Shashi Tharoor: कांग्रेस की भलाई की बात कर कहीं राहुल के एजेंडे का पर्दाफाश तो नहीं कर रहे थरूर? 5 बड़ी बातें
Shashi Tharoor News: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और केरल के तिरुवनंतपुरम से चार बार के पार्टी सांसद शशि थरूर एक बार फिर चर्चा में हैं। केरल में एलडीएफ सरकार की अर्थव्यवस्था प्रबंधन की तारीफ से लेकर पार्टी के नेतृत्व और संगठनात्मक ढांचे पर सवाल उठाने तक, थरूर के हालिया बयान कई स्तरों पर कांग्रेस के भीतर हलचल पैदा कर रही है।
सवाल उठता है कि क्या थरूर की ये बातें कांग्रेस की भलाई के लिए हैं या वे राहुल गांधी के नेतृत्व से निराशा जताने पर मजबूर होकर ये सब कहने में लगे हैं?

Shashi Tharoor: कांग्रेस के मौजूदा जनाधार और नेता के भरोसे सत्ता में वापसी को लेकर नाउम्मीदी?
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक एक चर्चा के दौरान थरूर ने दलील दी है कि कांग्रेस केवल अपने पारंपरिक वोट बैंक पर निर्भर रहकर सत्ता में कभी वापस नहीं आ सकती। उनका मानना है कि पार्टी को नए मतदाताओं को जोड़ने की जरूरत है।
उन्होंने अपने निर्वाचन क्षेत्र तिरुवनंतपुरम का हवाला देते हुए कहा कि वहां उनके प्रति लोगों का आकर्षण कांग्रेस से कहीं ज्यादा है। यही वजह है कि कांग्रेस विरोधी मतदाता भी उन्हें समर्थन देते हैं।
थरूर का यह बयान इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि कांग्रेस के मौजूदा नेतृत्व से उन्हें कहीं न कहीं निराशा है और उन्हें लगता है कि पार्टी को ऐसे नेता की जरूरत है जो अपने आधार वोटरों से आगे बढ़कर भी जन-समर्थन जुटाए।
Shashi Tharoor: क्या शशि थरूर जो खुलेआम कह रहे हैं, कांग्रेस में वैसा बहुत लोग सोचते हैं और कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं?
थरूर ने विशेष रूप से केरल में भी कांग्रेस नेतृत्व की कमी को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि पार्टी में स्पष्ट दिशा और प्रभावी नेतृत्व का अभाव है,जो आने वाले विधानसभा चुनावों में पार्टी के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।
थरूर ने यूडीएफ (UDF) के सहयोगी दलों के नेताओं के हवाले से कहा कि कई कार्यकर्ता भी उनकी इस चिंता से सहमत हैं। थरूर की यह बेबाक टिप्पणी राहुल गांधी की नेतृत्व शैली और क्षमता पर परोक्ष रूप से ही सही, लेकिन गंभीर सवाल खड़े करती है। खासकर तब जब राहुल गांधी केरल से दो बार सांसद चुने जा चुके हैं और अभी उनकी छोड़ी हुई सीट पर उनकी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा चुनाव जीती है।
Shashi Tharoor: राहुल गांधी के एजेंडे का पर्दाफाश तो नहीं कर रहे थरूर?
शशि थरूर कई बार अपनी साफगोई के लिए चर्चा में आ जाते हैं। वे मोदी सरकार की अच्छी पहल की भी प्रशंसा कर चुके हैं और अब एलडीएफ सरकार की आर्थिक नीतियों को सराह रहे हैं। उनका तर्क है कि विकास के मुद्दों पर दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर विचार करना चाहिए।
थरूर की यह सोच राहुल गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस पार्टी के एजेंडे से पूरी तरह से अलग लाइन वाली है और इसलिए उनके तेवर को पार्टी के अंदर संदेह भरी नजरों से देखा जा रहा है।
क्योंकि, बीते एक दशक से भी ज्यादा समय गुजर चुके हैं, शायद ही कोई ऐसा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दा हो या यहां तक की चीन और पाकिस्तान के साथ तनातनी वाले हालात ही क्यों न हो, जिसमें कांग्रेस ने आधिकारिक तौर पर भारत सरकार के स्टैंड का समर्थन किया हो!
पार्टी के कुछ नेताओं को लगता है कि थरूर के बयान विरोधी दलों को लाभ पहुंचा सकते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि थरूर क्या वास्तव में कांग्रेस की भलाई चाहते हैं या वे राहुल गांधी के सियासी एजेंडे पर पश्नचिन्ह खड़ा कर रहे हैं? या फिर उनकी बातों का दोनों ही अर्थ निकाला जा सकता है?
Shashi Tharoor: कांग्रेस पार्टी को सलाह ही नहीं चेतावनी भी दे रहे हैं शशि थरूर?
कांग्रेस सांसद और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को लेकर अक्सर ये आरोप लगते हैं कि वे पार्टी को मजबूत संगठनात्मक ढांचा देने में नाकाम हो चुके हैं। दूसरी ओर,थरूर जैसे नेता अपने वैश्विक अनुभव और संवाद कौशल से जनता के एक वर्ग लोकप्रिय रहे हैं।
केरल में कांग्रेस की लगातार हार के बीच थरूर का यह कहना कि 'अगर पार्टी को मेरी जरूरत नहीं है तो मेरे पास अन्य विकल्प हैं,' इस बात की ओर इशारा करता है कि वे पार्टी नेतृत्व की धौंस के सामने सरेंडर करने के लिए तैयार नहीं हैं और उन्हें उनकी बातें कहने से रुकना पड़ा तो वह दूसरा रास्ता भी अख्तियार कर सकते हैं।
Shashi Tharoor: राहुल गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस की नीतियों पर उंगली उठाकर पार्टी में कबतक टिके रहेंगे शशि थरूर?
थरूर का सुझाव है कि कांग्रेस को अपने संगठन को मजबूत करना चाहिए और नए मतदाताओं को जोड़ने के लिए व्यापक रणनीति बनानी चाहिए। उन्होंने बीजेपी की संगठनात्मक मजबूती का उदाहरण देते हुए कांग्रेस की कमजोरियों को उजागर किया है। उनका साफ कहना है कि अगर कांग्रेस अपनी कार्यशैली में बदलाव नहीं लाती, तो 2026 में भी केरल विधानसभा चुनावों में हार का सामना कर सकती है।
दरअसल, लोकसभा चुनावों में विपक्षी सहयोगियों की बदौलत कांग्रेस एक दशक बाद 99 सीटों तक जरूर पहुंची, लेकिन उसके बाद पार्टी एक के बाद एक विधानसभा चुनावों में जैसे हारी है, उससे उसके नेतृत्व की क्षमता और पार्टी के संगठन पर भीतर से भी सवाल खड़े हुए हैं।
ये बात अलग है कि थरूर की तरह खुलकर अपनी बातें रखने की हिम्मत किसी ने नहीं दिखाई है। ऐसे में यह देखने वाली बात ये है कि थरूर जिस तरह से राहुल गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस के एजेंडे पर एक तरह से उंगली उठा रहे हैं, वह इस पार्टी में कबतक बने रह पाते हैं?
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