नज़रिया: 'सरकार को नीचा दिखाता है भागवत का बयान'
हाल ही में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत का सेना को लेकर दिया गया एक बयान विवादों में घिर गया था.
उन्होंने बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर में एक भाषण में कहा था कि 'आरएसएस में सेना जैसा अनुशासन है. ज़रूरत पड़ने पर जहां सेना तैयार करने में छह-सात महीने लग जाएंगे वहीं स्वयंसेवक तीन दिन में तैयार हो जाएंगे. ये हमारी क्षमता है.'
इस बयान के बाद हंगामा खड़ा हो गया था और विपक्ष ने इसे हर भारतीय का अपमान कहा था. इस पर भागवत ने सफाई दी थी कि उनके बयान को ग़लत तरीके से पेश किया गया है.
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मोहन भागवत के बयान पर लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) एचएस पनाग से बीबीसी पंजाबी के संपादक अतुल संगर ने बात की. एचएस पनाग का नज़रिया हम यहां दे रहे हैं.
लोकतंत्र में कितनी ज़रूरी ऐसी सेना?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक बेहद अनुशासित संगठन है. संघ की शाखाओं का आयोजन भी सैनिक तौर-तरीकों से ही किया जाता है. मुझे पूरा यकीन है कि अगर सरकार कभी उन्हें इजाज़त देती है तो वो फ़ौज तो नहीं, लेकिन छोटा-मोटा मिलिशिया आसानी से तैयार कर सकते हैं.
लेकिन, भारत जैसे संवैधानिक लोकतंत्र में केवल सरकार के पास ही ताक़त और हिंसा के इस्तेमाल का अधिकार होता है. सरकार को ये हक़ नागरिकों की आंतरिक और बाहरी ख़तरों से रक्षा के लिए है. किसी भी वजह से किसी और को इसकी ज़रूरत नहीं है.
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मोहन भागवत की आलोचना सेना के अपमान को लेकर हो रही है, लेकिन असल में ये बयान सरकार को नीचा दिखाने वाला है क्योंकि सरकार के पास अपनी बहुत बड़ी सेना है और उसके इस्तेमाल की इजाज़त सिर्फ़ सरकार को है. ऐसे में मोहन भागवत का कहना है कि वो कुछ दिनों में एक सेना बना सकते हैं, ये बयान सरकार के ख़िलाफ़ है.
मोहन भागवत की सफ़ाई
मुझे मोहन भागवत द्वारा सेना का सम्मान करने को लेकर कोई संदेह नहीं है, लेकिन इस बयान से क्या वो ये कहना चाहते हैं कि देश और उसकी सेना रक्षा के लिए नाकाफ़ी है? क्या देश की रक्षा के लिए कोई अतिरिक्त सेना खड़ी करने की ज़रूरत है?
भारत में सभी राजनीतिक दल रैली करते हैं, विरोध प्रदर्शन करते हैं, लेकिन कभी किसी दल ने अपनी मिलिशिया बनाने की बात नहीं की. अपनी सेना बनाना फ़ासीवादी प्रवृति है और फ़ासीवादी अनुभव कहते हैं कि हमेशा मिलिशया या अर्धसैनिक बल बनाने का शुरुआती कारण देश की रक्षा बताया गया है.
इतिहास दिखाता है कि इसका अंत लोगों को धमकाने और संपूर्ण ताकत हासिल करने के तौर पर हुआ है. हालांकि, मैं इसे मोहन भागवत के बयान से नहीं जोड़ रहा हूं, लेकिन इतिहास में ऐसा देखा गया है. ये एक ऐसी प्रवृत्ति है जो लोकतंत्र में ठीक नहीं है.
मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को फ़ासीवादी संगठन नहीं मानता. इसे अनुशासित संगठन मानता हूं. मैं सिर्फ़ उस बयान के बारे में कह रहा हूं जिसमें सेना खड़ी करने की बात कही गई है.
फ़ोर्स से भागवत का मतलब क्या?
अगर मोहन भागवत आज एक सेना बनाएंगे तो आगे चलकर दूसरे संगठन भी सेना बना सकते हैं. क्या हमें राजनीतिक दलों से सेना मिलेगी? हालांकि, आरएसएस के राजनीतिक दल होने के दावे नहीं किए जाते हैं, लेकिन उसकी छत्रछाया में बीजेपी उसकी राजनीतिक इकाई है. इस तरह आरएसएस का राजनीति से संबंध है.
मोहन भागवत ने देश की रक्षा के लिए फ़ोर्स की बात कही थी. क्या वो समानांतर सेना की बात कर रहे थे या परदे के पीछे से काम करने वाली किसी ताक़त की बात कर रहे थे? देश की रक्षा और किससे हो सकती है?
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