• search

ब्लॉग: अंकित और अख़लाक़ हत्याकांड पर एक-सी प्रतिक्रिया क्यों नहीं?

By Bbc Hindi
Subscribe to Oneindia Hindi
For Quick Alerts
ALLOW NOTIFICATIONS
For Daily Alerts

    बंटे हुए समाज में दुखद हत्याओं पर भी भरपूर बहस की गुंजाइश निकल आती है. हत्या तो हत्या है, कातिल तो कातिल है, इतना कहना काफ़ी नहीं होता.

    दिल्ली में अंकित सक्सेना की हत्या के बाद सवाल उठाए जा रहे हैं कि इस हत्या पर वैसी प्रतिक्रिया क्यों नहीं हो रही जैसी अख़लाक़, जुनैद, पहलू ख़ान या अफ़राज़ुल की हत्या के बाद हुई थी.

    ये सवाल पहली नज़र में ठीक लगता है, सवाल पूछने वालों की शिकायत है कि मुसलमानों के मरने पर अधिक शोर मचता है लेकिन जब हिंदू मारा जाए तो वो लोग नहीं बोलते जिन्हें सोशल मीडिया पर 'सिकुलर', 'वामिए' और 'बुद्धूजीवी' कहा जाता है.

    संक्षेप में, मांग ये है कि पीड़ित मुसलमानों की बात कम हो, और अगर पीड़ित व्यक्ति हिंदू हो तो अख़लाक़ मामला ही प्रतिक्रिया की उचित तीव्रता का बेंचमार्क हो.

    निशाने पर वे लोग होते हैं जो मुसलमानों पर हुए अत्याचार के ख़िलाफ़ मुखर रहे हों, इसका मक़सद उन पर 'दोहरे मानदंड वाला', 'पक्षपाती', 'हिंदू विरोधी', 'राष्ट्रविरोधी' का लेबल चिपकाना होता है ताकि उनकी आलोचना की हवा निकाली जा सके.

    ऐसा नहीं है कि मुसलमानों के हक़ की बात करने वाले सभी लोग दूध के धुले हैं लेकिन 'हिंदू जनभावना के स्वयंभू सोशल प्रवक्ता' ज़्यादा सोच-विचार करने में यक़ीन नहीं रखते.

    हर मामले में एक बराबर प्रतिक्रिया की मांग करने वालों की नज़र में जो उनसे सहमत हैं वो निष्पक्ष हैं, जो सवाल उठाते हैं या चिंता जताते हैं वे पक्षपाती हैं.

    दूसरी ओर,यही हाल 'सोशल जिहादियों' का भी है, आबादी हिंदुओं की तुलना में कम होने के कारण उनकी हरकतें उस तरह नहीं दिखतीं जिस तरह बहुसंख्यक हुड़दंगियों की, लेकिन दोनों का बर्ताव और स्वभाव कमोबेश एक जैसा ही है.

    ये एक बहुत नाज़ुक मुद्दा है, इसके बारे में सबसे पहले यही कहना ज़रूरी है कि इंसान की हत्या, इंसानियत की हत्या है. किसी एक हत्या को कम गंभीर या दूसरी को अधिक गंभीर साबित करने का कोई इरादा नहीं है लेकिन यह लेख समझने-समझाने की कोशिश है कि हर हत्या पर एक जैसी प्रतिक्रिया क्यों नहीं होती?

    मोटे तौर पर अपराध के मक़सद, तरीके और उसके बाद होने वाली हरकतों की वजह से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं होती हैं.

    अख़लाक़ की हत्या के बाद हुआ प्रदर्शन
    Getty Images
    अख़लाक़ की हत्या के बाद हुआ प्रदर्शन

    ऑनर किलिंग या हेट क्राइम

    अब तक मिली जानकारी के मुताबिक़ अंकित की हत्या इसलिए हुई क्योंकि उसने हिंदू होकर एक मुसलमान लड़की से प्रेम करने की हिम्मत की थी, समान गोत्र में या 'ऊँची-नीची जाति' में शादी के मामलों में अक्सर होने वाली हत्याओं जैसा ही है.

    हत्या की जगह का दिल्ली होना, हत्या का तरीक़ा गला काटना, हत्यारों का मुसलमान और मृतक का हिंदू होना, इन तीन मुख्य फैक्टरों ने इस बात को प्रभावित किया कि कैसी और कितनी प्रतिक्रिया होगी.

    दिल्ली से कुछ ही किलोमीटर दूर हरियाणा के किसी गांव में, समान गोत्र वाली शादी के मामले में, जहां क़ातिल और मक़तूल दोनों हिंदू होते हैं, वहां अंकित हत्याकांड जैसी प्रतिक्रिया नहीं होती.

    कई बार तो इन हत्याओं को पंचायत की सहमति हासिल होती है, अंकित की हत्या के मामले में ऐसी कोई बात सामने नहीं आई है यानी मुसलमान सामूहिक रूप से इसके हामी नहीं कहे जा सकते.

    दोनों ओर से उठती उंगलियां

    अंकित की हत्या के बाद लोगों का गुस्सा सोशल मीडिया में फूट पड़ा, कुछ लोग इसलिए दुखी और नाराज़ थे क्योंकि मरने वाला हिंदू था. कुछ लोग एक बेकसूर युवा की हत्या की ख़बर से सदमे में थे, इसमें हिंदू और मुसलमान दोनों शामिल थे.

    कुछ मुसलमानों ने इसे 'रिवर्स लव जिहाद', 'मुसलमान लड़की की इज्ज़त से खिलवाड़' और अंकित को बजरंग दल से जुड़ा बताकर हत्या को सही ठहराने की कोशिश की.

    ठीक वैसे ही जैसे अख़लाक़ या पहलू ख़ान की हत्या के मामले में गो-तस्करी और फ्रिज में गोमांस होने की दलीलें दी गई थीं. ये बिल्कुल एक जैसे लोग हैं, सिवाय इसके कि वे संयोग से हिंदू या मुसलमान घर में पैदा हुए हैं, बाक़ी उनमें कोई अंतर नहीं है.

    इसमें शक़ नहीं है कि किसी मामले में जब एक पक्ष हिंदू और दूसरा मुसलमान हो तो ज़्यादातर लोग तर्क, तथ्य और न्याय का साथ छोड़कर अपने कम्युनल हित के साथ खड़े नज़र आते हैं, यही समय होता है जब बुद्धि, विवेक, न्यायप्रियता और मानवीय संवेदना की परीक्षा होती है.

    इस बार जो मुसलमान अंकित के साथ खड़े थे, वे अख़लाक़ के समर्थन में खड़े हिंदुओं की तरह ही 'सोशल जिहादियों' की गालियां खा रहे थे.

    सोशल जिहादियों के सवाल
    AFP
    सोशल जिहादियों के सवाल

    हिंदुत्व, बुद्धिजीवी और समझने वाली बातें

    अंकित के मामले में 'सिकुलर' और 'वामियों' की प्रतिक्रिया में जिस चीज़ की कमी महसूस की गई, वो थी मुसलमानों के प्रति जेनरेलाइज़्ड नफ़रत का अभाव. यही वो बुनियादी बात है जो हिंदू हितों की बात करने वाले पूछते हैं, 'आप हिंदुत्व की तो खुलकर आलोचना करते हैं, इस्लाम की क्यों नहीं'?

    पहली बात ये है अंकित की हत्या किसी सुनियोजित, संगठित इस्लामी संगठन की कारस्तानी नहीं है, पिछले कुछ सालों में समुदाय के तौर पर भारत के मुसलमानों ने ऐसा क्या किया है कि जिसके लिए उनकी आलोचना की जानी चाहिए थी, मगर नहीं की गई? आइएस वालों की करतूत के लिए भारत के मुसलमान को कोसना कतई जायज़ नहीं होगा.

    मत भूलिए कि हिंदुत्व की आलोचना, हिंदुओं की आलोचना नहीं है. हिंदुत्व के राजनीतिक आइडिया के तौर पर इस्तेमाल की आलोचना धर्म पर हमला नहीं है. ठीक वैसे ही जैसे इस्लामपरस्ती की खिंचाई को इस्लाम पर हमला मानना ग़लत है. इस्लामपरस्ती और हिंदुत्व, दोनों ही वैचारिक हमलों का जवाब मंदिर-मस्जिद के पीछे छिपकर देते हैं.

    अंकित निश्चित तौर पर 'विक्टिम' था लेकिन उसके बहाने 80 प्रतिशत हिंदुओं को विक्टिम बनाने की कोशिश में राजनीति न देख पाना विचित्र है.

    जो हिंदू हितों की बात करते हैं वे देश पर राज कर रहे हैं, उनके सत्ता में रहते अगर हिंदू असुरक्षित हैं तो उन्हें मुसलमानों की तरफ़ नहीं, सरकार की तरफ़ देखना चाहिए.

    मीडिया और बुद्धिजीवियों की ज़िम्मेदारी?

    इस देश में कुछ सालों में गोरक्षा और लव जिहाद के नाम पर, और कई बार तो सिर्फ़ टोपी-दाढ़ी की वजह से भीड़ ने मुसलमानों की पीटकर हत्या की है, इसका एक पैटर्न है, सरकारों का मौन नहीं, बल्कि कई बार खुला समर्थन है.

    याद कीजिए, जब अख़लाक़ की हत्या के एक अभियुक्त की बीमारी से हुई मौत के बाद उसकी लाश को तिरंगे में लपेटा गया था और उसे श्रद्धांजलि देने केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा पहुंचे थे.

    मीडिया, बुद्धिजीवियों और विवेकवान लोगों की ये ज़िम्मेदारी है कि वह उन लोगों की आवाज़ जनता तक पहुंचाए जो हाशिए पर हैं, जिनकी आवाज़ कोई सुन नहीं रहा या सुनना नहीं चाह रहा, न कि बहुसंख्यक भीड़ के शोर की प्रतिध्वनि बन जाएं.

    हिंसा की वजह और अनुपात के सवाल भी अहम हैं. इसे दो उदाहरणों से समझा जा सकता है--मालदा में मुसलमान गुटों और पुलिस के बीच टकराव की सख़्त आलोचना की मांग बुद्धिजीवियों से करना, मगर हिंसक जाट आंदोलन के वक़्त चुप रहना. क्या दोनों मामलों को समान पैमाने पर तौला जा सकता है?

    इसी तरह, दिल्ली में पार्किंग के झगड़े में एक हिंदू डेंटिस्ट की मुसलमानों ने पीटकर हत्या कर दी थी, तब भी ये मांग उठी थी कि उसकी आलोचना अख़लाक़ की हत्या की तरह की जाए. ये समझना अहम है उस झगड़े में हुई दुखद और निंदनीय मौत की वजह व्यक्ति की हिंदू पहचान नहीं थी. पुलिस ने माना था कि इस मामले में धर्म का एंगल नहीं था.

    ये बारीक़ और बहुत सोच-विचार करके तय करने वाली चीज़ें हैं लेकिन भीड़ को फ़ौरन फ़ैसला, तुरंत न्याय और अपनी जीत चाहिए होती है.

    राजेश प्रियदर्शी के पिछले कुछ ब्लॉग पढ़ने के लिए इन लिंक्स पर क्लिक करें

    जीवनसंगी की तलाश है? भारत मैट्रिमोनी पर रजिस्टर करें - निःशुल्क रजिस्ट्रेशन!

    BBC Hindi
    देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
    English summary
    Blog Why not make a single reaction on the Aankit and Akhlaq massacre

    Oneindia की ब्रेकिंग न्यूज़ पाने के लिए
    पाएं न्यूज़ अपडेट्स पूरे दिन.

    X