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नज़रिया: दलित स्वाभिमान का प्रतीक क्यों है भीमा कोरेगांव?

महारों ने पेशवाओं के ख़िलाफ़ लड़ाई 1818 में की थी. अंग्रेज़ो की महार रेजीमेंट ने इस लड़ाई जमकर बहादुरी दिखाई थी. भीमा-कोरेगांव में जो विजय स्तंभ है उस पर इस रेजीमेंट के लोगों के नाम हैं.

बाबा साहेब आंबेडकर जब 1927 में वहां गए तो ये सारी चीज़ें वहां देखीं. आंबेडकर सामाजिक परिवर्तन चाहने वाले नेता थे. उन्होंने देखा कि 1818 के बाद का जो इतिहास है उसमें दलितों के लिए भीमा-कोरेगांव एक प्रतीक बन सकता है. उन्होंने इस लड़ाई को प्रतीक बनाया.

हम इसे इस रूप में भी समझ सकते हैं कि बाबा साहेब आंबेडकर के साथ जिन्होंने बौद्ध धर्म को स्वीकार किया वो महार ही थे. महार रेजीमेंट के पहले इस समाज को कभी जीत का अहसास तक नहीं था. बाबा साहेब इनके मन में स्वाभिमान और अस्मिता पैदा करना चाहते थे. इसलिए उन्होंने इस लड़ाई और जीत को एक प्रतीक बनाया.

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दलित
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ऐतिहासिक प्रतीक

ज़ाहिर है इसे एक सकारात्मक प्रतीक के रूप में देखना चाहिए. महार समाज बिल्कुल ग़रीब है. उसे आज भी न्याय नहीं मिल रहा. पेशवा के निरंकुश राज को भला कोई कैसे भूल सकता है. उस राज में दलित अछूत थे.

इस अछूत समाज में अगर चेतना पैदा करनी है, अस्मिता पैदा करनी है तो कोई भी अच्छा नेता स्वाभिमान जगाने के लिए एक प्रतीक खड़ा करेगा. यह प्रतीक इतिहास में होगा, ऐतिहासिक होगा. आंबेडकर ने उसी प्रतीक को खड़ा कर चेतना को झकझोड़ा. ये महज़ लड़ाई की बात नहीं है. इस लड़ाई के बाद विश्व युद्ध हुआ था.

पहले विश्व युद्ध के बाद ब्रिटिश आर्मी में महारों की भर्ती बंद कर दी गई थी. बाबा साहेब आंबेडकर के पिता रामजी आंबेडकर आर्मी में थे. ब्रिटिश आर्मी में महारों की भर्ती फिर से शुरू कराने के लिए लोगों ने अभियान चलाया. इस अभियान के तहत लोग ब्रिटिश अधिकारियों के पास ज्ञापन लेकर गए थे और इसमें रामजी आंबेडकर भी शामिल थे.

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आज़ादी के आंदोलन...

बाबा साहेब जानते थे कि इस लड़ाई का महत्व क्या है. इनकी मेहनत ने रंग भी लाई. दूसरे विश्व युद्ध के पहले अंग्रेज़ों ने महार रेजिमेंट को फिर से शुरू किया. महार सेना में फिर से भर्ती होने लगे. ये प्रतीक भले सामाजिक है, लेकिन इससे दलितों की रोजी-रोटी भी जुड़ी हुई है. उस वक़्त महारों का शोषण चरम पर था.

जब ये आर्मी में गए तो इन्हें सम्मान मिला. बाबा साहेब जानते थे कि जो महार भाई आर्मी में काम कर रहे हैं उनके भीतर स्वाभिमान जाग गया है. इसी स्वाभिमान का इस्तेमाल बाबा साहेब ने किया. इसमें क्यों किसी को समस्या होनी चाहिए. ये तो अच्छी बात है. आज़ादी के आंदोलन में भी गांधी जी ने ऐसे प्रतीकों का इस्तेमाल किया था.

ऐसा ही बाबा साहेब आंबेडकर ने किया. साल 1927 से लेकर आज तक भीमा-कोरेगांव में कोई समस्या नहीं हुई थी. 1990 से लेकर आज तक 27 साल हो गए और भीमा-कोरेगांव में हज़ारों आंबेडकरवादी और दलित जाते हैं. भीमा-कोरेगांव एक तरह से तीर्थस्थल बन गया है. अभी तक वहां सब कुछ शांति से हो रहा था.

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विवाद क्यों हुआ?

बरसी पर वहां दुकाने खुल जाती हैं. लोग अच्छा कमा लेते हैं. स्थानीय लोग भी ख़ुश रहते हैं. आख़िर इस साल ही विवाद क्यों हुआ? इसी साल 200 साल पूरे होने वाले थे. इस बार प्रकाश आंबेडकर के नेतृत्व में विशाल मार्च निकाल गया था. इस मार्च का समापन शनिवार वाड़ा पर होने वाला था.

इसमें विवादित मुद्दा यही है कि शनिवारावाड़ा पेशवा का वाड़ा है. शनिवार वाड़ा ब्राह्मणों के राज का एक प्रतीक है. वहां दलितों के जुटने पर आपत्ति थी. इसी आपत्ति को हवा देकर दंगा भड़काया गया. 1927 में जो आंबेडकर ने शुरू किया उसके बाद से आज भी दलितों के लिए यह जीत बहुत मायने रखती है.

साल 1927 में भीमा-कोरेगांव जाने के बाद बाबा साहेब ने पानी के लिए आंदोलन किया था. उसके बाद उन्होंने मंदिर में प्रवेश का आंदोलन शुरू किया था. आज भी दलित स्वाभिमान की बात की जाती है तो इतिहास में 1818 को की तरफ़ देखा जाता है. इसलिए इसे भूलने का सवाल ही पैदा नहीं होता है. आर्मी में जो दलित हैं वो भी वहां जाते हैं.

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भीमा-कोरेगांव में दलित

महार से जो बौद्ध बने हैं वो भी भीमा-कोरेगांव जाते हैं. कम से कम एक से डेढ़ लाख लोग वहां हर साल जमा होते हैं. सवाल यह है कि हमारे इतिहास में दलितों के लिए क्या कोई जगह नहीं है? सारा इतिहास क्या सवर्ण ही लिखेंगे? बाबा साहेब के जाने के बाद भी यह यात्रा बंद नहीं हुई थी.

2014 के आम चुनाव में बहुत सारे दलितों ने मोदी को वोट किया था. भीमा-कोरेगांव में दलितों से जुड़ा इतना बड़ा प्रतीक है वहां मोदी क्यों नहीं गए? मुख्यमंत्री फडणवीस वहां क्यों नहीं गए? अगर समाज दलित स्वाभिमान को स्वीकार करता तो वहां हमले नहीं होते. लोग इसमें पहचान की राजनीति की बात कह रहे हैं.

लेकिन यह भी सच है कि पहचान की राजनीति हमेशा ग़लत नहीं होती है. अगर आप सकारात्मक प्रतीक के साथ पहचान की राजनीति करते हैं तो उसका फ़ायदा ही मिलता है. पिछले 50-60 सालों में दलितों में आरक्षण के ज़रिए एक किस्म की चेतना आई है. इनके बीच एक मध्य वर्ग तैयार हुआ है. इनके पास पैसे आए हैं.

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संविधान बदलने की बात

पर दलित सांस्कृतिक पहचान की उपेक्षा क्यों करेंगे? वो संस्कृति और इतिहास में भी अपने हिस्से की तलाश कर रहे हैं. यह बिल्कुल ही सकारात्मक अस्मिता की राजनीति है. इतने दशकों बाद भी दलितों को अपना हक़ नहीं मिला है.

डॉक्टर राममनोहर लोहिया कहते थे कि अगर दलितों को उनका हक़ देना है तो सवर्णों को मानना होगा कि उन्होंने अन्याय किया है.

आज लोग सड़क पर क्यों हैं? इसलिए हैं कि आरक्षण रद्द करने की बात कही जा रही है. संविधान बदलने की बात कही जा रही है. इसका संदेश क्या जाता है? इसे भारतीय जनता पार्टी ने भी हवा दी है. इन्हीं सारे विवादों के दौरान बीजेपी सांसद ने संविधान बदलने की बात कही थी. आरएसएस वाले कभी-कभी आरक्षण बंद करने की बात करते हैं.

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पार्टी की राजनीति

इन आंदोलनों की पृष्ठभूमि में ऐसे बयानों की भी भूमिका है. महाराष्ट्र में बौद्ध नौ फ़ीसदी हैं. ब्राह्मणों के बाद सबसे ज़्यादा पढ़ा-लिखा समुदाय बौद्धों का है. ये बौद्ध पहले महार ही थे. इन महारों ने आंबेडकर के साथ ही अपना धर्म बदला था. पढ़े-लिखे होने के बावजूद इन्हें जो सम्मान मिलना चाहिए था वो मिला नहीं.

इस धर्मांतरण से दलितों के बीच बड़ा बदलाव आया है. इस आंदोलन से बीजेपी और शिव सेना में डर है. पहले महाराष्ट्र में दलितों की रिपब्लिकन पार्टी थी. रिपब्लिकन पार्टी में विभाजन हुआ और अठावले ने अलग पार्टी बना ली. दलितों को साथ लिए बिना किसी भी पार्टी की राजनीति आगे नहीं जा सकती है. इस बात को हर पार्टी जानती है.

महाराष्ट्र की हर पार्टी में दलित हैं. दलितों में बौद्ध नौ फ़ीसदी हैं और ग़ैरबौद्ध भी बड़ी संख्या में हैं. महाराष्ट्र में दलित कम से कम 15 से 16 फ़ीसदी हैं. अगर दलित भड़कते हैं तो शिव सेना और बीजेपी के लिए इनसे वोट लेना आसान नहीं होगा. 2014 के आम चुनाव में दलितों ने कांग्रेस और एनसीपी के ख़िलाफ़ वोटिंग की थी.

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महाराष्ट्र में ध्रुवीकरण

बीजेपी में एक समूह ऐसा भी है जो चाहता था कि भिमा-कोरेगांव जाना चाहिए. कुछ अतिवादियों से इस हमले को कराया गया है. इसमें मराठा युवकों को भड़काया गया. ध्रुवीकरण की कोशिश की गई. अगर ये मराठा बनाम दलित हो जाता तो पूरे महाराष्ट्र में ध्रुवीकरण होता. ज़ाहिर है इसका फ़ायदा बीजेपी को मिलता.

पिछले तीन सालों में महाराष्ट्र सरकार ने कुछ काम नहीं किया है. ऐसे में बीजेपी के लिए इस तरह का ध्रुवीकरण उसके हक़ में होगा. किसान भड़के हुए हैं. मराठा आरक्षण मांग रहे हैं. ये बिल्कुल सोची-समझी राजनीति है. महाराष्ट्र में पेशवा घराने का कोई मतलब नहीं है. पेशवा राज में जो दूसरा बाजीराव था वो बहुत ही निरंकुश शासक था.

जब वो ब्रिटिश राज में हारा तो महाराष्ट्र छोड़कर कर्नाटक भाग गया था. महाराष्ट्र में पेशवा को लेकर कोई प्रतिष्ठा जैसी बात नहीं है. महाराष्ट्र में पेशवाई आ गई मतलब अत्याचार आ गया है माना जाता है. पेशवाई का मतलब अत्याचार से है.

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