Babu Jagjivan Ram: सियासी प्रतिभा की काट न मिली तो 'नंगी तस्वीरों' से कुठाराघात! 'बाबूजी' आज भी अमर हैं, जानिए
देश के पूर्व रक्षा मंत्री और उपप्रधानमंत्री रहे Babu Jagjivan Ram (बाबूजी) का जीवन जन्म के 115 साल बीतने के बाद भी प्रासंगिक है। इनकी जयंती पर बिहार में 1908 में जन्मे बाबूजी के जीवन से जुड़ी प्रेरक बातें जानिए।

Babu Jagjivan Ram: बिहार के आरा के चंदवा गांव में बाबू जगजीवन राम का जन्म हुआ। भारतीय राजनीति के सूरमा कहे जाने वाले बाबूजी देश के उपप्रधानमंत्री पद तक पहुंचे। बड़े भाई शिक्षक थे। उनसे ही बाबूजी को शिक्षा मिली, लेकिन बाबू जगजीवन राम राजनीति में जाना चाहते थे।
पैतृक गांव के लोग बताते हैं कि दिल्ली की राजनीति में सक्रिय होने के बाद बाबू जगजीवन राम ने चंदवा में घर का निर्माण कराया जो आज बेहद जीर्ण-शीर्ण स्थिति में है। 115वीं जयंती पर कुछ रोचक बातें जानिए
बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में बाबूजी का रोल
रक्षा मंत्री के रूप में इनके कार्यकाल का आज भी जिक्र होता है। ईस्टर्न कमांड के ले. जनरल जैकब ने ऑटोबायोग्राफी में लिखा कि भारत को बाबू जगजीवन राम से बेहतर रक्षा मंत्री नहीं मिला। 1971 के युद्ध में जीत का सेहरा बाबूजी के सिर बंधा।
इंदिरा गांधी के कार्यकाल में भारतीय सेना ने बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में अद्भुत शौर्य दिखाया। जीनियस सैन्य अधिकारी सैम मानेकशॉ की रणनीति और तत्कालीन रक्षा मंत्री बाबू जगजीवन राम का सैनिकों के बीच जाना खास था। तस्वीरें आजाद हिंदुस्तान की गोल्डन आर्काइव का हिस्सा हैं।
Babu Beats Bobby! रामलीला मैदान में उमड़ा जनसैलाब
भीमराव आंबेडकर के बाद देश में सबसे बड़े दलित नेता की पहचान बनाने वाले बाबूजी ने संविधान सभा में भी भाग लिया। देश की आजादी से पहले राजनीति में सक्रिय हो चुके बाबूजी ने दलित और वंचित तबके के हक की आवाज बुलंद की।
बाबूजी की लाइफ से एक रोचक फिल्मी प्रसंग भी जुड़ा है। दरअसल, राज कपूर ने बॉबी फिल्म का निर्माण किया। 1972-73 के दौर में बिकिनी सीन को लेकर चर्चा में रही फिल्म बॉबी ब्लॉकबस्टर साबित हुई।
जिस समय बॉबी लोकप्रियता के शिखर पर थी, उसी समय राजनीतिक विपक्ष भी लामबंद हो रहा था। फिल्म के सहारे बाबूजी पर लगाम लगाने की कोशिश हुई, लेकिन 'साजिश' रचने वाले चारो खाने चित्त हो गए।
सियासत में सिल्वर स्क्रीन वाली रणनीति, जीत किसकी?
दरअसल, विद्याचरण शुक्ल के सूचना और प्रसारण मंत्री रहने के दौरान बॉबी फिल्म को टीवी पर दिखाने का फैसला लिया गया। इस दौर में टीवी पर बमुश्कित कोई फिल्म दिखाई जाती थी, लेकिन ऐतिहासिक रैली के दिन ऐसा हुआ।
जिस शाम फिल्म का प्रसारण हुआ, उसी दिन दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्षी नेताओं की जनसभाएं हुईं। कोशिश इस जलसे को नाकाम करने की थी, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी और बाबूजी जैसे ओजस्वी वक्ताओं और जननेता इतनी आसानी से कहां हारते हैं।
का ऐसा क्रेज हुआ कि लोग बॉबी फिल्म छोड़कर बाबू जगजीवन राम के भाषण सुनने पहुंचे। तत्कालीन पत्रकारों का मानना है कि अंग्रेजी अखबारों में 'बाबू बीट्स बॉबी' जैसी हेडलाइन प्रकाशित की गई। यानी इन्होंने फिल्मी रणनीति को मात दे दी।

जातीय पहचान का खामियाजा
देश की पहली सरकार में पंडित जवाहरलाल नेहरू की कैबिनेट में सबसे युवा मंत्री के तौर पर शामिल हुए। इंदिरा गांधी की कैबिनेट में भी बाबू जगजीवन राम शामिल रहे। हालांकि, 1974 आते-आते इनकी वरिष्ठता की अनदेखी होने लगी। कांग्रेस में दरकिनार कर दिए गए।
संसदीय क्षेत्र के लोगों की शिकायतें
बाबूजी की राजनीति को जातीय पहचान का खामियाजा भुगतना पड़ा। जनता पार्टी में शामिल हुए बाबूजी मोरारजी देसाई की कैबिनेट में रक्षा मंत्री रहे, जबकि चौधरी चरण सिंह के पीएम बनने पर उनके डिप्टी बने।
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बाबू जगजीवन राम के नाम एक अनोखा कीर्तिमान भी दर्ज है। सबसे लंबे समय तक कैबिनेट मंत्री औऱ सांसद रहने का कीर्तिमान आज भी बाबू जगजीवन राम के नाम पर दर्ज है। उनके पैतृक घर के आस-पास रहने वाले लोग बताते हैं कि इलाका विकास की बाट जोह रहा है।
दिल्ली की सियासत में जाने के बावजूद चंदवा आज भी संघर्ष कर रहा है। हरिजनों को आश्वस्त किया गया था कि उनके लिए फैक्ट्री लगवाई जाएगी, लेकिन उनके सपने अधूरे हैं। सामाजिक विकास या गांव में तत्कालीन सरकार की भूमिका कठघरे में जरूर है।
गांव के बुजुर्ग ने अधिकार से दिलवाईं नौकरियां!
चंदवा गांव में रहने वाली महिलाएं बताती हैं कि गांव आने के बाद 20 गाड़ियां उनके काफिले में रहती थीं। एक महिला बताती हैं कि कोलकाता में नौकरी करने वाले शख्स की नौकरी छूटने के बाद गांव के बुजुर्ग ने बाबूजी से आदेशात्मक अंदाज में नौकरी लगवाने को कहा।
इस बुजुर्ग ने बाबूजी से कहा कि बच्चे भूख से मर रहे हैं, इनकी नौकरी लगवाओ। इसके बाद मुगलसराय (अब दीन दयाल उपाध्याय जंक्शन) में गांव के चार लोगों को नौकरी में बहुत मदद मिली।
जातिगत सियासत के आसमान पर प्रतिभा का घूमकेतु!
कांग्रेस में रहते हुए बाबू जगजीवन राम को डिप्टी पीएम का तगड़ा दावेदार माना जाता था। तीन दशक से भी अधिक समय पहले बाबूजी 6 जुलाई 1986 के दिन चिरनिद्रा में सो गए, लेकिन आज भी ये हस्ती प्रासंगिक है।
बाबू जी इसलिए प्रासंगिक हैं क्योंकि, जाति आधारित राजनीति की बात के लिए कुख्यात प्रदेश- बिहार से इनका ताल्लुक है। तत्कालीन बिहार में जिस तरह की जातिगत सियासत होती थी, उसमें बाबूजी लंबे समय तक प्रदेश की आवाज बने रहे।
46 साल का संसदीय करियर
स्कूलों में अछूतों के लिए रखी मटकी फोड़ने वाले जगजीवन राम जब गांव में घूमते थे तो किसी तथाकथित ऊंची जातियों वाले घरों में अंदर प्रवेश नहीं करते थे। 1946 से 1986 तक सांसद रहे बाबू जगजीवन राम पहली बार लेबर मंत्री बने।
तत्कालीन केंद्र सरकार की कैबिनेट में शामिल बाबूजी और सियासत की समझ रखने वाले लोग बताते हैं कि बाबू जगजीवन राम की हैसियत का अंदाजा कैबिनेट की एक तस्वीर से लगाया जा सकता है जिसमें बाबूजी पंडित नेहरू के साथ युवा मंत्री के रूप में देखा जा सकते हैं।
शायद यही कारण है कि निधन के तीन दशक से अधिक समय बाद भी आधनुिक राजनीति में लोकप्रियता के नए आयाम स्थापित करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इनके सामने पूरी श्रद्धा से झुकते हैं।

प्रतिभा ऐसी कि महामना ने खुद BHU आमंत्रित किया
काशी हिंदू विश्वविद्याय (BHU) से जुड़े एक किस्से में लोग बताते हैं कि 1925 में संस्थापक महामना मालवीय के सामने कैंपस में प्रभावी भाषण देने वाले जगजीवन राम को मालवीय ने उन्हें विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए खुद आमंत्रित किया।
गरीब जगजीवन राम को औद्योगिक घराने बिड़ला से स्कॉलरशिप मिला। हालांकि, सामाजिक स्वीकार्यता में काफी परेशानी हुई। कई किताबों में जिक्र है कि सामूहिक भोजन के लिए उन्हें मेस में आने दिया गया, लेकिन उन्हें कोई खाना परोसता ही नहीं।
नाई हजामत बनाने तक को तैयार नहीं होते थे। उनकी बेटी और लोक सभा स्पीकर मीरा कुमार बता चुकी हैं कि बनारसी नाई के अभाव में उनके लिए गाजीपुर से नाई आता था।
बिहार के स्कूल में घड़े फोड़ने की घटना
एक समय हिंदू और मुस्लिम समाज का विभाजन इतना गहरा था कि पानी पीने के लिए भी अलग-अलग घड़े रखे जाते थे। दशकों पहले हुई इस घटना और बाबूजी से जुड़े कई प्रसंग हैं। बिहार के स्कूल में पढ़ने के दौरान इन्होंने कमाल का विरोध दर्ज कराया।
एक बार जब बाबूजी ने दूसरे घड़े का पानी पी लिया तो, दो अलग-अलग घड़ों के बदले तीसरा घड़ा रखवाया गया। किशोरावस्था में बाबूजी ने लगातार दो घड़े फोड़ डाले। प्रिंसिपल को गलती का एहसास हुआ। तथाकथित अछूतों के लिए अलग घड़ा रखने की परंपरा खत्म हुई।
प्रधानमंत्री पद के दावेदार, लेकिन ग्रहण लग गया
दलित समाज से आने के बावजूद बाबू जगजीवन राम ने लेबर मंत्री रहते हुए आजाद भारत के अहम फैसले लिए। पेंशन, बोनस, इंश्योरेंस जैसी चीजें बाबूजी के विजन की ही देन है। प्रखर दलित नेता की छवि वाले बाबू जगजीवन राम कभी पीएम नहीं बन सके।
प्रधानमंत्री पद के दावेदार माने जाने वाले बाबूजी को बेटे की एक नग्न फोटो के कारण शर्मिंदगी उठानी पड़ी। उनकी सियासत पर ग्रहण लग गया। सियासत में साम-दाम दंड भेद की नीति अपनाने वाले लोग कुछ भी करने को तैयार होते हैं, शायद ये ऐसा ही कृत्य था।
इस घटना को ऐसे भी देखा जाता है कि जब बाबूजी की सियासी प्रतिभा की कोई दूसरी काट नहीं मिली तो 'बेटे की नंगी तस्वीरों' से इन पर कुठाराघात किया गया, जिसके बाद भारतीय राजनीति के धूमकेतु का अवसान हुआ। अंत में बाबूजी की 115वीं जयंती पर शब्द प्रणति।
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