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BJP की मुरीद क्यों बन गई है CPM? कांग्रेस की उड़ चुकी है नींद, क्या कुछ बड़ा होने वाला है?

BJP News: देश की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। सीपीएम (CPM) को अब अचानक लगने लगा है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को 'फासीवादी'मानना सही नहीं है। यह लेफ्ट दलों की पहले की लाइन से उलट है। इससे न सिर्फ कांग्रेस में बल्कि सीपीएम की सहयोगी सीपीआई (CPI) में भी खलबली मच गई है।

कांग्रेस का आरोप है कि दरअसल सीपीएम यह कदम केरल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में बीजेपी समर्थक वोट बैंक को लुभाने की रणनीति का हिस्सा है। इस लेख में हम कांग्रेस के दावे की पड़ताल करेंगे कि क्या वह जो आरोप लगा रही है, उसमें कुछ भी तथ्य होने की गुंजाइश है? क्योंकि, इस राजनीतिक घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या वामपंथी राजनीति में कोई बड़ा बदलाव हो रहा है? क्योंकि, सीपीएम ही देश में लेफ्ट की राजनीति की अगुवा है।

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BJP News: केरल में बीजेपी का कितना बड़ा वोट बैंक?

अगर हम 2024 के लोकसभा चुनावों में वोट शेयर को देखें तो बीजेपी को 16.81% वोट मिले और उसने पहली बार एक सीट जीतकर अपनी दशकों पुरानी मुराद पूरी की। वहीं, सीपीएम को 26.04% वोट मिले और वह भी एक ही सीट जीत सकी। सीपीएम के साथ गठबंधन में सीपीआई भी लड़ी और उसे मात्र 6.19% वोट मिले और एक भी उम्मीदवार नहीं जीता। जबकि, कांग्रेस पार्टी विपक्षी गठबंधन यूडीएफ (UDF) की अगुवाई कर रही थी। उसे 35.33% वोट मिले और उसने 14 सीटें जीतने में सफलता हासिल की।

लेकिन, अगर 2021 के केरल विधानसभा चुनाव के नतीजों को देखें तो बीजेपी को 11.3% वोट मिले थे और पार्टी एक भी सीट नहीं जीती। जबकि, सीपीएम को 25.38% वोट मिले थे और उसने 62 सीटें जीत और सत्ता में रहते हुए दोबारा से सरकार बनाकर राज्य की राजनीति का इतिहास बदल दिया। वहीं, उसकी सहयोगी सीपीआई को 7.58% वोट मिले और 17 सीटों पर उसके प्रत्याशियों ने कब्जा किया। जबकि, कांग्रेस ने 25.12% वोट जुटाए और 21 सीटें जीतने में सफल रही।

BJP की मुरीद क्यों बन गई है CPM?

सीपीएम ने अपनी 24वीं पार्टी कांग्रेस के लिए जारी मसौदा राजनीतिक प्रस्ताव में कहा था कि मोदी सरकार के शासन में 'नव-फासीवादी लक्षण' नजर आता है। लेकिन हाल ही में,पार्टी के मुखपत्र 'चिंथा' में सफाई देते हुए कहा गया कि 'हम मोदी सरकार को फासीवादी या नव-फासीवादी नहीं मानते।' सीपीएम के वरिष्ठ नेता ए के बालन ने भी इस बात पर जोर दिया कि पार्टी ने कभी बीजेपी सरकार को पूर्ण रूप से फासीवादी नहीं कहा।

सीपीएम के रुख में यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि 2018 में हुई 22वीं पार्टी कांग्रेस में सीपीएम ने कथित रूप से हिंदुत्व के उभरते फासीवादी रुझानों पर चिंता जताई थी और 2022 की पार्टी कांग्रेस में मोदी सरकार पर आरएसएस (RSS) के कथित फासीवादी एजेंडे को लागू करने का आरोप लगाया था। ऐसे में पार्टी के ताजा रुख को उसकी रणनीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है और यह राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी चौंकाने वाला है।

BJP: सीपीएम के बदले रुख से कांग्रेस की क्यों बढ़ गई हैं चिंता?

कांग्रेस नेताओं ने इस मुद्दे पर सीपीएम पर तीखा हमला बोला है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता रमेश चेन्निथला ने कहा,'2021 के विधानसभा चुनावों में सीपीएम ने बीजेपी वोटों के सहारे सत्ता बरकरार रखी थी। अब मोदी सरकार को फासीवादी न कहना भी उसी रणनीति का हिस्सा है।' वहीं नेता प्रतिपक्ष वीडी सतीसन ने आरोप लगाया कि 'केरल में सीपीएम ने संघ परिवार के सामने घुटने टेक दिए हैं और यह नया दस्तावेज उसी की पुष्टि करता है।'

कांग्रेस का तर्क है कि सीपीएम का यह कदम केरल में बीजेपी के बढ़ते प्रभाव को रोकने के बजाय उसके साथ एक अनकहा समझौता करने का संकेत देता है। कांग्रेस को डर है कि इससे आगामी 2026 विधानसभा चुनावों में उसे नुकसान हो सकता है।

यहां गौर करने वाली बात है कि केरल कांग्रेस इन दिनों खुद ही अंदरूनी कलह से परेशान हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता शशि थरूर भी कभी सीपीएम और सीएम पिनराई विजयन की शान में कसीदे गढ़ रहे हैं तो कभी मोदी सरकार की तारीफ कर रहे हैं।

BJP Politics: पिनाराई विजयन की रणनीति क्या कहती है?

केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने अब तक मोदी सरकार पर तीखी आलोचना से परहेज किया है। कांग्रेस का दावा है कि यह चुप्पी भी बीजेपी समर्थक मतदाताओं को नाराज न करने की सोची-समझी रणनीति है। 2021 में विजयन के नेतृत्व में एलडीएफ (LDF) ने 140 में से 99 सीटें जीतकर इतिहास रचा था,लेकिन 2024 के लोकसभा चुनावों में एलडीएफ को करारी हार का सामना करना पड़ा।

एक तथ्य यह है कि केरल अब लेफ्ट का अंतिम किला बच गया है। हाल की कई रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि यहां की एलडीएफ सरकार की नीतियों का जितना बखान किया जाता था, खासकर जमीनी स्थिति वैसी नहीं है। भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप भी हैं और कई मामलों में जांच भी चल रही है। हो सकता है कि इन वजहों से अब सीपीएम केंद्र से सीधे टकराव का रास्ता अपनाने से बचने की कोशिश कर रही हो।

जहां तक कांग्रेस पार्टी और मुस्लिम लीग समेत उसकी तमाम सहयोगी पार्टियों की बात है तो वे सीपीएम पर पिछले कुछ चुनावों से सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति करने का आरोप लगा रही हैं। जबकि, खासकर बीजेपी की ओर से कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाया जाता रहा है।

यह भी तथ्य ही है कि सीपीएम और बीजेपी वैचारिक तौर पर एक-दूसरे के कट्टर-विरोधी हैं। भाजपा केरल में अपना जनाधार बढ़ाने के लिए दशकों से संघर्ष कर रही है। संघ के कई कार्यकर्ता वहां लेफ्ट की ताकत से संघर्ष में दम तोड़ चुके हैं। यही नहीं पिछले दो चुनावों में सभी दलों के वोट शेयर को देखने के बाद भी कांग्रेस के दावों में शायद थोड़ा खालीपन नजर आ रहा है।

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