Assembly elections results 2018: क्या राहुल गांधी ने अध्यक्ष बनने के बाद पहली चुनौती पार कर ली है?
नई दिल्ली। साल 2004 में नेहरू गांधी परिवार से ताल्लुख रखने वाला एक लड़का घर से विरासत में मिली राजनीति को संभलाने के लिए चुनावी रण में पदार्पण किया। इससे पहले सिर्फ अखबारों की सुर्खियां इस बात की तस्दीक करती थी कि नेहरू-गांधी परिवार से यह लड़का राजनीति में प्रवेश तो करेगा लेकिन कब करेगा इस बात की पुख्ता जानकारी नहीं होती।यह लड़का कोई और नहीं राजीव गांधी और सोनिया गांधी के बेटे राहुल गांधी जिसने 2018 विधानसभा में कांग्रेस के दोबारा उदय के शुरुआत की पटकथा लिखी है।

साल 1981 से 1983 तक सुरक्षा कारणों से राहुल की पढ़ाई सुरक्षा कारणों के चलते घर में ही कराई गई। 1994 में राहुल ने फ्लोरिडा के हावर्ड विश्वविद्यालय से कला स्नातक की परीक्षा दी।और साल 1995 में राहुल गांधी ने ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से दर्शन शास्त्र में एमफिल किया।2003 में भारतीय मीडिया में इस बात की सुगबुगाहट होनी शुरू हो गई थी कि राहुल गांधी राजनीति में आएंगे। आगे जो कुछ भी हुआ वो इतिहास है फिर कभी लेकिन
फिलहाल जानिए राहुल गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष पद संभाले एक साल हो गया है और आज के दिन ही कांग्रेस को तीन राज्यों में जीत भी मिलने ही वाली है। ऐसे परखने वाली बात यह है कि क्या राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर पहली चुनौती पार कर ली है?

अध्यक्ष पद संभालने के बाद पहली सफलता:
साल 2017 में 11 दिसंबर को राहुल गांधी ने कांग्रेस का अध्यक्ष पद संभाला था। इसके बाद कांग्रेस को कर्नाटक में हार की सामना करना पड़ा लेकिन जोड़-तोड़ के बाद कांग्रेस ने सरकार बनाई। राजनीति में जब किसी पार्टी का केंद्र किसी एक शख्स के इर्द गिर्द घूमता है तो पार्टी की असफलता के दौरान उस शख्स पर सबसे ज्यादा ठीकरा फोड़ते हैं। राहुल गांधी को भी कांग्रेस की हार के चलते कई बार लोगों के निशाने पर रहना पड़ा। हार के लिए राहुल दोषी ठहराए जा सकते हैं तो जीत के लिए भी राहुल को क्रेडिट मिलना चाहिए। पांच राज्यों के चुनाव के रुझान में कांग्रेस सरकार तीन राज्यों में सरकार बनाने के स्थिति में है राहुल के लिए यह बड़ी सफलता है।

मुद्दों पर ध्यान:
कुर्ते के आस्तीन को ऊपर चढ़ाकर रुक-रुक कर बोलने वाले राहुल गांधी के राजनीतिक सफर की अच्छी बात यह रही की वह अपनी गलतियों को सुधारते गए।मसलन उन्होंने अपनी कमियों पर यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफॉर्निया, बर्कले के छात्रों से खुद कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनसे बेहतर वक्ता हैं। राहुल की सीख और पार्टी के प्रति यह स्वीकारना की कांग्रेस अपन अंहकार के वजह से पतन की ओर है। जिसके बाद लोगों को लगा कि राहुल गांधी में बड़ा बदलाव आया है और लोग राहुल से जुड़ने लगे।

मीडिया और मोदी दोनों सीरियस:
राहुल गांधी को पप्पु, राजकुमार जैसे नाम से मजाक बनाने के दिन अब शायद बदल जाएंगे। राहुल ने कई जगह अपनी कमजोर हिंदी के चलते पार्टी की मिट्टी पलीद कराई है लेकिन अब मीडिया और भाजपा दोनों राहुल गांधी को संजीदगी से लेंगे। राहुल गांधी इस सफलता के बाद पार्टी में बड़े नेता के तौर पर उभरेंगे औ उनकी साख और बढ़ेगी। इसका कारण भी है, हाल के दिनों में राहुल गांधी ने किसानों के मुद्दों को बखूबी उठाया और सही समय पर दौरे और प्रचार किया। राफेल और कई अन्य मुद्दे पर बीजेपी को लगातार घेरते रहे। राहुल को मजाक समझने वाली बीजेपी को यह सबक है कि राहुल के साथ संजीदगी से बर्ताव किया जाए। रही बात मीडिया कि तो मीडिया के स्वभाव में उगते सूरज को सलाम करने की आदत है। राहुल के उदय के साथ-साथ मीडिया की भाषा भी शायद बदल जाएगी।












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