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LED से निकलने वाली रोशनी से हो सकता है कैंसर, शोध में हुआ खुलासा

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    लंदन। हाल ही में वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध में पता चला है कि, एलईडी से निकलने वाली नीली रोशनी से कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। खुले में लगी एलईडी स्क्रीन से निकलने वाली रोशनी से लोगों को कैंसर की चपेट में ले सकता है। ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटेर और बार्सिलोना इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ ने मैड्रिड और बार्सिलोना में 20 से 85 साल उम्र के 4,000 लोगों पर किए गए एक अध्ययन में पाया कि जो लोग एलईडी की रोशनी में ज्यादा रहते हैं, उन्हें कम LED रोशनी में रहने वाले लोगों की अपेक्षा स्तन और प्रोस्टेट कैंसर होने का खतरा डेढ़ गुना अधिक होता है।

    नीली रोशनी मनुष्य के शरीर की बायोलॉजीकल क्लॉक को गड़बड़ा देती है

    नीली रोशनी मनुष्य के शरीर की बायोलॉजीकल क्लॉक को गड़बड़ा देती है

    एंवायरमेंटल हेल्थ पर्सपेक्टिव्स नामक पत्रिका में छपे शोध पत्र में कहा गया है कि, एलईडी स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी मनुष्य के शरीर की बायोलॉजीकल क्लॉक को गड़बड़ा देती है। जो मनुष्य की नींद के पैटर्न को गड़बड़ा देती है। अनियमित नींद से हार्मोन पर भी पड़ता है। हार्मोन के आई गड़बड़ी का असर सीधे तौर पर शरीर पर पड़ता है। बता दें कि, स्तन और प्रोस्टेट कैंसर दोनों हामोर्न से जुड़ी खराबी के कारण होते हैं।

    रात में काम करने वालों को कैंसर का खतरा अधिक

    रात में काम करने वालों को कैंसर का खतरा अधिक

    अंतरार्ष्ट्रीय कैंसर शोध एजेंसी (आईएआरसी) ने मनुष्यों के लिए रात की पाली में काम करने को कैंसर का खतरा बताया है। यह सबूत इस ओर इंगित करते हैं कि, कृत्रिम रोशनी में रहने वाले लोगों की कार्डियन लय बिगड़ जाती है। जो कि स्तन और प्रोटेस्ट कैंसर की ओर इशारा करती है।

    कृत्रिम नीली रोशनी की तीव्रता और वेव लेंथ बहुत अधिक होती है

    कृत्रिम नीली रोशनी की तीव्रता और वेव लेंथ बहुत अधिक होती है

    ईएसग्लोबल की शोधार्थी मेनोलिस कोजेविन्स ने बताया, 'इस शोध में हम यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि शहरों में रात में रौशनी में रहने से कहीं इन दोनों तरह के कैंसर के विकास का संबंध तो नहीं है।' कनाडा के भौतिकी प्रोफेसर मार्टिन औब ने कहा, हम जानते हैं कि कृत्रिम नीली रोशनी की तीव्रता और वेव लेंथ बहुत अधिक होती है। जो शरीर में मेलाटोनिन उत्पादन और स्राव को कम कर सकता है।

    क्या है बायोलॉजिकल क्लॉक

    क्या है बायोलॉजिकल क्लॉक

    हमारे शरीर की मांसपेशियां दिन के समय को समझने की कोशिश करती हैं। शरीर के हर हिस्से में एक बायोलॉजिकल क्लॉक चल रही होती है। इसी घड़ी के हिसाब से हार्मोन्स हमारी बॉडी में बनते रहते हैं। इसमें पीरिड्स आने से लेकर, समय पर नींद आना, टॉयलेट जाना, लंच टाइम तक एक्टिव रहना, लंच के बाद खाना पचना, दिन के सबसे बिजी शेड्यूल में एक्टिव रहना, जिस तरह के ट्रैवल की आदत हो वो पूरा करना सब कुछ शामिल है।

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    English summary
    blue light emitted by LED light bulbs has been linked to breast and prostate cancer

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