'सिंगल यूज़ प्लास्टिक' पर पाबंदी क्या 'प्लास्टिक पॉलिटिक्स' की जीत है?
सिंगल यूज़ प्लास्टिक के 19 प्रोडक्ट्स पर शुक्रवार से प्रतिबंध लागू हो गया है.
पर्यावरणविद इसे 'लो हैंगिग फ्रूट्स' (यानी ऐसा लक्ष्य जिसे आसानी से हासिल किया जा सके) को निशाना बनाने और पूरे मामले में एक बार फिर से 'प्लास्टिक पॉलिटिक्स' यानी बिग कॉरपोरेट्स की जीत बता रहे हैं.
वहीं इस क्षेत्र के बहुत सारे उद्यमियों तक को पूरी तरह से ये मालूम नहीं कि इस श्रेणी की प्लास्टिक्स से बनी कौन-कौन सी वस्तुएं प्रतिबंधित लिस्ट में शामिल हैं.
दिल्ली सदर बाज़ार के गली बरना में प्लास्टिक के थोक व्यापारी उमेश अग्रवाल को 'जो भी पता चला है वो व्हॉट्सऐप से मिली जानकारी के आधार पर है, क्या बैन होगा और क्या नहीं इसे लेकर संशय की स्थिति है, कोई कह रहा है कि 100 माइक्रोन, कोई 80 माइक्रोन के माल पर प्रतिबंध की बात कर रहा है.'
कच्चा माल के थोक बाज़ार में 'दाना' की क़ीमत में कुछ ही दिनों में 20 रुपये प्रति किलोग्राम के गिरावट की बात कही जा रही है.
नहीं बढ़ी तारीख़
गुरुवार शाम तक क्षेत्र से जुड़े लोगों की उम्मीद क़ायम थी कि प्रतिबंध की तारीख़ पिछली कई बार की तरह एक बार फिर से बढ़ा दी जाएगी, और इसके लिए कोशिशें भी जारी रहीं.
लेकिन पर्यावरण मंत्रालय ने शायद ठान लिया था कि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साल 2019 में स्वतंत्रता दिवस भाषण में कही गई बात को इस दफ़ा लागू करके रहेगी.
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में साल 2022 तक 'सिंगल यूज़ प्लास्टिक' एक बार इस्तेमाल होनेवाले प्लास्टिक को समाप्त करने की बात कही थी. इसका ज़िक्र फिर से उन्होंने दिसंबर 2020 के अपने मन की बात में भी किया था.
सरकार ने इसके बाद वेस्ट मैनेजमेंट नियम में संशोधन कर 'सिंगल यूज़ प्लास्टिक' को परिभाषित करते हुए कहा है कि प्लास्टिक से बनी हुई वैसी वस्तु जिसका इस्तेमाल उस काम के लिए सिर्फ एक बार ही किया जाता है जिसके लिए वो तैयार की जाती है, और फिर या तो उसे समाप्त कर दिया जाता है या रिसाइकल की जाती है तो ये एक बार इस्तेमाल होनेवाले प्लास्टिक कहा जाएगा.
बाद में एक समिति बनाई गई जिसने उपयोगिता और पर्यावरण को होनेवाले नुक़सान के आधार पर एक लिस्ट तैयार की. इस लिस्ट में से 19 वस्तुओं पर पहली जुलाई, 2022 से प्रतिबंध लागू हो गया है.
जिन प्रोडक्ट्स पर प्रतिबंध लगाया गया है उसमें ईयर बड्स, बलून में लगाए जानेवाले प्लास्टिक स्टिक्स, प्लास्टिक प्लेट्स, कप्स, कांटे-चम्मच और वैसे बैनर्स शामिल हैं जो सौ माइक्रॉन से कम की मोटाई वाले हैं.
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उठ रहे हैं सवाल
सरकारी आदेश में इन वस्तुओं को सिंगल यूज़ प्लास्टिक की श्रेणी में रखा गया है और इन्हें कम उपयोगी और अधिक कूड़ा फैलानेवाला बताया गया है.
हालांकि विशेषज्ञ समिति द्वारा तैयार फाइनल लिस्ट को लेकर कई तरह के सवाल उठाते हैं.
पर्यावरण के क्षेत्र की जानी-मानी संस्था सेंटर फ़ॉर साइंस एंड एंवारामेंट के सिद्धार्थ सिंह कहते हैं, "प्लास्टिक स्ट्रॉ को चुना गया है जिसकी उपयोगिता का इंडेक्स 16 माना गया है जबकि पर्यावरण पर उसका दुष्प्रभाव का अंक 87 है. लेकिन वहीं समिति ने सिगरेट फिल्टर को हाथ नहीं लगाया है जिसकी उपयोगिता और पर्यावरण नुक़सान के इंडेक्स को क्रमश: 20 और 93 पाया गया."
उनसे ये पूछने पर कि ऐसा क्यों हुआ, वो हंसते हुए जवाब देते हैं, "इसे हम 'प्लास्टिक पॉलटिक्स' कहते हैं."
प्लास्टिस इंडस्ट्री को क़रीब से जाननेवालों का कहना है कि पहले जो सूची तैयार हुई थी उसमें 65 से 70 आइट्म्स थे.
लेकिन सिद्धार्थ सिंह कहते हैं, "जहां से शुरुआत हो रही है उसका स्वागत किया जाना चाहिए." हालांकि वो ये भी मानते हैं कि फिलहाल लागू की गई लिस्ट 'लो हैंगिंग फ्रूट्स' हैं.
प्लास्टिक के छोटे और मझोले यूनिट्स से जुड़े लोग ये भी सवाल उठाते हैं कि अगर प्लास्टिक नुक़सानदेह है तो बड़ी कंपनियों के माल तैयार करने पर ही रोक क्यों लागू नहीं किया जाता है और सिर्फ छोटे उद्योग और व्यापारी ही हमेशा निशाने पर क्यों आते हैं?
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बहादुर गढ़ रोड पर स्थित प्लास्टिक डीलर्स एसोसिएशंस के सेक्रेटरी विपिन तनेजा कहते हैं, "जब तक पेट्रोलियम-पेट्रोकेमिकल्स रहेगा प्लास्टिक रहेगा. प्लास्टिक का कच्चा माल तैयार करने में तो सरकारी कंपनियों इंडियन ऑयल कार्पोरेशन से लेकर गेल और प्राइवेट कार्पोरेट्स जैसे रिलायंस, मित्तल वग़ैरह शामिल हैं."
केंद्रीय प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के अनुसार भारत में प्लास्टिक का इस्तेमाल पिछले पांच सालों में दोगुना हो गया है और साल 2020 में देश में क़रीब 35 लाख टन प्लास्टिक कचरा तैयार हुआ.
ये दुनिया में चीन, अमेरिका, इंडोनेशिया और जापान के बाद सबसे अधिक था.
सरकार ने कहा है कि बैन को ठीक तरह से लागू करने के लिए राज्य और देश स्तर पर कंट्रोल रूम्स की स्थापना की जाएगी और जनता को इस काम में शामिल किया जाएगा.
बयान में सरकार ने एक बार इस्तेमाल किए जाने वाले प्लास्टिक प्रोडक्स्ट्स और उसकी वजह से जमा होनेवाले कचरे को पर्यावरण के लिए विश्व-स्तरीय चैलेंज बताया है.
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सिद्धार्थ सिंह कहते हैं, "आज हम प्लास्टिक खा रहे हैं, फेफड़े में ले रहे हैं और पी भी रहे हैं. प्लास्टिक के प्रोडक्स तैयार करने में दस हज़ार 'ऐडटिव्स' का प्रयोग होता है और जिन्हें लेकर संयुक्त राष्ट्र तक ने माना है कि उनमें से क़रीब ढाई हज़ार के साथ दिक्क़त है और उनका प्रयोग रोक दिया जाना चाहिए."
मुंबई के जयेश रांभिया कहते हैं, "शराब, सिगरेट के इस्तेमाल से साल भर में लाखों लोगों की मौत होती है लेकिन किसी ने उसे बैन नहीं किया. समुद्र में जो प्लास्टिक का कचरा जाता है वो उसका प्रबंधन ठीक तरह से न होने के कारण है."
जयेश रांभिया प्लास्टिक उद्योग से जुड़े हैं. वे कहते हैं, "प्लास्टिक पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं बल्कि बेहतर है क्योंकि इसके इस्तेमाल से पेड़ की कटाई में कमी आई है जो क़ागज़ के इस्तेमाल के बढ़ने से फिर से शुरू हो जाएगी."
दूसरी तरफ़, उद्योग जगत मंदी की तरफ़ बढ़ती दिख रही अर्थव्यवस्था के दौर में कारख़ानों के बंद होने के ख़तरे, बैंक क़र्ज़, जाती नौकिरियों और फैक्ट्रियों को नए मानकों के माल तैयार करने के लिए अतिरिक्त फंड लगाने जैसी चिंताओं को लेकर भी परेशान है.
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