है तो भाजपा कमज़ोर होने लगती है.

उसी तरह जब भाजपा मज़बूत होती है तो शिवसेना कमज़ोर पड़ जाती है. मगर देखने में तो लगता था कि शिवसेना और भाजपा साथ में थे. लेकिन असल में राजनीतिक रूप से वो कभी साथ नहीं थे.

कमोबेश यही रिश्ता कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के बीच भी रहा है. ये दोनों दल सरकार चला चुके हैं. लेकिन ये दोनों भी कभी राजनीतिक रूप से साथ-साथ नहीं चले थे.

बृहन्मुंबई नगर निगम के चुनाव को लेकर मुंबई के आम लोगों के बीच हमेशा काफी उत्साह रहता है. चाहे वो कोई भी हों. यह चुनाव भी आम चुनाव या फिर विधानसभा के चुनावों से कहीं कम भी नहीं हैं.

बीएमसी
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कॉरपोरेट घरानों के बड़े नामों के साथ साथ बॉलीवुड के कलाकार तक बीएमसी के चुनाव में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं.

इसका कारण यह है कि कई बीएमसी के कई ऐसे क़ानून हैं जिससे कॉरपोरेट घरानों से लेकर बॉलीवुड तक पर सीधा असर पड़ता है.

लेकिन इसका मतलब ऐसा नहीं है कि कॉरपोरेट घराने या बॉलीवुड के कलाकार किसी पार्टी की मदद कर सकते हैं.

अगर अमिताभ बच्चन या आमिर ख़ान किसी दल के लिए प्रचार कर रहे हों तो ऐसा नहीं है कि मुंबई के रहने वाले भी उनकी बात मान लें.

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बृहन्मुंबई महानगर पालिका के चुनावों में मतदाताओं का अलग ही समीकरण नज़र आता है.

इसमें उच्च जातियों, उच्च वर्ग का रूझान बिल्कुल अलग रहता है, जबकी बड़े और छोटे दुकानदारों का रुझान बिलकुल अलग.

उसी तरह मध्य वर्ग का रूझान अलग तो झोपड़पट्टियों और चालों में रहने वालों का बिलकुल अलग.

इस बार नोटबंदी और जीएसटी बिल का भी असर मतदान के 'पैटर्न' पर देखा जा रहा है. इसलिए इसबार का चुनाव शिव सेना और भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस और एनसीपी के लिए भी बड़ी चुनौती है.

(बीबीसी संवाददाता सलमान रावी के साथ बातचीत पर आधारित)

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