बिहार उपचुनाव परिणाम: क्या नीतीश कुमार का कद घटा है ? 5 प्वाइंट में समझिए राजनीतिक प्रभाव
Bihar Assembly by Elections Result: बिहार विधानसभा उपचुनाव के परिणाम महागठबंधन और खासकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए उत्साहजनक नहीं कहे जा सकते। कई वजहें हैं जिससे इसमें भारतीय जनता पार्टी के लिए उम्मीद की नई किरणें दिखाई दे रही हैं। नीतीश कुमार के लिए सबसे बड़ी चुनौती ये है कि उनका अति-पिछड़ा और महिला वोट बैंक पहले की तरह उनके कहने पर वोट डालने के लिए तैयार है, यह अब संदेहों के घेरे में आ चुका है। इसी तरह से राष्ट्रीय जनता दल भी मुसलमान वोटरों के लिए पहली पसंद नहीं रह गया है और उन्हें सही विकल्प की तलाश है।

2015 वाला समीकरण नहीं बना पाया महागठबंधन
बिहार विधानसभा की दोनों सीटों गोपालगंज और मोकामा के उपचुनाव के परिणाम को अंकों के मुताबिक देखेंगे तो महागठबंधन और अकेली विपक्ष भारतीय जनता पार्टी का हिसाब बराबर रहा है। राष्ट्रीय जनता दल ने अपनी और भारतीय जनता पार्टी ने अपनी-अपनी सीटें अपने पास बरकार रखी हैं। लेकिन, इस उपचुनाव के परिणाम को बिहार की राजनीति के लिए सूक्ष्मता के साथ देखेंगे तो इसमें राज्य में भविष्य की राजनीति के लिए बहुत बड़ा संकेत छिपा हुआ है। यह संकेत मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उनके सहयोगी उपमुख्यमंत्री और राजद नेता तेजस्वी यादव और भारतीय जनता पार्टी तीनों के लिए है। सबसे बड़ा संकेत यह है कि सत्ताधारी महागठबंधन 2015 वाला जातिगत समीकरण बना पाने में अब पूरी तरह से सफल नहीं है, जबकि इसमें शामिल दलों का दायरा कहीं ज्यादा विशाल हो चुका है।
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मोकामा और गोपालगंज उपचुनाव के परिणाम
बाहुबली और अपराधी छवि के नेता अनंत सिंह का मोकामा सीट पर 2005 से ही दबदबा रहा है। उनकी पत्नी नीलम देवी को राष्ट्रीय जनता दल के टिकट पर इस बार 53.44% वोट मिले हैं। भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार यहां अपना उम्मीदवार दिया था। उसकी प्रत्याशी सोनम देवी को भी 42.22% वोट मिले हैं, जो कि 2020 में भाजपा के साथ गठबंधन में लड़ी जेडीयू प्रत्याश को मिले 28.92% वोट से कहीं ज्यादा हैं। मोकामा उपचुनाव में इसबार बीजेपी और आरजेडी में सीधा मुकाबला हुआ है। वहीं गोपालगंज में चौतरफा मुकाबले में बीजेपी की कुसुम देवी ने 41.6% वोट लेकर राजद उम्मीदवार मोहन प्रसाद गुप्ता को मामूली अंतर से हराया है, जिन्हें 40.53% वोट मिले हैं। लेकिन, इन चुनाव परिणामों के भीतर कुछ राजनीतिक रहस्य छिपे हुए हैं। खासकर जदयू नेता और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीति के लिए यह कई तरह से झटका माना जा सकता है।

1) बिहार में बीजेपी अकेले चुनाव लड़ सकती है
गोपालगंज और मोकामा दोनों ही सीटों पर एक तरफ कई दलों का महागठबंधन मैदान में था और एक तरफ बीजेपी अकेले चुनाव लड़ रही थी। और इसके बावजूद जो चुनाव परिणाम आए हैं, उससे भाजपा का मनोबल बढ़ा है। यह परिणाम 2015 के विधानसभा चुनाव वाले परिणामों से ठीक उलट है और महागठबंधन के पक्ष में एकतरफा नतीजा नहीं कहा जा सकता। इसके चलते राजद और जदयू के माथे पर चिंता की लकीर पड़ चुकी है और गठबंधन की स्थिरता पर दबाव बढ़ सकता है।

2) अति पिछड़ों की राजनीति पर नीतीश की पकड़ ढीली
बिहार के मोकामा में राजद उम्मीदवार नीलम देवी को 79,744 और बीजेपी की सोनम देवी को 63,003 वोट मिले हैं। 2020 में जदयू को 42,964 वोट मिले थे। यानि कहीं ना कहीं बड़ी संख्या में अति-पिछड़ों का वोट नीतीश से दूर होकर पीएम मोदी के नाम पर भाजपा के पीछे गोलबंद हुआ है और यह महागठबंधन के पक्ष में पूरी तरह से नहीं गया है। कुर्मी जाति का वोट भी राजद उम्मीदवार को कितनी संख्या में गया है, आने वाले समय में इसके तथ्य भी सामने आएंगे। गोपालगंज में भी अति-पिछड़े वोट पर महागठबंधन की पकड़ ढीली पड़ने के संकेत हैं। यानि बीजेपी की नई राजनीति फिलहाल पटरी पर लग रही है, जो अति-पिछड़ों का वोट लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे का इस्तेमाल कर रही है।

3) राजद मुसलमानों की पहली पसंद नहीं
इस साल जून में राष्ट्रीय जनता दल ने असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम के पांच में से चार विधायकों को तोड़कर अपनी पार्टी में मिला लिया था। संदेश यही देने का था कि बिहार में मुस्लिम वोट बैंक पर पहला अधिकार लालू यादव और उनके कुनबे का ही है। लेकिन, गोपालगंज में राजद के मजबूत प्रत्याशी मोहन प्रसाद गुप्ता की कम अंतर से हार ओवैसी के उम्मीदवार अब्दुल सलाम को मिले 7.25% वोट या 12,214 वोटों ने ही तय की है। अगस्त में भाजपा को झटका देकर लालू यादव की पार्टी के साथ नीतीश के हाथ मिलाने के बावजूद मुसलमान अब आरजेडी के पक्ष में आंख मूंदकर पहले की तरह लामबंद होने को तैयार नहीं हैं। यानि सीमांचल की राजनीति का असर लालू यादव के गृह जिले तक महसूस होने लगा है।

4) महागठबंधन की कमजोरी उजागर
मोकामा में राजद की जीत वास्तव में अनंत सिंह की अपनी जाति भूमिहारों पर पकड़ की जीत मानी सकती है। 2005 से ही यह उनका गढ़ रहा है। अलबत्ता यादव वोटर तो आरजेडी के नाम पर पूरी तरह से नीलम देवी के पक्ष में गोलबंद रहे, लेकिन नीतीश कुमार को अपने बिरादरी के वोटरों को समझाने-बुझाने के लिए भी लाखों जतन करने की बातें सामने आ रही हैं। उनका संदेश गांव-गांव तक राजद के उम्मीदवार को जिताने के लिए पहुंचाना पड़ा है। यही नहीं राजद और जदयू के जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल में कमी की बातें भी बताई जा रही हैं। जबकि, यादव वोटर आरजेडी के प्रति पहले से कहीं ज्यादा लामबंद हुए हैं। इसका उदाहरण गोपालगंज में दिखाई दे रहा है, जहां तेजस्वी यादव की मामी इंदिरा यादव बसपा के टिकट पर सिर्फ 8,854 वोट ले पाई हैं। जबकि, पिछले चुनाव में उनके पति को हाथी छाप पर ही 22.94% या 41,039 वोट मिले थे। एक और तथ्य यह भी है कि बिहार में नीतीश कुमार को महिलाओं का बहुत ज्यादा समर्थन होने का दावा किया जाता था। गोपालगंज सीट पर बीजेपी जीती है, जहां 52.45% वोट महिलाओं के पड़े हैं। सवाल है कि क्या यह राजद से गठबंधन की वजह से तो नहीं हुआ है ?

नीतीश कुमार की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा पर चोट
बिहार में बीजेपी से गठबंधन तोड़ने के तुरंत बाद नीतीश कुमार ने 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा जाहिर कर दी थी। आरजेडी नीतीश के साथ तालमेल से पहले से ही कह रही है कि वह केंद्र में जाएं और बिहार को तेजस्वी यादव के लिए छोड़ दें। नीतीश कुमार ने वैसे खुद प्रधानमंत्री के उम्मीदवार होने की अटकलों को तो बार-बार खारिज करने की कोशिश की है, लेकिन केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ विकल्प के तौर पर विपक्षी मोर्चा तैयार करने का जोश जरूर दिखाया है। नीतीश और उनकी पार्टी का कद 2020 के चुनाव में ही घट गया था, जब भाजपा ने बड़ी पार्टी बनकर भी उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी थी। वही व्यवस्था राजद के साथ भी है, जिसके 81 विधायकों के चक्कर में पड़े होने की चर्चा है। ऐसे में यह देखने वाली बात है कि बदली हुई परिस्थितियों में नीतीश अपना राष्ट्रीय एजेंडा कैसे आगे बढ़ाते हैं, क्योंकि अब उन्हें बिहार से लेकर देश में हर जगह भाजपा का ही सामना करना है।
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