'बंगाली' मुसलमानों के मूल निवासी बनने के लिए CM सरमा ने जो लगाई शर्त, उसकी पीछे की वजह?
Assam Muslim Percentage 2024: बांग्लादेश से आए बांग्ला भाषी मुसलमानों को मूल निवासी मानने के लिए असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने जो शर्तें लगाई हैं, उसकी जद में प्रदेश में रह रहे लाखों मुस्लिम आबादी आ रही है। ये वो मुसलमान हैं, जिन्हें राज्य 'मिया' कहकर बुलाया जाता है।
मुसलमानों के मूल निवासी बनने के लिए सीएम सरमा की शर्तें
असम के सीएम सरमा ने साफ कहा है कि अगर 'मिया' चाहते हैं कि उन्हें स्वदेशी निवासी के रूप में मान्यता मिले तो उन्हें, 'उन्हें दो से ज्यादा बच्चे पैदा करना बंद करना होगा और एक से ज्यादा शादी करने की परंपरा छोड़नी होगी, क्योंकि यह असमिया संस्कृति का हिस्सा नहीं है।'

मुख्यमंत्री की शर्त बहुत ही स्पष्ट है। यदि वे 'मूल निवासी बनना चाहते हैं तो वे अपने नाबालिग बेटियों की शादी नहीं कर सकते।' उन्होंने बहुत ही हैरानी जताई है कि वे मूल निवासी होने का दावा कैसे कर सकते हैं, यदि उन्होंनें सत्रों (वैष्णव मठों) की भूमि पर अतिक्रमण किया है।
मुख्यमंत्री का यह भी कहना है कि ऐसे मुसलमान अपने बच्चों को मदरसों की जगह उन्हें डॉक्टर, इंजीनियर बनाने के लिए पढ़ाएं। उनका कहना है कि ऐसे मुसलमानों को अपनी बेटियों को स्कूलों में भेजना चाहिए और पिता की संपत्तियों पर उन्हें भी अधिकार देना चाहिए।
जम्मू-कश्मीर के बाद असम में सबसे अधिक 34% से ज्यादा मुसलमान
असम के मुख्यमंत्री के मुताबिक 'मिया' और राज्य के मूल निवासियों में फर्क है। उनके मुताबिक, 'अगर वे इन प्रथाओं को छोड़ें और असमिया लोगों की संस्कृति को अपना लें तो एक ऐसा समय आएगा कि वे भी मूल निवासी बन जाएंगे।' असम में जम्मू और कश्मीर के बाद मुसलमानों की आबादी सबसे अधिक है।
'स्वदेशी असामी मुस्लिम' कौन हैं?
2011 की जनगणना के अनुसार असम की कुल जनसंख्या में मुस्लिम आबादी 34% से ज्यादा है। लेकिन, असम की मुस्लिम आबादी एक बड़ी भिन्नता है। एक वे मुसलमान हैं, जो असमिया भाषा बोलते हैं और राज्य के मूल निवासी या स्वदेशी हैं। इनका बांग्लादेश के प्रवासी होने का कोई इतिहास नहीं है, इसलिए इन्हें 'स्वदेशी असामी मुस्लिम' माना जाता है, जो असम के मूल निवासी कहलाते हैं।
असम में 'मिया' मुसलमान कौन हैं?
दूसरे वे मुसलमान हैं, जो बंगाली बोलते हैं और बांग्लादेश मूल के प्रवासी मुसलमान हैं। इन्हीं को असम में 'मिया' कहा जाता है और भाजपा सरकार की ओर से इन्हीं के लिए शर्तें रखी गई हैं। असम सरकार ने कुल पांच समूहों को 'स्वदेशी' असामी मुसलमान का दर्जा दिया है, गोरिया, मोरिया, जोलह (सिर्फ चाय बागानों में रहने वाले), देसी और सैयद (सिर्फ असामी बोलने वाले)।
आबादी में स्वदेशी मुसलमानों पर 'मिया' कहीं भारी
2021 में असम सरकार ने एक समिति बनाई थी, उसकी रिपोर्ट के मुताबिक असम में करीब 1.18 करोड़ मुसलमान हैं। इनमें से करीब 42 लाख ही स्वदेशी मुसलमान हैं। बाकी 'मिया' माने जाते हैं, जिन्हें मूल निवासी मानने के लिए सीएम सरमा ने शर्तों की बातें की हैं।
एक दशक में असम में बढ़ गए करीब 18 करोड़ मुसलमान
2011 की जनगणना में असम की कुल मुस्लिम जनसंख्या सिर्फ 1.07 करोड़ ही बताई गई थी। मतलब, एक दशक में करीब 18 करोड़ मुस्लिम आबादी बढ़ी है। असम के सीएम ने जो दो बच्चों की सीमा, बाल विवाह पर रोक और बहुविवाह प्रथा पर रोक की बात की है, उसे इसी समस्या से जोड़कर देखा जा रहा है।
आज की तारीख बांग्लादेश मूल के प्रवासी मुसलमानों की संख्या कहीं ज्यादा है, जो कि 63% के करीब है। जबकि, असामी बोलने वाले स्वदेशी मुसलमानों की जनसंख्या लगभग 37% ही है।
पिछली जगणना के अनुसार राज्य के 27 जिलों में से सिर्फ 18 में ही हिंदू बहुसंख्यक रह गए थे। असम में पिछले महीने ही वहां मुस्लिम विवाह और तलाक पंजीकरण अधिनियम रद्द किया जा चुका है।
सवाल है कि असम के सीएम ने ऐसे समय पर बांग्ला भाषी बांग्लादेशी मूल के मुसलमानों को 'स्वदेशी' मानने के लिए शर्तें क्यों लगाई हैं, जब लोकसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा हो चुकी है।
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