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2023 में 10 राज्यों में होने हैं विधानसभा चुनाव, 7 में आदिवासी वोट बैंक रखेंगे मायने, जानें किसे मिलेगा फायदा

2023 में देश में 10 राज्यों में विधानसभा चुनाव करावाए जाने हैं। इनमें से सात राज्य वो हैं, जहां आदिवासी वोटर ही चुनाव का परिणाम तय करेंगे। जो पार्टी आदिवासी के दिलों को जीतेगी,वही सफल हो सकती है।

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2024 में लोकसभा चुनाव होने से पहले इसी साल 10 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। यह एक तरह से केंद्र की सत्ता का सेमीफाइनल की तरह होगा। बड़ी बात ये है कि 2023 में जितने भी राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे, उनमें से सात में यानि आधे से ज्यादा आदिवासियों की बहुतायत वाले राज्य हैं। मतलब, आदिवासी वोटरों का साथ अधिकतर राज्यों में सत्ता पाने में बड़ी भूमिका निभाने वाला है। जाहिर है कि जो पार्टी आदिवासियों का दिल जीतने में कामयाब रहेगी, कुर्सी की कुंजी उन्हें ही मिल सकती है।

10 में से सात राज्यों में आदिवासी वोट बैंक की भूमिका अहम

10 में से सात राज्यों में आदिवासी वोट बैंक की भूमिका अहम

2024 के लोकसभा चुनाव से पहले इस साल देश में 10 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, उनमें हिंदी हार्टलैंड कहलाने वाले राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव भी शामिल हैं। एक बात जो बहुत ही सूक्ष्मता से गौर करने वाली है, वह ये कि इन 10 राज्यों में से 7 आदिवासी बहुल अनुसूची V और VI क्षेत्र वाले राज्य हैं। कहने की बात नहीं कि इन राज्यों में आदिवासी वोट बैंक चुनावों में बहुत ही निर्णायक भूमिका निभाने वाला है। मतलब है कि कोई भी दल हो, उनके लिए आदिवासी वोट बैंक को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।

राजस्थान में बड़ी संख्या में हैं आदिवासी-बहुल सीट

राजस्थान में बड़ी संख्या में हैं आदिवासी-बहुल सीट

राजनीतिक दलों को आदिवासी वोट बैंक के मायने पता हैं। कांग्रेस ने 2022 में राजस्थान के उदयपुर में एक चिंतन शिविर आयोजित किया था। गौर करने वाली है, इस संभाग में 28 विधानसभा सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। इस शिविर के बाद पार्टी के केरल से सांसद राहुल गांधी ने आदिवासी बहुल बांसवाड़ा में एक सभा भी की थी। 2021 में राजस्थान में हुए उपचुनावों में बीजेपी दोनों आदिवासी बहुल वल्लभनगर और धरियावद की सीटें सत्ताधारी दल के हाथों हार गई थी। हालांकि, तब से लेकर देश की चुनावी राजनीति वाली नदी में काफी पानी बह चुका है। हालात, बदल चुके हैं। यानि बीजेपी और कांग्रेस दोनों को नए सिरे से इन आदिवासी बहुल सीटों के लिए अपनी रणनीति बनानी पड़ सकती है। गुजरात में कांग्रेस का भारतीय ट्राइबल पार्टी से गठबंधन नहीं हो पाने का खामियाजा भुगतना पड़ा है। राजस्थान में बीटीपी के विधायक अशोक गहलोत सरकार के साथ हैं। 2018 में इसी पार्टी की वजह से आदिवासी बहुल सीटों पर भाजपा को चुनौती मिली थी। बीटीपी ने चौरासी और सागवाड़ा सीटें भाजपा से झटक ली थीं।

मध्य प्रदेश में दोनों दलों के लिए आदिवासी वोटर अहम

मध्य प्रदेश में दोनों दलों के लिए आदिवासी वोटर अहम

यदि मध्य प्रदेश की बात करें तो यहां 2018 में कांग्रेस को जय आदिवासी युवा शक्ति (JAYS) के समर्थन का फायदा मिला था। पार्टी ने JAYS के सदस्यों को टिकट भी दिया था। लेकिन, 2023 के आखिर में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले इस संगठन की ओर से उसे चुनौतियां मिल रही हैं और उन्हें संभाल कर रखने में उसे बड़ी मशक्कत करनी पड़ सकती है। दूसरी तरफ पिछले 8-9 वर्षों से केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी सरकार ने आदिवासियों से जुड़े सेंट्रल प्रोजेक्ट पर काफी ध्यान दिया है। जैसे कि ट्राइबल म्यूजियम, इनके बच्चों के लिए स्कॉलरशिप योजनाएं और आवासीय विद्यालयों के लिए पक्की इमारतें। आदिवासियों से घुलने-मिलने पर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का भी काफी जोर रहा है।

छत्तीसगढ़ में आदिवासियों का धर्मांतरण है बड़ा मुद्दा

छत्तीसगढ़ में आदिवासियों का धर्मांतरण है बड़ा मुद्दा

छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी-बहुल राज्य में धर्मांतरण का मसला बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है। यहां ईसाई धर्म अपनाने वाले और मूल आदिवासियों के बीच का तनाव बढ़ता जा रहा है। इसका बड़ा नमूना बस्तर संभाग के नारायणपुर जिले में हाल ही में देखने को मिला है। जो लोग ईसाई बन चुके हैं, वह हमले की शिकायतें कर रहे हैं। कुल मिलाकार मौजूदा कांग्रेस की सरकार के लिए स्थिति असहज बनती जा रही है। नारायणपुर जिला प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अंग्रेजी अखबार ईटी से कहा है, 'ऐसे झगड़े इसलिए बढ़ गए हैं, क्योंकि ईसाई अपनाने वालों की संख्या बढ़ गई है। हमें आदिवासी गांवों में ईसाइयों के शवों को नहीं दफनाने देने की शिकायतें मिल रही हैं। वे बोले- 'परिवार में दो भाई हैं। एक ने धर्म बदल लिया है। दोनों जिलाधिकारी के पास शिकायत लेकर आते हैं कि माता-पिता का अंतिम संस्कार कैसे करें....ईसाइयों की तरह या परंपरागत आदिवासी रीति-रिवाज से.... ' । यह मुद्दा पूरे राज्य में पहुंच रहा है। ऐसी स्थिति में राजनीतिक दलों को आसानी से ध्रुवीकरण का हथियार मिल सकता है और अगले चुनावों में उसका इस्तेमाल किया जा सकता है।

गुजरात का रिजल्ट कांग्रेस को परेशान कर सकता है

गुजरात का रिजल्ट कांग्रेस को परेशान कर सकता है

देश में पहली आदिवासी महिला द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनवाकर भारतीय जनता पार्टी ने पिछले साल जुलाई में इस समाज में अपनी पकड़ और मजबूत करने की कोशिश की है। खासकर गुजरात विधानसभा चुनाव में इसका काफी प्रभाव भी माना जा रहा है। राज्य की आदिवासी बहुल सीटों पर पार्टी ने एक तरह से क्लीन स्वीप कर लिया है। क्योंकि, परंपरागत तौर पर इस क्षेत्र के आदिवासी कांग्रेस के वोट बैंक कहलाते थे। कांग्रेस ने वन अधिकार अधनियम और पंचायत अधिनियम (एक्सटेंशन टू द शेड्यूल एरियाज-PESA) के माध्यम से आदिवासी वोट बैंक में अपनी एक जगह बनाई हुई थी। लेकिन, इस बार गुजरात में अनुसूचित जनजाति के लिए रिजर्व 27 में से 24 सीटें जीतकर भाजपा ने कांग्रेस का कोर वोट बैंक हथिया लिया है। वैसे कुछ जानकारों का कहना है कि बीजेपी को यह कामयाबी भाजपा-विरोधी आदिवासी वोटों के कांग्रेस, भारतीय ट्राइबल पार्टी और आम आदमी पार्टी के बीच बंटने की वजह से हुई है। यानि गुजरात का चुनाव परिणाम जहां, राजस्थान, मध्य प्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ तक में बीजेपी का मनोबल बढ़ाने वाला है, वहीं कांग्रेस के माथे पर चिंता की लकीर खींचने वाला लग रहा है।

आदिवासी बनाम वनवासी का दांव हो चुका है फेल

आदिवासी बनाम वनवासी का दांव हो चुका है फेल

कांग्रेस के लिए आधिवासी बेल्ट में अपनी रणनीति को और ज्यादा कसने की आवश्यकता इसलिए पड़ सकती है, क्योंकि पार्टी नेता राहुल गांधी ने गुजरात में वनवासी बनाम आदिवासी के नाम पर एक नया नरेटिव सेट करने की कोशिश की थी। उन्होंने भाजपा और संघ की ओर से अनुसूचित जनजातियों के लिए वनवासी जैसे शब्दों के इस्तेमाल को मुद्दा बनाने भरसक प्रयास किया था। लेकिन, गुजरात में कांग्रेस का दांव बिल्कुल उलटा पड़ चुका है। (तस्वीरें-प्रतीकात्मक )


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