40 साल में पहली बार स्वतंत्रता दिवस पर असम में बंद का आह्वान नहीं करेगा ULFA-I संगठन
नई दिल्ली, अगस्त 11। पूर्वोत्तर राज्य असम में युनाइटेड लिबरेशन फ्रॉन्ट ऑफ असम-इंडिपेंडेंट एक उग्रवादी संगठन है। हर साल ये संगठन स्वतंत्रता दिवस के मौके पर असम में बंद का आह्वान करता है, लेकिन इस साल इस संगठन ने ऐसा नहीं करने का फैसला किया है। 40 साल में पहली बार ऐसा होने जा रहा है, जब उल्फा-आई ने स्वतंत्रता दिवस पर किसी तरह के बंद का आह्वान नहीं किया है। हालांकि इस संगठन ने असम में स्वतंत्रता दिवस के जश्न पर आपत्ति जताते हुए कहा कि ये राज्य कभी औपनिवेशिक भारत का हिस्सा नहीं था।

असम की संप्रभुता पर चर्चा के लिए तैयार हैं- उल्फा I
उल्फा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर यंदाबू की संधि के दूसरे लेख का हवाला दिया, जिस पर 24 फरवरी, 1826 को ईस्ट इंडिया कंपनी और बर्मा के बीच हस्ताक्षर किए गए थे। संगठन ने एक बयान में कहा है, "संधि के दूसरे आर्टिकल के अनुसार, बर्मा और ईस्ट इंडिया कंपनी ने असम की संप्रभुता को स्वीकार कर लिया था और राज्य को ब्रिटिश भारत में स्थानांतरित नहीं किया गया था।" उल्फा-I ने कहा कि वह "ऐतिहासिक तथ्यों" को सामने रखकर और संगठन के उद्देश्य के अनुरूप असम की संप्रभुता पर चर्चा के लिए तैयार हैं।
क्या है उल्फा और कैसे करता है ये काम?
आपको बता दें कि यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असोम (उल्फा) असम का एक उग्रवादी संगठन है। इस संगठन की स्थापना 1979 में हुई थी। ये संगठन सरकार से अपने स्वदेशी लोगों के लिए एक स्वतंत्र और अलग राज्य की मांग करता है। इसके लिए ये संगठन अधिकतर सशस्त्र संघर्ष का सहारा लेता है। परेश बरुआ इस संगठन के संस्थापक रहे हैं। ये संगठन ट्रेनिंग और हथियार खरीदने के लिए म्यांमार काचिन इंडिपेंडेंस आर्मी (KIA) और नेशनलिस्ट सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (NSCN) से जुड़ा, जिसके बाद उल्फा का खूनी खेल शुरू हो गया। 1990 में भारत सरकार ने इस संगठन को बैन कर दिया था।












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