विधानसभा चुनाव: पढ़ाई को पाताल पहुंचा दिया, लेकिन खुली रहेगी पॉलिटिक्स की पाठशाला !
नई दिल्ली, 31 दिसंबर। पढ़ाई को पाताल में पहुंचा दिया लेकिन पॉलिटिक्स की पाठशाला खुली रहेगी। यह राजनीति के निष्ठुर और स्वार्थी होने की पराकाष्ठा है। बच्चों के ज्ञान का महाविनाश कर दिया। छात्रों की एक पीढ़ी पूरी तरह बर्बाद हो गयी। लेकिन नेता छटांक भर नुकसान सहने के लिए तैयार नहीं। उनको सत्ता की 'खुराक' समय पर चाहिए। अगर कोरोना के डर से स्कूल बंद हो सकते हैं तो फिर चुनाव क्यों नहीं टल सकते ?

अगर एक दो साल बाद ही चुनाव होंगे तो क्या पहाड़ टूट पड़ेगा ? जब नेता अपने फायदे के लिए राष्ट्रपति शासन लगाते रहे हैं तो जनता की हिफाजत के लिए नहीं लगाया जा सकता ? ये कैसी बात हुई कि चुनावी सभाओं की भीड़ ठीक है और स्कूल में छात्रों की मौजूदगी खतरनाक है। ये दोहरा मानदंड क्यों ?

मतलबी नेता कोर्ट की भी नहीं सुनते
अप्रैल 2021 में मद्रास हाईकोर्ट ने कोरोना की दूसरी लहर के लिए चुनाव आयोग को जिम्मेदार माना था। कोविड गाइडलाइंस की धज्जियां उड़ा कर चुनावी सभाओं में भीड़ जुटती रही थी। इसी तरह एक हफ्ता पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से उत्तर प्रदेश चुनाव (2022) को टालने की अपील की थी। कहा था, जान है तो जहान है। लेकिन हैरानी की बात ये है कि उत्तर प्रदेश कोई दल चुनाव टालने के पक्ष में नहीं है। सभी दलों ने समय पर चुनाव का समर्थन किया है। राजनीतिक दलों की इच्छा अनुरूप चुनाव आयोग ने भी तय समय पर ही चुनाव कराने के संकेत दिये हैं। यानी किसी दल ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की अपील पर गौर नहीं किया। कोरोना की तीसरी लहर दस्तक दे रही है। राज्य में संक्रमण तेजी से फैल रहा है। बुधवार को ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश को कोरोना प्रभावित राज्य घोषित किया है। यानी कोरोना गाइडलाइंस को और सख्ती से लागू किया जाएगा। 14 जनवरी तक स्कूल फिर बंद कर दिये गये हैं। लेकिन चुनाव समय पर होंगे। ये तो राजनीतिक हठधर्मिता की हद है। क्या कोरोना प्रभावित राज्य में चुनाव होने चाहिए ? नेता कोर्ट भी नहीं सुन रहे। अब तो सिर्फ ऊपर वाले का आसरा है।

छात्रों की एक पीढ़ी बर्बाद, पढ़ाई का महाविनाश
कोरोना के नाम पर पौने दो साल तक स्कूल बंद रहे। छिटपुट पढ़ाई की कोई गिनती नहीं। विश्वबैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक कम आय वाले देशों में स्कूल बंद होने से पढ़ाई में कमजोर बच्चों की तादाद बढ़ गयी। उनकी संख्या 53 फीसदी से बढ़ कर 70 फीसदी तक पहुंच गयी। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी ने मार्च 2020 से फरवरी 2021 तक स्कूल बंद होने के दौरान भारत में पढ़ाई पर एक शोध किया था। इस शोध में पाया गया था कि 80 फीसदी बच्चे गणित की मूलभूत क्षमता खो बैठे हैं। 92 फीसदी बच्चे भाषा के ज्ञान में पिछड़ गये। मार्च 2020 में जो वे जानते थे या जो कुछ भी उन्हें याद था वे फरवरी 2021 में भूल गये। कहने के लिए स्कूलों में ऑन लाइन पढ़ाई की व्यवस्था की गयी। लेकिन पढ़ाई का यह तरीका कई कारणों से प्रभावकारी नहीं रहा। इंटरनेट की सीमित पहुंच ,संसाधान की कमी, तकनीकी प्रशिक्षण का अभाव जैसे कारणों से ऑनलाइन पढ़ाई मजाक बन कर रह गयी। निजी स्कूलों में पढ़ने वाले भी कुछ बच्चे ही इसका फायदा उठा पाये। सरकारी स्कूलों की पढ़ाई का तो नाश ही हो गयी। सरकार ने अपना दामन बचाने के लिए बच्चों को अगली कक्षा में प्रमोट तो कर दिया लेकिन उनके ज्ञान के स्तर की तनिक भी परवाह नहीं की। जाहिर है क्लासरूम पढ़ाई का कोई विकल्प नहीं है। अब सवाल ये है कि जब क्लासरूम पढ़ाई से महामारी फैलने का खतरा है तो फिर चुनाव क्यों कराये जा रहे हैं ? चुनावी सभाओं में जो बेकाबू भीड़ जुटती है वह स्कूल की भीड़ से अधिक खतरनाक है।

सिर्फ छात्र ही क्यों खामियाजा भुगतें?
चुनावी सभाओं की भीड़ कोरोना फैलाती रहे और इसका खामियाजा भुगतें छात्र ? क्लासरूम पढ़ाई बंद होने से छात्रों की सृजनात्मक क्षमता पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा है। पिछले साल 10 वीं और 12वीं के छात्रों का जिस तरह से रिजल्ट निकाला वह उनकी मेधा का सही मूल्यांकन नहीं है। इसका असर उनके भविष्य की योजनाओं पर पड़ेगा। उन्होंने जो खोया है उसकी भरपायी कोई नहीं करेगा। उनके भविष्य की बर्बादी का आखिर कौन जिम्मेवार है ? ठीक है कि कोरोना एक वैश्वविक महामारी है और सुरक्षात्मक उपाय ही इसका बचाव है। तो फिर चुनाव क्यों नहीं बंद होते ? नेता सत्ता की मलाई चट करते रहें और छात्र अपना बहुमूल्य अवसर गांवाते रहें ! ये तो अंधेरगर्दी है। पांच महीने बाद उत्तर प्रदेश में फिर कोरोना पांव पसार रहा है। मंगलवार को 24 घंटे में 80 संक्रमितों की पहचान हुई। क्या ये खतरे का संकेत नहीं है ? लेकिन चुनाव के लिए व्याकुल लोगों को इसकी परवाह नहीं।












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