हाईकोर्ट के फैसलों ने बदली अशोक गहलोत के चेहरे की रंगत, यूं ही नहीं बीजेपी ने खेला है यह दांव?
बेंगलुरू। राजस्थान में कांग्रेस एक बार फिर दो धड़ों में बंटी हुई नजर आ रही है। एक धड़े का नेतृत्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कर रहे हैं, तो दूसरे धड़े की बागडोर पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट कर रहे हैं। ऐसा इसलिए कहा जा सकता है कि विशेष विधानसभा सत्र में सीएम अशोक गहलोत का बहुमत साबित करने का दावा उनकी मौजूदा बॉडी लैंग्वेज से मेल नहीं खा रही नहीं है, जबकि गहलोत को सुप्रीम कोर्ट और राजस्थान हाईकोर्ट में लगातार दो बार हरा चुके पायलट की गाड़ी पांचवें गेयर में कूलांचे मार रही है।


पायलट के खेमे वाले विधायकों को अयोग्य ठहराने वाली रणनीति हुई फेल
शुक्रवार को राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा सचिन पायलट के खेमे वाले विधायकों को अयोग्य ठहराने वाली गहलोत की कोशिशों पर तुषारापात कर दिया और कोर्ट द्वारा राजस्थान में बागी विधायकों की योग्यता पर यथास्थिति बनाए रखने के आदेश के बाद गहलोत की मनोदशा ठीक नहीं लग रही है। गहलोत की भाषा शैली और बॉडी लैंग्वेज निः संदेह किसी आशंका से ग्रस्त दिखाई दे रही थी। इसकी तस्दीक उनके हालिया बयानों से समझा जा सकता है।

पायलट के खेमे में खड़े 19 बागी विधायकों की सुध लेना नहीं भूले गहलोत
अशोक गहलोत ने हाल ही में कहा था कि उनके पास विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए पर्याप्त बहुमत हैं, लेकिन इसी समय गहलोत कांग्रेस से बागी हुए और सचिन पायलट के खेमे में खड़े 19 बागी विधायकों की सुध लेना नहीं भूलते हैं, जिन्हें अयोग्य साबित कराने के लिए गहलोत कांग्रेस हाईकोर्ट से निकलकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई थी, जहां उन्हें निराशा हाथ लगी।

क्या सीएम गहलोत के पक्ष में दिख रहे विधायकों की निष्ठा पर है आशंका
ऐसी संभावना हो सकती है कि गहलोत के पक्ष में दिख रहे विधायकों की संख्या खासकर 10 निर्दलीय विधायकों की निष्ठा बदलने को लेकर मु्ख्यमंत्री गहलोत आशंकित हों, क्योंकि सचिन पायलट ने शुरूआत से ही 30 विधायकों के अपने समर्थन में होने की बात कह चुके है। माना जा रहा है कि इसी आधार पर सचिन पायलट बार-बार गहलोत सरकार को अल्पमत सरकार कहने से गुरेज नहीं करते हैं और गहलोत को बहुमत साबित करने की चुनौती दे चुके हैं।

10 निर्दलीय विधायकों को सचिन पायलट के पक्ष में जोड़कर देखा जाए तो..
अगर गहलोत के पक्ष में खड़े 10 निर्दलीय विधायकों को सचिन पायलट के पक्ष में जोड़कर देखा जाए तो सचिन पायलट के खेमे में दावे किए गए 29-30 विधायकों के समर्थन समझा जा सकता है। अगर ऐसा है, तो ऐसी स्थिति में गहलोत के दावों को पोल खुल जाती है, क्योंकि 10 निर्दलीय विधायकों के जाने के बाद गहलोत सरकार के पक्ष में केवल 87+1+3=91 विधायक हो बचते हैं, जिससे संभावित विधानसभा सत्र में गहलोत सरकार का अल्पमत में आना तय है।

गहलोत हफ्तों तक विशेष विधानसभा सत्र बुलाने की जद्दोजहद में नहीं दिखे
यही वजह है कि अशोक गहलोत एक हफ्ते तक विशेष विधानसभा सत्र बुलाने की जद्दोजहद में नहीं दिख रहे थे, लेकिन जैसे ही सुप्रीम कोर्ट के बाद हाईकोर्ट में भी गहलोत के पक्ष में फैसला नहीं आया, तो अचानक गहलोत की सांस फूलने लग गई और आनन-आनन में राज्यपाल कलराज मिश्रा से मुलाकात का वक्त मांगते हैं और फिर जल्द विधानसभा सत्र बुलाने के लिए चिट्ठी भी लिख डालते हैं।

क्या गहलोत कोसमर्थित विधायकों के छिटकने का डर सता रहा है?
राज्यपाल कलराज मिश्र ने मुख्यमंत्री गहलोत को मिलने का वक्त भी देते हैं, लेकिन गहलोत को होटल में एक हफ्ते से कैद समर्थित विधायकों के छिटकने का डर इतना सता रहा था कि वो 4 बसों में कथित समर्थक विधायकों को लेकर राजभवन पहुंच गए। एक तरह से राज्यपाल के सामने विधायकों की परेड कराई गई। गहलोत राज्यपाल से आगामी 27 जुलाई को विशेष विधानसभा सत्र बुलाने की आग्रह की है, लेकिन कोरोना काल में उनकी मांग पर क्या फैसला होगा, यह समय बताएगा।

कहीं गहलोत विधानसभा सत्र में शक्ति प्रदर्शन से बचना तो नहीं चाहते हैं?
दरअसल, गहलोत विधानसभा सत्र में शक्ति प्रदर्शन से भी बचना चाहते हैं, क्योंकि कहीं न कहीं गहलोत साथ खड़े विधायकों के बदल जाने से भी आशंकित हो सकते हैं। इसीलिए गहलोत सोमवार को विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर व्हिप जारी कर सभी कांग्रेस विधायकों को किसी बिल के जरिए सरकार के समर्थन में एकजुट दिखाने की कोशिश करना चाहते हैं, जिससे गहलोत सरकार को फौरी तौर पर शक्ति प्रदर्शन से राहत मिल जाएगी।

कुर्सी बचाने के लिए विशेष विधानसभा सत्र में यह निर्णय ले सकते हैं गहलोत
माना जा रहा है कि सीएम अशोक गहलोत संभावित विशेष विधानसभा सत्र में विश्वास मत या पेंडिग पड़े बिलों को पास कराने का निर्णय ले सकते हैं। दरअसल, दल-बदल कानून के तहत अगर पार्टी का विधायक व्हिप का उल्लंघन करते हुए बिल के खिलाफ वोट देता है तो उसे विधानसभा अध्यक्ष उसके खिलाफ अयोग्यता ठहराने की कार्रवाई कर सकते हैं और यह मामला तब कोर्ट में भी नहीं सुना जाएगा, क्योंकि यह कार्रवाई कानून सम्मत होगी।

सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में CM गहलोत पर भारी पड़े सचिन पायलट
हालांकि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत यह रणनीति पिछले कई दिनों से बना रहे थे और विधानसभा सत्र बुलाकर सरकार बचाने की कवायद में लगे हुए थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों में सचिन पायलट उन पर भारी पड़े हैं, जिससे उनका मनोबल थोड़ा टूट जरूर गया है। अभी गहलोत को डर है कि शक्ति प्रदर्शन में उनके पक्ष में अगर बहुमत लायक वोट नहीं पड़े तो उनकी सरकार गिर जाएगी और उन्हें इस्तीफा देना पड़ेगा।

नंबर गेम में फंसने के बजाय दूसरे विकल्पों पर अधिक भरोसे हैं गहलोत
यही वजह है कि गहलोत जल्द से जल्द विशेष विधानसभा सत्र बुलाकर नंबर गेम में फंसने के बजाय दूसरे विकल्प पर अधिक टिकी हुई है। हालांकि अगर विशेष विधानसभा का सत्र अगर सोमवार को बुला भी लिया जाता है, तब भी पायलट गुट के पास अपने छिटके हुए विधायकों का समर्थन करने में पर्याप्त समय मिल जाएगा। अंततः सत्ता की बाजी उसके नाम होगी, जिसके पास नंबर होंगे।

नंबरों के गेम में CM गहलोत भले ही अभी मजबूत दिख रहे हैं, लेकिन...
नंबरों के गेम में अभी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भले ही अभी मजबूत दिख रहे हैं, लेकिन गहलोत अच्छी तरह से जानते हैं कि सचिन पायलट गुट के पक्ष में बीजेपी और केंद्र सरकार जुटी हुई है, इसके चलते कांग्रेस की चुनौती बढ़ गई है। ऐसे में कांग्रेस के रणनीतिकार सीएम गहलोत की चुनौती बढ़ गई है और इसी लिए गहलोत ने दूसरी रणनीति पर काम कर रही है।

फिलहाल, गहलोत सरकार का फोकस विधानसभा सत्र पर है
फिलहाल, गहलोत सरकार का फोकस विधानसभा सत्र पर है। शुक्रवार को सीएम गहलोत पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ राज्यपाल से मिलने पहुंचे। इस दौरान उन्होंने विधानसभा सत्र को लेकर राज्यपाल पर भी गंभीर आरोप लगाने से नहीं चूके। उनके मुताबिक सरकार के निवेदन के बाद भी राज्यपाल सत्र बुलाने के निर्देश नहीं दे रहे हैं। उनके मुताबिक सत्र शुरू होते ही राजनीतिक संकट की तस्वीर साफ हो जाएगी।

भाजपा अध्यक्ष पुनिया के एक बयान भी गहलोत की मुश्किल बढ़ा दी है
उधर, सियासी गहमागहमी के बीच भाजपा अध्यक्ष सतीश पुनिया के एक बयान भी गहलोत की मुश्किल बढ़ा दी है। राजस्थान भाजपा के अध्यक्ष सतीश पूनिया का कहना है कि यदि राजस्थान में परिस्थितियां बनती हैं, तो सचिन पायलट भी मुख्यमंत्री बन सकते हैं। उन्होंने पायलट को राष्ट्रीय नेता बताते हुए कहा कि कांग्रेस को भाजपा पर आरोप लगाने के बजाए अपना घर संभालना चाहिए।

सचिन पायलट लक्ष्य रखकर इतना बड़ा कदम उठाया है: सतीश पुनिया
बकौल पुनिया, सचिन पायलट लक्ष्य रखकर इतना बड़ा कदम उठाया है। पायलट को तय करना है कि उन्हें क्या कदम उठना है। उसके बाद ही हम अपना निर्णय करेंगे, लेकिन यह स्पष्ट है कि गहलोत सरकार गिरने की स्थिति में आ गई है। पहले उन्होंने 109 विधायक होने का दावा किया था, जबकि 19 विधायक हरियाणा में थे। इन्हें राज्यसभा चुनाव में 125 विधायकों का समर्थन प्राप्त था, जबकि 19 बागी हो गए हैं और तीन निर्दलीय भी समर्थन नहीं दे रहे हैं।

सचिन पायलट लगातार बीजेपी नहीं जाने की बात कह रहे हैं
कांग्रेस आलाकमान भले ही अभी राजनीति के जादूगर के भरोसे आंख मूंदकर बैठे है, लेकिन वह भी बदलते समीकरणों पर लगातर नजर बनाए हुए हैं। चूंकि बागी सचिन पायलट लगातार बीजेपी नहीं जाने की बात कह रहे हैं। अभी हालिया बयान में सचिन पायलट दोहरा चुके हैं कि जितना हक कांग्रेस पर गहलोत का है उनका भी उतना ही है। साथ ही, उनके बीजेपी में जाने की अफवाह फैलाने वाले के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का भी ऐलान किया हैं।

पायलट के खिलाफ अपशब्दों के इस्तेमाल पर CM गहलोत को मिली हिदायत
यही वजह है कि कांग्रेस आलकमान ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा सचिन पायलट के खिलाफ अपशब्दों के इस्तेमाल पर गहलोत को हिदायत भी दे दी है। एक ओर पायलट जहां शांत हैं, तो दूसरी ओर मुख्यमंत्री गहलोत हर दिन पायलट विरोधी बयान दे रहे हैं। सोमवार को तो उन्होंने मीडिया से बातचीत के दौरान सचिन पायलट को ‘निकम्मा-नाकारा-धोखेबाज़' कहकर संबोधित किया, जो संभवतः कांग्रेस आलाकमान को भी अच्छा नहीं लगा है, लेकिन सचिन पायलट कांग्रेस और गांधी परिवार के प्रति थोड़ नरम रुख अपनाए हुए हैं।

राज्यपाल से सदन बुलाने पर चर्चा, लेकिन गहलोत ने लिखित कुछ नहीं दिया
शुक्रवार को राज्यपाल से मुलाकात के पहले सीएम गहलोत ने मीडिया को दिए बयान में कहा कि वो चाहते हैं कि कोरोना और राजनीतिक परिस्थितियों पर चर्चा के लिए विधानसभा का सत्र बुलाया जाए। हमें पता है कि कुछ दबाव के कारण राज्यपाल सत्र बुलाने के निर्देश नहीं दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि वो सोमवार से राज्य विधानसभा सत्र शुरू करना चाहते हैं। तब सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा। हालांकि राज्यपाल से मुलाकात में सदन बुलाने पर उन्हों चर्चा तो जरूर की, लेकिन लिखित तौर पर कुछ नहीं दिया है।

CM गहलोत शक्ति प्रदर्शन या बहुमत साबित करने की बात नहीं कह रहे हैं
ध्यान देने वाली बात यह है कि अपने बयानों में मुख्यमंत्री गहलोत शक्ति प्रदर्शन या बहुमत साबित करने की बात नहीं कह रहे हैं, बल्कि कोरोना और राजनीतिक परिस्थितियों पर चर्चा करने के लिए विशेष विधानसभा सत्र बुलाने की बात कह रहे हैं, क्योंकि वह जानते हैं कि विधानसभा में शक्ति प्रदर्शन में उनकी जमीन खिसक भी सकती है, जिसको लेकर उनके चेहरे पर कॉन्फिडेंस न के बराबर है।

विशेष विधानसभा सत्र के लिए राज्यपाल को धमकी देने से नहीं चूके गहलोत
यही कारण है कि मीडिया को बयान देते समय मुख्यमंत्री गहलोत ने राज्यपाल कलराज मिश्र को संवैधानिक पद की गरिमा का वास्ता देकर विशेष विधानसभा सत्र बुलाने के लिए धमकी भी देने से नहीं चूके। उन्होंने कहा कि हो सकता है विधानसभा सत्र नहीं होने पर आने वाले दिनों में राजस्थान की जनता राजभवन को घेरने आ जाए, तो हमारी जिम्मेदारी नहीं होगी।

200 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए 101 विधायकों की जरूरत है
राजस्थान में अभी भाजपा के 72 विधायक हैं। हनुमान बेनिवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के तीन विधायकों का भाजपा से गठबंधन है। 200 सदस्यीय विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 101 विधायकों की जरूरत है। सचिन पायलट के 30 विधायकों के समर्थन का दावा अगर नहीं भी टिकता है और अगर पायलट 15 विधायकों का भी इस्तीफा कराने में सफल होते हैं तो भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व सियासी हथकंडे 10 निर्दलियों को अपने खेमे में कर सकती है।

पायलट खेमे के विधायकों को जोड़ने की रणनीति पर काम शुरू किया
मौजूदा नंबरों के हिसाब से अशोक गहलोत भले ही बहुमत के करीब दिख रहा है, लेकिन पहले से ही अपने मौजूदा विधायकों की एकजुटता कायम रखने के साथ ही गहलोत पायलट खेमे से मौजूद विधायकों को उनके पक्ष में लौट सकने की संभावना की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। यही कारण है कि कांग्रेस लगातार सचिन पायलट और उनके समर्थकों को मनाने में लगी है, क्योंकि सचिन भी कह चुके हैं कि कांग्रेस नहीं छोड़ रहे हैं।

मौजूदा समय में सचिन पायलट का गुट में 22 विधायक हैं, 3 निर्दलीय हैं
मौजूदा समय में सचिन पायलट का गुट में 22 विधायक हैं, जिनमें 19 कांग्रेस के और 3 निर्दलीय विधायक शामिल हैं। ऐसे में अगर फ्लोर टेस्ट की नौबत आती है, तो बीजेपी के साथ मिलकर अशोक गहलोत सरकार गिराने में सफल हो पाएंगे इस पर संशय बरकरार है। हालांकि आखिरी बाजी अब नंबर गेम की होगी, जो इसमें आगे निकलेगा वहीं सियासी जंग फतह करने में कामयाब हो सकेगा।












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