इन्सेफेलाइटिस: बच्चों हम शर्मिंदा हैं, तुम्हारी मौतों की सेंचुरी पर

नई दिल्ली। रहस्यमयी जापानी बुखार, चमकी बुखार, दिमागी बुखार आदि के नाम से संबोधित किए जाने वाले इन्सेफेलाइटिस के प्रकोप से बिहार में अब तक करीब सवा सौ बच्चों की हो चुकी मौत ने चिकित्सा व्यवस्था और सरकारों की असंवेदनशीलता की पोल खोल कर रख दी है। बीते दो सप्ताह से इस बीमारी से बच्चों के जान गंवाने का सिलसिला जारी है, लेकिन इनकी जान बचाने का कोई तरीका किसी के पास नहीं है। यह सब तब है जबकि यह कोई नई बीमारी नहीं है। वर्षों से गर्मी के दिनों में यह बीमारी बिहार के कई इलाकों और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में जानलेवा साबित होती रही है।

 भुला दी जाती हैं मौतें

भुला दी जाती हैं मौतें

हर बार इसी तरह बच्चे काल कवलित होते रहते हैं। कुछ दिन तक हो-हल्ला मचता है। उसके बाद सब कुछ भुला दिया जाता है। अगले साल फिर वही रोना और एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप। दिखावे के लिए कुछ कार्रवाइयां। कभी यह पता नहीं चलता कि आखिर वे कौन से रहस्य हैं जिनकी वजह से यह बीमारी रहस्यमय बताकर पल्ला झाड़ लिया जाता है। कोई नहीं बताता कि क्या इस बीमारी को लेकर कोई नया शोध किया गया। क्या उन कारणों को चिन्हित कर लिया गया जिनकी वजह से बच्चे इसकी चपेट में आ जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए क्या कोई एहतियाती उपाय किए गए ताकि यह बढ़ने न पाए। जाहिर है इस सब पर कोई काम नहीं किया गया क्योंकि अगर किया गया होता, तो इस पर जरूर कुछ अंकुश लगाया जा सकता था।

इस बीमारी के केंद्र में फिलहाल बिहार का मुजफ्फरपुर जिला है जहां से सर्वाधिक बच्चों की मौत की खबरें आ रही हैं। मुजफ्फरपुर के अलावा सिवान, गोपालगंज, पूर्वी चंपारन, बरौनी और गया जिले भी इस बीमारी की चपेट में बताए जाते हैं। इसके अलावा, उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर, महराजगंज, सिद्धार्थनगर, संत कबीर नगर, बस्ती, बलरामपुर, बहराइच, बलिया, आजमगढ़ और मऊ आदि जिलों में भी बच्चे इस बीमारी के शिकार होते रहते हैं भले ही इस समय यह सुर्खियों में नहीं हैं। पिछले साल गोरखपुर में बच्चों की मौत पर बहुत हंगामा मचा था। कहा गया था कि ऑक्सीजन की कमी की वजह से बीआरडी में बच्चों की मौत हो रही है। तब एक चिकित्सक डॉक्टर कफील खान को गिरफ्तार कर लिया गया था। हालांकि गोरखपुर में बच्चों की मौत बीते कई वर्षों से हो रही थी और यह सिलसिला अभी भी थमा नहीं हैं। इसलिए कि जिस बीमारी से बच्चों की मौत हो रही है उसके कारणों का निवारण अभी तक नहीं किया जा सका है।

इस जापानी बुखार को लेकर भी यही स्थिति है। हालात कितने गंभीर हैं, इसका अंदाजा मात्र इससे ही लगाया जा सकता है कि बीते दो सप्ताह से बच्चे इसके शिकार हो रहे हैं, लेकिन रोकथाम का कोई कारगर उपाय नहीं किया जा सका है। जब राष्ट्रीय पैमाने पर बच्चों की मौत की खबरें सार्वजनिक होने लगीं, तब जाकर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने बिहार का दौरा किया और संवाददाताओं के साथ बातचीत की जिसमें दावा किया कि बीमारी पर काबू पाया जा रहा है। हालांकि उसके बाद भी बच्चों की मौत की खबरें आ रही हैं। इसे भी याद रखा जाना चाहिए कि बच्चों की मौत उसी समय हो रही थी जब पूरे देश में चिकित्सक हड़ताल कर रहे थे।

मुजफ्फरपुर में 2014 में भी जापानी बुखार से हुई थी मौतें

मुजफ्फरपुर में 2014 में भी जापानी बुखार से हुई थी मौतें

यह वही बिहार का मुजफ्फरपुर है जहां इससे पहले 2014 में भी इस जापानी बुखार का प्रकोप बढ़ा था। तब इसकी वजह से साढ़े तीन सौ से ज्यादा लोगों की मौत की खबरें आई थीं। इस आशय के आंकड़े नेशनल वेक्टर बॉर्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम की ओर से जारी किए गए थे। उत्तर प्रदेश के बहराइच में इसी तरह की रहस्यमयी बीमारी से 2018 में 75 बच्चों की मौत की जानकारी सामने आई थी। यह कुछ उदाहरण हैं जिनसे आसानी से पता चलता है कि हालात कितने चिंताजनक हैं। सरकारों को पहले से पता था कि फिर लोग इस बीमारी के के शिकार हो सकते हैं, लेकिन किसी तरह के एहतियाती उपाय नहीं किए गए। साफ है कि अगर किए गए होते तो स्थितियां भयावह नहीं हो पातीं। इसे इस बीमारी के कारणों के आधार पर आसानी से समझा जा सकता है।

इस रहस्यमयी कही जाने वाली बीमारी के कारणों में पेयजल की समस्या और कुपोषण मुख्य कारण माना जाता है। इसके अलावा प्रशिक्षित चिकित्सकों की कमी भी एक कारणरहा है। जाहिर है अगर सरकार की प्राथमिकता में पेयजल की शुद्धता की गारंटी करना होता, तो कम से कम इसके एक लक्षण पर काबू पाया जा सकता था। कुपोषण का सवाल भी इसी तरह का है। बच्चों को भूखों सोने को मजबूर होना पड़ रहा है। मतलब इनके खाने का इंतजाम नहीं है। यह अपने आप में कितनी गंभीर बात है कि बच्चों को खाना तक नहीं मिल पा रहा है।

लीची पर लाई जा रही बहस

लीची पर लाई जा रही बहस

जिस तरह गोरखपुर मामले में ऑक्सीजन न मिल पाने को बड़ा कारण बता दिया गया था, उसी तरह जापानी बुखार के बारे में भी एक नया कारण लीची खाने को बहस के लिए छोड़ दिया गया है। हो सकता है कि शोध में यह पाया गया हो कि रात को बिना खाना खाए हुए बच्चे सुबह भरपेट लीची खा ले रहे हों, इसलिए इसकी चपेट में आ जा रहे हैं। लेकिन क्या यह भी सोचने की बात नहीं है कि जिन गरीब बच्चों को रात को खाना नहीं मिल रहा है, उन्हें सुबह भरपेट लीची खाने के लिए कहां से मिल जा रही है। इस पूरे मामले में बिहार सरकार के असंवेदनशील रवैये की भी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। बिहार के स्वास्थ्य विभाग की ओर से जारी किए दिशानिर्देश में कहा गया है कि बच्चों को लीची खाने से परहेज करना चाहिए और रात का भरपूर भोजन करना चाहिए। निश्चित रूप से अगर इन गरीब बच्चों को शुद्ध पेयजल मिल पाता और भरपेट पौष्टिक मिल रहा होता, तो उनके इस बीमारी की चपेट में आने की संभावना कम रहती। लेकिन इसे भी देखा जाना चाहिए कि बीमार बच्चों को बचाने के लिए क्या कोई तैयारी पहले से की गई। लगातार आ रही रिपोर्टों से कहीं से यह पता नहीं चलता कि राज्य सरकार और चिकित्सा विभाग द्वारा रोकथाम और बचाव के कोई एहतियाती उपाय पहले से किए गए थे।

यह वही बिहार है जहां कभी कालाजार बहुत बड़ी बीमारी हुआ करती थी। इस बीमारी को केंद्र कर फणीश्वर नाथ रेणु ने एक उपन्यास लिखा था मैला आंचल। इस उपन्यास के मुख्य पात्र हैं डॉक्टर प्रशांत जो पटना मेडिकल कॉलेज से शिक्षा प्राप्त करने के बाद मेरीगंज में मलेरिया और कालाजार पर शोध के लिए जाते हैं। लेकिन अब कोई डॉक्टर प्रशांत क्यों नजर नहीं आता, जो यह तय करे कि इस रहस्यमय कहे जाने वाले जापानी बुखार पर शोध करेगा और कोई ऐसा उपचार खोज निकालेगा जिससे बच्चों की इस तरह मौत को रोका जा सके। लेकिन जब तक यह काम नहीं होता, तब तक क्या बिहार सरकार इस दिशा में कोई काम नहीं कर सकती जिससे इसके प्रकोप में कुछ कमी लाई जा सके। हम विकास के बड़े-बड़े दावे करते नहीं थकते। हमारे पास आयुर्वेद से लेकर चिकित्सा के बहुत सारे उदाहरण भी देते रहते हैं। हमारे पास आयुष्मान भारत जैसी योजना भी है। लेकिन बच्चों को नहीं बचाया जा पा रहा है। एक बीमारी को रहस्यमय बताकर सारे कर्तव्यों से छुट्टी पा ली जा रही है।

भले ही यह बीमारी रहस्यमय है, लेकिन सरकार को यह तो पता होता है कि गर्मी के समय इसका प्रकोप बढ़ जाता है। इस बीमारी के इलाके भी पता हैं जहां सर्वाधिक प्रकोप होता है। यह भी जानकारी में है कि इसके पीछे पेयजल और कुपोषण आदि बड़े कारण हैं। अगर यह जानकारी में है कि लीची से यह बीमारी चपेट में लेती है, तो इस सबसे निपटने के लिए आवश्यक उपाय पहले से क्यों नहीं कर लिए जाते। इसीलिए इस तरह के आरोप लगते हैं कि सरकारें पूरे साल सोती रहती हैं और जब हालात बेकाबू हो जाते हैं, तो मामले की लीपापोती में लग जाती हैं। गरीब लोग अपने नौनिहालों को खोते रहते हैं और जीवन भर रोते रहने को विवश होते हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकारें इस भयावह स्थिति से कुछ सबक लेंगी और भविष्य में ऐसे हालात न उत्पन्न हों, इसके पुख्ता इंतजाम अवश्य करेंगी।

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