Bihar Caste Politics: बिहार में जातिगत जनगणना के बाद भी बीजेपी मजबूत स्थिति में क्यों है? जानिए

बिहार में नीतीश कुमार की अगुवाई वाली महागबंधन या मौजूदा इंडिया ब्लॉक की सरकार ने जातिगत जनगणना की रिपोर्ट सार्वजनिक करके 2024 के लोकसभा चुनावों को एक तरह से मंडल बनाम कमंडल की तर्ज पर लड़े जाने के लिए आधार तैयार करने की कोशिश की है। धारणा यह बन रही है कि पूरी तरह से जातिवादी राजनीति की गिरफ्त वाले बिहार में बीजेपी के लिए यह बहुत बड़ा सेटबैक है।

लेकिन, अगर पिछले 9-10 वर्षों में राज्य में भाजपा के अंदरूनी संगठनात्मक पैटर्न को देखें तो धारणा और धरातल की हकीकत में काफी अंतर है। बीजेपी ने 2014 के लोकसभा चुनावों में यहां मिली अप्रत्याशित सफलता के बाद से ही प्रदेश में पिछड़ी जाति की राजनीति को अपना आधार बनाना शुरू कर दिया था। तब राज्य में जेडीयू बीजेपी के साथ नहीं थी, फिर भी पार्टी की अगुवाई में एनडीए को 31 सीटें मिली थीं।

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ओबीसी-एमबीसी में विशाल जनाधार तैयार कर चुकी है बीजेपी
भाजपा के लिए एक धारणा बनी हुई है कि यह अगड़ों की पार्टी है। लेकिन, तथ्य यह है कि पिछले एक दशक में बिहार में पार्टी ने बूथ स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक संगठन में ओबीसी (other backward class) और ईबीसी (extremely backward class) या एमबीसी (most backward class) जातियों को बड़े पैमाने पर जगह दी है।

प्रदेश में भाजपा आज की तारीख में सिर्फ ऊंची जातियों की पार्टी नहीं रह गई है। इसका वोट बैंक ओबीसी और एमबीसी जातियों में सवर्ण जातियों के मुकाबले कहीं ज्यादा विशाल है। 2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को राज्य में जो बड़ी सफलता मिली थी, उसके पीछ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ओबीसी समाज से होने की भी एक बड़ी भूमिका मानी जा सकती है।

ओबीसी-एमबीसी चेहरों को पार्टी में मिल रही है प्राथमिकता
आज की तारीख में बिहार बीजेपी संगठन में ओबीसी चेहरों को काफी प्राथमिकता मिली हुई है। सम्राट चौधरी यादवों के बाद सबसे प्रभावशाली ओबीसी कुशवाहा समाज से आते हैं, जो प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष हैं। चौधरी से पहले संजय जायसवाल के पास बिहार बीजेपी का कमान था और वे भी ओबीसी समाज से आते हैं।

वहीं बिहार विधान परिषद में पार्टी ने हरि सहनी को नेता विपक्ष का पद दिया है, जो अति-पिछड़े मल्लाह या निषाद समाज से आते हैं। पार्टी ने उजियारपुर के सांसद नित्यानंद राय को केंद्रीय गृह राज्यमंत्री बनाया हुआ है, जो यादव समाज से हैं। गृहमंत्री अमित शाह वाले मंत्रालय में उनकी मौजूदगी उनकी अहमियत की बानगी है। जाति में दिलचस्पी रखने वाले बिहारी समाज को शाह के भी ओबीसी समाज से होने का पूरा एहसास है।

एक साल से कुछ पहले जब गोपाल नारायण सिंह की जगह राज्यसभा सांसद चुनने का मौका मिला तो पार्टी ने एक बार फिर से अत्यंत पिछड़ी जाति धानुक समाज से आने वाले शंभू शरण पटेल में भरोसा दिखाया। आमतौर पर मंडल की राजनीति करने वाली पार्टियों में इस जाति के प्रति इतनी उदारता का अभाव ही देखा जाता रहा है।

बीजेपी ने दोनों उपमुख्यमंत्री ओबीसी समाज से ही बनाया था
बिहार के एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने कहा है, '2024 के लोकसभा चुनावों के बाद पार्टी की बिहार इकाई ने ओबीसी चेहरों को पार्टी संगठन में विशेष फोकस देना शुरू कर दिया था। 2020 में जब सीएम नीतीश एनडीए में थे, तो नवंबर 2020 में बीजेपी कोटा से तारकिशोर प्रसाद और रेणु देवी (दोनों ओबीसी) को उपमुख्यमंत्री पद के लिए चुना गया, जिससे पार्टी एक सकारात्मक संदेश देने में सफल रही।'

जमीनी संगठनों में भी पिछड़ों और अति-पिछड़ों पर फोकस
अगर 2014 से पहले और बाद में भी बिहार बीजेपी को देखें तो तब भी सुशील कुमार मोदी, नंद किशोर यादव और प्रेम कुमार जैसे नेता प्रदेश भाजपा के बड़े चेहरे बने रहे। ये सारे नेता भी ओबीसी समाज से ही जुड़े हुए हैं। धरातल की राजनीति की बात करें तो बीजेपी संगठन में पन्ना प्रमुख से लेकर बूथ समिति, शक्ति केंद्र (पंचायत स्तरीय सगठन), मंडल समिति (प्रखंड स्तरीय समिति) से लेकर जिला समितियों तक में पिछड़ों और अति-पिछड़ों को काफी अहमियत दी गई है।

ऐसे में जब भाजपा ने बिहार की जातिगत राजनीति के आधार पर ही अपना संगठन तैयार कर रखा है तो सिर्फ जातिगत जनगणना से यह आधार हिल सकता है, यह कह देना जिम्मेदारी का काम नहीं है। लेकिन, इसका प्रभाव किस कदर राज्य में चुनाव परिणामों पर नजर आएगा, वह दोनों गठबंधनों (इंडिया ब्लॉक और एनडीए) के आगे की सियासत पर निर्भर कर सकता है।

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