2024 से पहले दो राज्यों में अपने ही सहयोगी दे रहे हैं टेंशन, कैसे निपटेगी बीजेपी?
2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को सिर्फ बिहार में जातिगत जनगणना के बाद इंडिया ब्लॉक से पैदा हुई राजनीतिक चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ेगा। बल्कि, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में उसे अपनी सहयोगियों से भी इस मसले पर मिल रहे टेंशन का सामना करना होगा।
80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सबसे बड़ी सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) ने भी जातिगत सर्वे की मांग पर जोर देने की तैयारी शुरू कर दी है। अगले महीने की शुरुआत में केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल की पार्टी अयोध्या में स्थापना दिवस कार्यक्रम मनाने जा रही है, जिसमें पार्टी की ओर से यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया जा सकता है।

यूपी में यादवों के बाद ओबीसी में सबसे अधिक कुर्मी की जनसंख्या का अनुमान
अपना दल (सोनेलाल) की यह मांग इसके शुरुआती दिनों से ही रही है, लेकिन बिहार में आई जातीय जनगणना की रिपोर्ट ने इसे फिर से जगा दिया है। अनुप्रिया पटेल कुर्मी हैं और ओबीसी में शामिल इस जाति की आबादी यूपी में यादवों के बाद सबसे ज्यादा मानी जाती है।
महाराष्ट्र में अजित पवार ने दबाव बनाना शुरू किया
उत्तर प्रदेश के बाद लोकसभा की सबसे ज्यादा 48 सीटें महाराष्ट्र में हैं। भाजपा ने ताजा राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए 40 सीटों वाले बिहार में संभावित चुनौती को देखते हुए इसी राज्य से सबसे ज्यादा भरपाई की उम्मीदें लगा रखी हैं। एनसीपी के अजित पवार गुट को राज्य सरकार में एक तरह से खुली छूट देने के पीछे भी यही वजह है। लेकिन, अब उन्होंने भी राज्य में बिहार जैसा जातिगत सर्वेक्षण कराने की मांग पर जोर देना शुरू कर दिया है।
सोलापुर में एनसीपी के एक कार्यक्रम में सोमवार को उन्होंने कहा, 'जैसा कि नीतीश कुमार ने जातिगत सर्वे कराया है, मैंने कहा है कि उसी तरह का एक सर्वे महाराष्ट्र में भी होना चाहिए, जिससे पता चले कि ओबीसी, अनुसूचित जनजाति, अल्पसंख्यक और खानाबदोश जनजाति कितने हैं और सामान्य श्रेणी में हमारे पास कितने हैं। हमें यह जानने की जरूरत है, क्योंकि इसी आधार पर हम यह निर्धारित कर सकते हैं कि आबादी के अनुसार किसे कितना फंड देना है..... '
अयोध्या की रैली में अनुप्रिया पटेल चल सकती हैं जाति जनगणना का कार्ड
उत्तर प्रदेश में कुर्मियों की आबादी मूल रूप से पूर्वांचल और अवध के क्षेत्र में मानी जाती है। पूर्वांचल में वाराणसी, प्रयागराज, मिर्जापुर में इसका ज्यादा प्रभाव है। वहीं लखनऊ, फतेहपुर, कानपुर और कुछ हद तक बुंदेलखंड में भी इनकी मौजूदगी है। अनुप्रिया पटेल मूल रूप से ओबीसी में इन्हीं की राजनीति करती हैं। माना जा रहा है कि 4 नवंबर को उनकी पार्टी के 29वें स्थापना दिवस पर जो अयोध्या में विशाल रैली होने वाली है, उसमें यह मुद्दा प्रमुखता से उठ सकता है।
यही नहीं, पटेल ओबीसी क्रीमी लेयर की सीमा को भी मौजूदा 8 लाख रुपए सालाना से 15 लाख रुपए करने की वकालत कर रही हैं। पहले यह 6 लाख रुपए ही थी, जिसे मोदी सरकार के कार्यकाल में बढ़ाकर 8 लाख रुपए किया गया है।
हालांकि, महाराष्ट्र के मामले में पवार ने कहा है कि इस मामले में उनकी मौजूदा सरकार ने बिहार सरकार से इसका तरीका समझने के लिए संपर्क भी किया है। उनके मुताबिक, 'मैं, सीएम एकनाथ शिंदे, डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस ने बिहार सरकार से डिटेल मांगी है। हमें पता चला है कि इस अभियान पर 1,000 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। हम यह लागत उठा सकते हैं, लेकिन हमारे सामने असली तस्वीर आनी चाहिए।'
जाति वाले मसले पर संभलकर चलने की कोशिश में दिख रही है बीजेपी
इस समय जातिगत जनगणना को सबसे बड़ा मुद्दा कांग्रेस ने बना रखा है। बीजेपी इसके लिए तैयार नहीं दिख रही है। लेकिन, अब उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण दो राज्यों में सहयोगियों ने ही इसके लिए बैटिंग शुरू कर दी है। इसलिए पार्टी बहुत ही संभलकर स्थिति को समझने की कोशिश कर रही है।
मसलन, महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री और भाजपा के बड़े नेता देवेंद्र फडणवीस ने कहा, 'मैंने नहीं देखा है कि अजित पवार ने क्या कहा है, लेकिन हमने ओबीसी जनगणना को ना नहीं कहा है, मसला इसके करने के तरीके को लेकर है, बिहार में पहले ही समस्याएं (जातियों के बीच)शुरू हो चुकी हैं। हमें ऐसे कदम उठाने होंगे, ताकि यहां उस तरह की दिक्कतें ना हों। इसलिए इन सभी चीजों को ध्यान में रखकर उचित फैसला लिया जाएगा।'












Click it and Unblock the Notifications