Bihar News: केले का तना बना कमाई का खजाना, रेशा और कंपोस्ट से लाखों का कारोबार
बाँधेरा, बिहार में, लगभग 50 किसान केले के पौधे के कचरे को मूल्य वर्धित उत्पादों जैसे कपड़े, टोकरियाँ और शिल्प में बदलकर आय में बदलते हैं, जबकि गूदे के कचरे से जैविक उर्वरक का उत्पादन करते हैं। सहकारी मॉडल महिला समूहों और व्यापक गाँव की सफाई का समर्थन करता है, जो कचरा प्रबंधन और आजीविका के लिए एक स्थायी मार्ग प्रदान करता है।
खगड़िया जिला के परबत्ता प्रखंड अंतर्गत बंदेहरा पंचायत के करीब 50 किसान अतिरिक्त आमदनी और स्वच्छता के क्षेत्र में नई मिसाल कायम कर रहे हैं। यहां केले की खेती करने वाले किसान अब केवल फल बेचकर ही नहीं, बल्कि फसल के अपशिष्ट से भी हजारों-लाखों रुपये की कमाई कर रहे हैं। यह पहल लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत शुरू हुई, जिसने किसानों को कचरे के निस्तारण और अतिरिक्त आय का नया रास्ता दिखाया।

बंदेहरा पंचायत में करीब 15 एकड़ भूमि पर केले की खेती होती है। पहले किसान फल निकालने के बाद तनों और अन्य अवशेषों के निस्तारण को लेकर परेशान रहते थे, जिससे गांव में गंदगी फैलती थी।
अभियान के तहत फसल अवशेष से उपयोगी उत्पाद तैयार कर बाजार में बेचने की योजना शुरू की गई। आज यह प्रयोग कचरा प्रबंधन और आय सृजन का सफल मॉडल बन चुका है। आसपास के गांवों के किसान भी इससे प्रेरित हो रहे हैं।
केले के तने से निकाले गए रेशे से वस्त्र, टोकरी, बैग, मैट, कालीन और हैंडीक्राफ्ट टोपी जैसे उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। ये पर्यावरण अनुकूल उत्पाद पर्यटकों की पहली पसंद बन रहे हैं और इनकी मांग देश के साथ विदेशों तक पहुंच चुकी है। किसानों को प्रति तना के हिसाब से केला किसान सहकारी समिति द्वारा भुगतान किया जाता है, जिससे उन्हें अतिरिक्त आमदनी हो रही है।
पल्प वेस्ट से बन रही जैविक खाद
केला किसान सहकारी समिति के निदेशक बृजेश कुमार के अनुसार, रेशा निकालने के बाद बचे पल्प वेस्ट से जैविक खाद तैयार की जा रही है। इस खाद की बाजार में अच्छी मांग है और यह करीब 50 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिक रही है।
इस कार्य में बंदेहरा और आसपास के क्षेत्रों की जीविका से जुड़ी लगभग 50 महिलाएं सक्रिय हैं। यह समूह खाद उत्पादन के साथ करीब 80 एकड़ भूमि पर सामूहिक जैविक खेती को भी बढ़ावा दे रहा है।
स्वच्छता और आय बढ़ोतरी का मॉडल
इस पहल से किसानों को दोहरा लाभ मिल रहा है—एक ओर फसल अवशेष के निस्तारण पर होने वाला खर्च बच रहा है, तो दूसरी ओर उसी अपशिष्ट से अतिरिक्त आय हो रही है।
बंदेहरा पंचायत का यह मॉडल अब ग्रामीण स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और स्वरोजगार का प्रेरक उदाहरण बन चुका है।
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