भाई मति दास जी: 'मृत्यु स्वीकार थी, लेकिन इस्लाम नहीं,' सिख धर्म के महान शहीद का अद्वितीय बलिदान

Bhai Mati Das Ji: भाई मति दास जी सिख धर्म के महान शहीदों में से एक थे, जिन्होंने गुरु तेग बहादुर जी के साथ धर्म और सत्य की रक्षा के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। वे गुरु जी के परम भक्त और विश्वासपात्र थे। 1675 में जब मुगल शासक औरंगजेब ने जबरन इस्लाम स्वीकारने का दबाव डाला, तो भाई मति दास जी ने अपने धर्म और सिद्धांतों से समझौता करने से स्पष्ट इनकार कर दिया।

इसके परिणामस्वरूप उन्हें दिल्ली के चांदनी चौक में क्रूरतापूर्वक आरे से चीरकर शहीद कर दिया गया। उनका बलिदान सिख इतिहास में एक अविस्मरणीय उदाहरण है, जो आज भी साहस, निष्ठा और धर्म के प्रति अटूट समर्पण की प्रेरणा देता है।

Matidas ji

भाई दयाला जी की शहादत के 350वें प्रकाश पर्व के अवसर पर विरासत सिख धर्म ट्रस्ट के अध्यक्ष, राजिंदर सिंह, भाई मति दास जी, भाई सती दास जी संग्रहालय एवं पुस्तकालय, बिलासपुर (उत्तर प्रदेश) में आयोजित समागम में शामिल हुए। इस अवसर पर भाई मति दास जी के परिवार की ओर से बड़े सरदार अजीत सिंह ने राजिंदर सिंह विरासत का स्वागत किया और उन्हें सिरोपा भेंट किया।

समारोह के दौरान परिवार के सदस्य सरदार चरणजीत सिंह ने संगत को संबोधित करते हुए कहा कि इस वर्ष गुरु तेग बहादुर साहिब, भाई मति दास जी, भाई सती दास जी और भाई दयाला जी की शहादत के 350वें प्रकाश पर्व को समर्पित एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इस आयोजन को पंथक दलों और गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटियों के सहयोग से भव्य रूप दिया जाएगा, जिसका मुख्य उद्देश्य इन महान शहादतों को व्यापक रूप से उजागर कर पूरी दुनिया तक पहुंचाना होगा।

इस अवसर पर राजिंदर सिंह विरासत ने अपने विचार साझा करते हुए कहा कि हमारे इतिहास के कई पहलुओं को समझने और संरक्षित करने के लिए गहन अध्ययन और दूरदर्शिता की आवश्यकता है। उन्होंने परिवार के पास मौजूद फारसी भाषा में लिखे ऐतिहासिक दस्तावेजों के शीघ्र अनुवाद के लिए अपना समर्थन देने की घोषणा की, ताकि वे उपेक्षित न रहें और सभी के लिए सुलभ हो सकें।

Matidas ji

कार्यक्रम के अंत में, डॉ. कश्मीर सिंह ने संगत का धन्यवाद किया और भाई परागा जी से जुड़ी अनूठी जानकारी प्रदान करने के लिए विशेष रूप से राजिंदर सिंह का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर परिवार के सदस्य सीनियर हरिंदर सिंह, प्रितपाल सिंह और सुखदेव सिंह चीमा ने भी 350 वर्ष के इस विशेष आयोजन में साझा इतिहास और सहयोग के लिए राजिंदर सिंह का आभार प्रकट किया।

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