Bihar News: पंचायतों में सही पोषण से कुपोषण पर लगाम, महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर खास फोकस
बिहार की पंचायतों में जमीनी स्तर की पहलें कुपोषण, एनीमिया और कैल्शियम की कमी से निपटने के लिए पोषण उद्यान स्थापित कर रही हैं और स्तनपान की वकालत कर रही हैं। सामुदायिक प्रशिक्षण, स्थानीय बीज तक पहुंच और नागरिक नेतृत्व का समर्थन गांव स्तर पर पौष्टिक खेती का विस्तार कर रहा है, जिससे बच्चों के स्वास्थ्य परिणाम और मातृ जागरूकता में सुधार हो रहा है।
बिहार की पंचायतों में जनप्रतिनिधियों द्वारा महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर विशेष पहल की जा रही है। कुपोषण, एनीमिया और कैल्शियम की कमी जैसी गंभीर समस्याओं को जड़ से खत्म करने के लिए गांव स्तर पर पोषण वाटिकाएं विकसित की जा रही हैं, साथ ही बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान भी चलाए जा रहे हैं। इन प्रयासों से हजारों बच्चों के बेहतर भविष्य की दिशा में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है।

नालंदा जिला के हरनौत प्रखंड स्थित तेलमर पंचायत में मुखिया विद्यानंद बिंद ने कुपोषण के खिलाफ अनूठी पहल की है। उन्होंने अपने क्षेत्र में उन स्थानों की पहचान की, जहां लोगों तक पोषण के पर्याप्त साधन नहीं पहुंच पा रहे थे। इसके समाधान के रूप में उन्होंने ग्रामीणों को घर के पास ही पोषण वाटिका विकसित करने के लिए प्रेरित किया।
पंचायती राज विभाग से मिले प्रशिक्षण के आधार पर उन्होंने ग्राम सभाओं में पोषण के महत्व पर चर्चा की और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के माध्यम से महिलाओं को जागरूक किया। उन्होंने अपने स्तर पर बीज उपलब्ध कराकर खासतौर पर वंचित बस्तियों में पोषण वाटिकाएं लगवाईं, जिससे महिलाओं और बच्चों में एनीमिया की समस्या कम करने में मदद मिली। अब गांव के अन्य लोग भी प्रेरित होकर छोटे-छोटे स्थानों पर पौष्टिक सब्जियां उगा रहे हैं। इस अभियान को बढ़ावा देने के लिए "सही पोषण, देश रोशन" का संदेश भी दिया जा रहा है।
डिब्बे के दूध से मुक्ति की ओर मोहद्दीनपुर पंचायत
वहीं नवादा जिला के वारिसलीगंज प्रखंड की मोहद्दीनपुर पंचायत में मुखिया प्रभु प्रसाद ने एक अलग पहल शुरू की है। उन्होंने अपने पंचायत को ‘डिब्बे के दूध से मुक्त’ बनाने का लक्ष्य रखा है और इसके लिए महिलाओं को स्तनपान के महत्व के प्रति जागरूक किया जा रहा है।
इस अभियान के तहत आंगनबाड़ी केंद्रों पर पोषण माह के दौरान महिलाओं को संतुलित आहार, स्वास्थ्य जांच, आयरन और कैल्शियम के सेवन के साथ-साथ बच्चों को जन्म के बाद पहले छह महीने तक केवल मां का दूध देने के फायदे समझाए जा रहे हैं। पंचायत स्तर पर इस पहल को व्यापक समर्थन मिल रहा है और जल्द ही इसे औपचारिक रूप से ‘डिब्बे का दूध मुक्त पंचायत’ घोषित करने की तैयारी है।
जनप्रतिनिधियों की पहल बनी मिसाल
दोनों पंचायतों की ये पहल यह दिखाती है कि जमीनी स्तर पर जनप्रतिनिधियों के प्रयास किस तरह समाज में बड़ा बदलाव ला सकते हैं। समर्पण और जागरूकता के जरिए स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों से निपटने की यह पहल अन्य क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणा बन रही है।












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