Jharkhand Chunav 2024: NDA या INDIA ब्लॉक में किसकी बनेगी सरकार? ये 5 फैक्टर तय करेंगे परिणाम
Jharkhand Election 2024: झारखंड विधानसभा के पहले चरण के मतदान के लिए अब मुश्किल से दो हफ्तों का समय रह गया है। सत्ताधारी जेएमएम की अगुवाई वाला इंडिया ब्लॉक और बीजेपी की अगुवाई वाला एनडीए दोनों इस चुनाव को जीतने के लिए अपनी ओर से कोई कोशिश बाकी नहीं रख रहे हैं। हरियाणा में जीत से बीजेपी का मनोबल ऊंचा है, तो जेएमएम हर स्थिति में सत्ता में वापसी के लिए जी-जान लगा रहा है।
इस बार का झारखंड विधानसभा चुनाव पूरी तरह से सीधे मुकाबले वाला है। वोटों का विभाजन न हो, इसलिए बीजेपी ने राज्य में बिना जनाधार वाली अपनी सहयोगियों को भी सीटें दे दी हैं। वहीं जेएमएम गठबंधन में भी सीपीआई-एमएल शामिल हुई है, जिससे उसकी ताकत भी बढ़ी है। अगर हम झारखंड में मौजूदा चुनावी माहौल पर नजर दौड़ाएं तो कुल मिलाकर 5 फैक्टर दिख रहे हैं, जो इस बार का चुनाव परिणाम तय करने जा रहे हैं:

आदिवासी फैक्टर
झारखंड की 81 विधानसभा सीटों में 28 सीटें अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए आरक्षित हैं। राज्य में आदिवासियों की जनसंख्या 26.21% है और यह प्रदेश का सबसे प्रभावशाली मतदाता समूह है। अगर पिछले चुनावों के अंकगणित को देखें तो आदिवासी फैक्टर में बीजेपी काफी कमजोर दिखती है।
2019 के विधानसभा चुनाव में 28 आरक्षित सीटों में से पार्टी सिर्फ 2 सीटें जीती थी। जबकि, महागठबंधन में जेएमएम को 19 और कांग्रेस को 6 सीटें मिली थीं। एक सीट बाबूलाल मरांडी की झारखंड विकास मोर्चा के खाते में गई थी। इस साल हुए लोकसभा चुनावों में भी झारखंड की 14 सीटों में से एसटी के लिए रिजर्व पांचों सीटें इंडिया ब्लॉक के खाते में गई थी।
बीजेपी ने आदिवासी मतदाताओं के बीच अपनी पैठ बढ़ाने के लिए लगातार कोशिशें की हैं। केंद्र सरकार की ओर से कई योजनाएं चलाई गई हैं, आदिवासी महापुरुषों के सम्मान में बहुत बड़े-बड़े पहल किए गए हैं। बाबूलाल मरांडी को उनकी पार्टी सहित दल में शामिल कर लिया गया है और इस समय राज्य में भाजपा के सबसे बड़े चेहरे हैं।
लेकिन, सबसे महत्वपूर्ण प्रयास पार्टी ने यह किया है कि पूर्व सीएम और जेएमएम के दिग्गज नेता चंपाई सोरेन के हाथों में कमल थमा दिया है। चंपाई कोल्हान क्षेत्र के धाकड़ आदिवासी नेता हैं, जो कोल्हान टाइगर के नाम से मशहूर हैं।
इनके अलावा पार्टी जेएमएम संस्थापक शिबू सोरेन की बड़ी बहू सीता सोरेन को भी भाजपा में शामिल कर चुकी है। एक और पूर्व सीएम मधु कोड़ा की पत्नी भी भाजपा के साथ हैं और ये सभी चुनाव भी लड़ रहे हैं। पूर्व सीएम बाबू लाल मरांडी भी चुनाव मैदान में हैं और पूर्व सीएम और पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा की पत्नी मीरा मुंडा को भी टिकट दिया गया है।
वहीं जेएमएम को आज भी अपने सबसे बड़े आदिवासी चेहरे और पार्टी के सुप्रीम लीडर शिबू सोरेन के करिश्माई नेतृत्व पर भरोसा है। पार्टी ने भाजपा में टिकट से वंचित रहे आदिवासी नेताओं को भी टिकट देकर उनके वोट में सेंधमारी का दांव चला है।
गठबंधन फैक्टर
2019 के झारखंड विधानसभा में भाजपा का ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (AJSU) के साथ गठबंधन नहीं हो पाया था। दोनों ने एक-दूसरे के खिलाफ उम्मीदवार उतार दिए थे। इसके चलते इन्हें 6 सीटों का नुकसान हो गया था। बीजेपी 4 सीटें और आजसू 2 सीटें हार गई थी।
लेकिन, इस बार पार्टी ने न सिर्फ आजसू के साथ तालमेल किया है और उसके लिए 10 सीटें छोड़ी हैं, बल्कि जेडीयू को भी 2 और एलजेपी (रामविलास) को भी 1 सीट दी है। हालांकि, इन दोनों दलों का प्रदेश में अपना कोई खास जनाधार नहीं है, लेकिन बीजेपी ने एनडीए के वोटों में किसी भी कीमत पर विभाजन को टालने की कोशिश की है। बाकी 68 सीटों पर बीजेपी लड़ रही है।
इसी तरह जेएमएम, कांग्रेस और आरजेडी गठबंधन में इसबार सीपीआई (एमएल) के साथ भी साझेदारी हुई है। जेएमएम 42, कांग्रेस 29, आरजेडी 6 और सीपीआई (एमएल) 4 सीटों पर लड़ रही है। इस तरह से जातीय और अन्य सामाजिक समीकरणों में जो भी गठबंधन बढ़त बनाने में सफल रहेगा, नतीजे उसी की ओर झुकने की संभावना है।
स्थानीय फैक्टर
झारखंड में पांच डिविजन हैं- संथाल परगना, कोल्हान, उत्तरी छोटानागपुर, दक्षिणी छोटानागपुर और पलामू। 2019 में तीन डिविजन में महागठबंधन को लगभग एकतरफा बढ़त मिली थी। उत्तरी छोटानागपुर में सबसे ज्यादा 25 सीटें हैं। इनमें से 10 बीजेपी और 10 महागठबंधन को मिली थी, बाकी तब के 'अन्य' के खातों में गई थीं।
वहीं पलामू की 9 सीटों में भाजपा को 5 मिली थीं, महागठबंधन 3 सीटों पर जीता था और 1 सीट 'अन्य' को गई थी। जहां तक संथाल परगना और कोल्हान के आदिवासी बहुल इलाकों की बात है तो इनकी 32 सीटों में से महागठबंधन 26 जीत गया था और बीजेपी मात्र 4 ही जीत सकी थी।
इसी वजह से बीजेपी जहां संथाल परगना के प्रभावी स्थानीय मुद्दे जनसांख्यिकी बदलाव को लेकर जेएमएम को निशाना बना रही है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक की ओर से बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा सुर्खियों में ला दिया गया है। वहीं कोल्हान क्षेत्र में चंपाई सोरेन के साथ जेएमएम में हुए कथित अपमान को मुद्दा बनाया गया है।
वहीं इंडिया ब्लॉक की ओर से हेमंत सोरेन आदिवासी बेल्ट में 'आदिवासी बनाम बाहरी' वाले मुद्दे को सुलगाने के लिए 'सरना कोड' और 'खतियान' वाला दांव चलने की कोशिश कर रहे हैं। जबकि, वही जेएमएम कोल्हान और संथाल परगना से बाहर निकलते ही अपनी लोक-लुभावन योजनाओं और सरकारी नौकरियों का मुद्दे को प्राथमिकता देना शुरू कर देती है।
महिला फैक्टर
इसबार के झारखंड विधानसभा चुनाव में महिला बहुत ही प्रभावी फैक्टर बनकर उभरी हैं। पिछले लोकसभा चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि भले ही पुरुष वोटर ज्यादा हैं, लेकिन ज्यादा संख्या में महिला वोटरों ने वोट डाले हैं। वैसे भी 81 में से 32 सीटों पर महिला मतदाताओं की संख्या ज्यादा है और इनमें सभी एसटी सुरक्षित सीटें भी शामिल हैं। एक महत्वपूर्ण आंकड़ा ये है कि 18 साल से 19 साल की उम्र के फर्स्ट टाइम वोटरों में भी 56% महिलाएं हैं।
यही वजह है कि बीजेपी और जेएमएम के बीच महिला वोटरों को अपनी ओर खींचने के लिए जोरदार कोशिशें की गई हैं। जेएमएम सरकार 18 से 59 साल तक की महिलाओं के लिए 1,000 रुपए हर महीने वाली 'मैया सम्मान योजना' लेकर आई है। 60 साल से ऊपर की महिलाओं को भी हर महीने इतनी ही पेंशन दी जाती है।
इसी के जवाब में बीजेपी के घोषणापत्र में 'गोगो दीदी योजना' का वादा किया गया है, जिसमें महिलाओं को हर महीने 2,100 रुपए देने का संकल्प जताया गया है। बीजेपी के वादे के बाद जेएमएम ने भी मैया सम्मान योजना की राशि दिसंबर से 2,500 रुपए महीना कर देने की घोषणा की है। महिला वोटरों के बीच पार्टी की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए सीएम सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन पिछले कई महिनों से घूम रही हैं।
भ्रष्टाचार और एंटी-इंकंबेंसी फैक्टर
झारखंड में भी हर चुनाव में सरकार बदलने की परंपरा बन चुकी है। मौजूदा इंडिया ब्लॉक सरकार को 5 साल की एंटी-इंकंबेंसी फैक्टर का भी सामना करना पड़ रहा है। मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री तक पर भ्रष्टाचार और घोटालों के गंभीर आरोपों में घिरे हैं। इन दोनों मामले में बीजेपी को सत्ताधारी गठबंधन को घेरने का मौका मिला हुआ है।












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