Odisha Accident: मैं तो मर चुका था, उसने मुझे शवों के बीच से बचा लिया, उसका शुक्रिया भी नहीं कर पाया...
ओडिशा रेल हादसे में 24 साल के बिस्वजीत बुरी तरह से घायल होकर बेहोश हो गए थे, उन्हें शवों के ढेर में दबा दिया गया था, लेकिन आखिरी समय पर उन्हें एक व्यक्ति ने इस ढेर से बाहर निकाला और उन्हें अस्पताल पहुंचा दिया।

Balasore Train Accident: ओडिशा के बालासोर रेल हादसे में सैकड़ों लोगों की मौत हो गई। इस हादसे के बाद कई ऐसी कहानियां सामने आ रही हैं जो किसी फरिश्ते की कहानी जैसी लगती है। ट्रेन हादसे के बाद कई लोगों के शव को वहां से हटाया गया, इसमे 24 साल के बिस्वजीत मलिक भी थे, जिन्हें लोगों ने मृत समझकर शवों के साथ रख दिया था।
जब रेल हादसे में मृतकों के शव को एक जगह इकट्ठा किया जा रहा था तो उसमे बिस्वजीत मलिक भी शामिल थे। शवों के ढेर में से अचानक घायल बिस्वजीत अपना हाथ हिलाया। इस दौरान उन्होंने जिस व्यक्ति का पैर गलती से पकड़ा था वह उनके लिए जीवन और मृत्यु के बीच का फैसला साबित हुआ।
इस व्यक्ति ने बिस्वजीत मलिक को कोलकाता के अस्पताल में भर्ती कराया, जहां उनका इलाज चल रहा है। मलिक बताते हैं कि एक्सिडेंट के तुरंत बाद मैं अंधेरे में चला गया था, मुझे याद है कि मुझे दाएं हाथ में असहनीय दर्द हो रहा था, मेरा दांया पैर दो सीट के बीच फंस गया था। मुझे याद नहीं मैं इस स्थिति में कबतक रहा।
मलिक ने बताया कि मैंने स्थानीय आदमी से मोबाइल फोन मांगा और अपने पिता को फोन किया और उन्हें इसकी जानकारी दी कि ट्रे्न का एक्सिडेंट हो गया है। मैं दर्द की वजह से बात भी नहीं कर पा रहा हूं। इस दौरान मलिक को नहीं पता था कि वह कितने चोटिल हैं, लेकिन फोन करने के बाद उन्होंने देखा कि उनका दांया हाथ अलग हो गया है, उनका टखना टूट गया है, जिसकी वजह से मलिक जमीन पर ही बेहोश हो गए।
बिस्वजीत के पिता हेलाराम मलिक ने कहा कि जो लोग ट्रेन के डिब्बे से शव निकाल रहे थे उन्हें लगा कि बिस्वजीत की मौत हो गई है। उन्होंने उसके ऊपर कुछ और शव को रख दिया, लेकिन सौभाग्य से मलिक को होश आ गया और उन्होंने अपना हाथ हिलाया, जो गलती से वहां राहत बचाव में लगे व्यक्ति के पैर से छू गया।
जिस आदमी का पैर बिस्वजीत ने गलती से छुआ था उसने तुरंत मलिक को शवों के ढेर से अलग किया और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया। बेटे का फोन आने के बाद हेलाराम मलिक ने अपने पड़ोसी को इसकी जानकारी दी। आसपास के 4 लोग ट्रेन के डिब्बे में थे। लोगों ने दो गाड़ियां बुक की और बालासोर पहुंचे। लेकिन जबतक हम वहां पहुंचते मेरे बेटे ने फोन करके बताया कि वह अस्पताल में भर्ती हैं।
अपनी आप बीती को साझा करते हुए बिस्वजीत मलिक कहते हैं कि यह मेरा दूसरा जन्म है, लेकिन मैं उस व्यक्ति का शुक्रिया अदा नहीं कर पाया जिसने मुझे शवों के ढेर से निकाला। वह मेरे साथ कुछ घंटों तक था, लेकिन मेरे पिता के आने से पहले वह चला गया। मैं शायद यह कभी ना जान पाऊं की वह कौन था।












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