Assembly Elections: हिंदू-बहुल क्षेत्रों में क्यों बढ़ी कांग्रेस की मुश्किल? महाराष्ट्र से झारखंड तक संघर्ष
Assembly Elections News: नवंबर में महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा हो रहे हैं। कई राज्यों में 48 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव भी करवाए जा रहे हैं। कई सीटों पर लोकसभा के भी उपचुनाव हैं। इन चुनावों में एक बात खास है। दशकों तक देश की सत्ता पर काबिज रही कांग्रेस पार्टी दोतरफा संघर्ष कर रही है। एक तरफ उसे अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी बीजेपी से भिड़ना पड़ रहा है, दूसरी तरफ उसे अपने इंडिया ब्लॉक गठबंधन के सगयोगियों से भी दबाव का सामना करना पड़ रहा है।
लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को पिछले तीन चुनावों में सबसे ज्यादा 99 सीटें मिलीं तो लगा कि कांग्रेस ने खुद को एक बार फिर से भाजपा-विरोधी विपक्ष की ड्राइविंग सीट पर स्थापित कर लिया है। लेकिन, हरियाणा और जम्मू कश्मीर के जम्मू क्षेत्र में विधानसभा चुनावों में भाजपा से उसकी करारी हार ने तस्वीर ही पलट दी। इससे एक बार फिर यह संदेश निकला है कि जहां कांग्रेस को बीजेपी से अकेले चुनौती का सामना करना है, वहां वह काफी कमजोर पड़ चुकी है। इस वजह से उसके सहयोगी भी अपना उल्लू-सीधा करने लगे हैं।

महाराष्ट्र में सहयोगियों के दबाव में रही कांग्रेस
अभी महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनाव के लिए सीटों के बंटवारे में कांग्रेस अपनी सहयोगियों के साथ काफी दबाव में नजर आई। महाराष्ट्र में विशेष रूप से शिवसेना (यूबीटी) ने उसपर दबाव कायम करने में बड़ी सफलता पा ली।
एक समय जहां कांग्रेस राज्य में 115-120 सीटों पर लड़ने का मंसूबा पाले थी। खुद को बड़ा भाई साबित करने में लगी हुई थी। लेकिन, उसे उससे पीछे हटना पड़ा है। कई सीटों पर तो स्थिति ऐसी बन गई है कि उसके सामने दोस्ताना मुकाबले के अलावा कोई गुंजाइश नहीं रही। प्रदेश कांग्रेस के नेताओं का तो यह हाल हो गया कि वह शिवसेना (यूबीटी) के नेताओं के हमले का जवाब देने की स्थिति लायक भी नहीं दिखे।
झारखंड में भी गठबंधन में घटी दी गई कांग्रेस की ताकत
झारखंड में जेएमएम की अगुवाई वाली हेमंत सोरेन सरकार पांच साल की एंटी-इंकंबेंसी का सामना कर रही है। उनके गठबंधन के खिलाफ एनडीए ने अपनी ताकत काफी मजबूत की है। लेकिन, फिर भी जो कांग्रेस वहां 2019 में 81 में से 31 सीटों पर लड़ी थी, इस बार जेएमएम ने उसे सिर्फ 29 सीटें ही दी हैं।
जबकि, कांग्रेस में जेवीएम के दो विधायक भी शामिल हुए थे, इस हिसाब से उसका दावा 33 सीटों का हो गया था। नामांकन के आखिर दिन तक दो सीटों पर एक और सहयोगी आरजेडी के साथ भी दोस्ताना मुकाबले के हालात पैदा कर दिए गए।
उपचुनावों में भी सहयोगी पड़े कांग्रेस पर भारी
यूपी में तो 9 सीटों पर उपचुनावों में समाजवादी पार्टी ने पूरी तरह से कांग्रेस को किनारे ही कर दिया। पड़ोस के मध्य प्रदेश में कांग्रेस और बीजेपी में सीधा मुकाबला है। लेकिन, फिर भी सपा ने बुधनी उपचुनाव में अपना प्रत्याशी उतारकर कांग्रेस को यही संदेश दिया कि वह मन ही मन भले ही खुद को बड़ा भाई समझे, लेकिन जमीनी हालात बदल चुकी।
यही नहीं आखिर समय तक अखिलेश यादव की पार्टी महाराष्ट्र में महा विकास अघाड़ी से जिन सीटों पर दावा करती रही, वह भी कांग्रेस का गढ़ रही सीटें ही हैं।
असम और बंगाल में भी कांग्रेस पार्टी की राजनीति को लगा झटका
असम में कांग्रेस ने 5 सीटों पर उपचुनाव में बीजेपी के साथ सीधे मुकाबले में उतरने का फैसला किया। लेकिन, इसकी वजह से पिछले हफ्ते ही बना 16 दलों का गठबंधन वहां बिखर गया। असम जातीय परिषद के लुरिनज्योति गोगोई ने इसकी वजह से कांग्रेस के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया है। कांग्रेस की अगुवाई वाला यह गठबंधन 2026 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर बनाया गया था।
इसी तरह से पश्चिम बंगाल में हो रहे 6 सीटों पर विधानसभा चुनाव में भी इंडिया ब्लॉक एक बार फिर टूट गया है। ममता बनर्जी की टीएमसी पहले से अलग थी, अब कांग्रेस और सीपीएम की दोस्ती भी टूट चुकी है। मतलब, यहां बीजेपी के खिलाफ इंडिया ब्लॉक की तीन-तीन पार्टियां और गठबंधन लड़ रहे हैं, लेकिन उन तीनों के बीच आपस में कोई तालमेल नहीं है और कांग्रेस अलग-थलग पड़ चुकी है।
पंजाब में इंडिया ब्लॉक की सहयोगी ही कांग्रेस से लड़ रही है
कांग्रेस और इंडिया ब्लॉक की अन्य सहयोगियों की सहायता के नाम पर आम आदमी पार्टी ने महाराष्ट्र चुनाव से हटने का फैसला किया है। लेकिन, पंजाब में हो रहे चार विधानसभा सीटों पर उपचुनाव में उसका कांग्रेस पार्टी के साथ ही सीधा मुकाबला हो रहा है। अकाली दल ने पहले ही मैदान छोड़ दिया है और बीजेपी आज भी वहां बड़ी राजनीतिक शक्ति नहीं बन पाई है।
अल्पसंख्यक-बहुल वायनाड सीट पर अपने दम पर कांग्रेस मैदान में
सिर्फ केरल में हो रहे वायनाड लोकसभा चुनाव में ही कांग्रेस अपने दम पर मजबूत स्थिति में नजर आ रही है। 2011 की जनगणना के अनुसार यहां हिंदुओं की आबादी 49.48% ही है। अल्पसंख्यकों की जनसंख्या हिंदुओं के मुकाबले यहां ज्यादा है। आम चुनावों में भी यहां कांग्रेस ने अपने दम पर बड़ी जीत हासिल की थी। लेकिन अपने भाई राहुल गांधी की संसद सदस्यता से इस्तीफे के बाद प्रियंका गांधी वाड्रा यहां से अपना पहला चुनाव लड़ रही हैं।












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