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क्या भारत भी गूगल और फेसबुक को पारंपरिक मीडिया से अपने प्रॉफिट शेयर करने को कहेगा?

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नई दिल्ली। नोवल कोरोनो वायरस महामारी ने समाचार कंपनियों को एक आर्थिक संकट में धकेल दिया है, क्योंकि एक तरफ जहां समाचार एकत्र करने, तथ्यों की जांच करने और उनके वितरण में वृद्धि हुई है, वहीं दूसरी तरफ राजस्व में तेजी से गिरावट आई है। इसका सीधा सा मतलब है कि मीडिया कंपनियां न्यूज जुटाने वाले कर्मचारियों को छोड़ना पड़ रहा है, जिससे नागरिकों तक प्रमाणिक समाचार पहुंचाने के लिए मीडिया कंपनियों के पास कम मानव संसाधन होंगे।

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कुछ विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया है कि वैश्विक स्तर पर समाचार कर्मचारियों की संख्या 30,000 से अधिक है। उनके मुताबिक मीडिया कंपनियों द्वारा एकत्रित और संसाधित समाचार प्रदर्शित करके Google और फेसबुक अरबों कमाते हैं, लेकिन वो समाचारों को हासिल करने या इसे प्रस्तुत करने पर नाममात्र भी खर्च नहीं करते हैं।

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यह स्थिति दुनिया भर में सरकारों के तत्काल हस्तक्षेप की मांग करती है। अच्छी खबर यह है कि कुछ देशों ने इस प्रक्रिया को शुरू कर दिया है। इस प्रक्रिया को अपनाने में फ्रांस सबसे आगे है, जिसके बाद स्पेन का नाम जुड़ा और अब ऑस्ट्रेलिया ने टेक दिग्गज गूगल और सोशल-मीडिया मोगुल फेसबुक को आदेश दिया है कि वह मीडिया हाउसों से उन समाचार सामग्री का भुगतान करे, जिनका राजस्व कोरोनो वायरस-प्रेरित लॉकडाउन ने निगल लिया है।

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गौरतलब है गूगल और फेसबुक पारंपरिक मीडिया की समाचार सामग्री को भौगोलिक पहुंच से दूर प्रसारित करने वालों में प्रमुख नाम हैं। उन्होंने वर्षों के रणनीतिककरण के माध्यम से डिजिटल व्यापार पर अपना वर्चस्व स्थापित किया और इन प्लेटफार्मों पर खोज परिणामों में शीर्ष स्थान के लिए समाचार संगठनों को एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए तैयार किया।

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सवाल यह है कि अभी तक भारत में ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है, लेकिन भारत इस असंतुलन के लिए मूक दर्शक नहीं बन सकता है, क्योंकि भारत के समाचार संगठन भी राजस्व दबाव में हैं। चूंकि लोकतंत्र में समाचार मीडिया एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिसे चौथा स्तंभ कहा जाता है।

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क्योंकि लोकतंत्र के चौथे खंभे में आई दरार सीधे लोकतंत्र पर सेंध है। इसलिए यह जरूरी है कि भारत सरकार अब इंटरनेट दिग्गजों के साथ पारंपरिक मीडिया संगठनों के राजस्व असंतुलन को दूर करने के लिए उन कंपनियों के साथ एक लाभ शेयरिंग प्रणाणी में प्रवेश करें, जो समाचार संकलन में अपने धन और संसाधनों का निवेश करती हैं।

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English summary
The question is that no such step has been taken in India yet, but India cannot become a silent spectator to this imbalance, as India's news organizations are also under revenue pressure. Since the news media plays an important role in democracy, which is called the fourth column,Because the crack in the fourth pillar of democracy is a direct dent on democracy.
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