असम में बाढ़ से तबाही, 'घर छोड़कर नहीं भागती तो जिंदा नहीं बचती': ग्राउंड रिपोर्ट
"उस रात अगर मैं अपने बच्चों के साथ घर छोड़कर नहीं निकलती तो शायद आज हम जिंदा नहीं होते. घर में तेजी से पानी भर रहा था. पास के कुछ लोगों ने हमें बाहर निकाला. हम अपने साथ कोई सामान नहीं ला सके. सालों हो गए यहां बसे हुए लेकिन बुकलुंग नदी की उस रात जो भयानक आवाज सुनी थी वैसी कभी नहीं सुनी. अभी भी सोचती हूं तो दिमाग में नदी की आवाज गुंजने लगती है."

असम के बुकलुंग गांव की रहने वाली 35 साल की आलेहा बेगम बड़ी बेबसी के साथ ये बातें कहती हैं.
बीबीसी से बातचीत के दौरान वो लगातार पानी में डूबे अपने घर की ओर इशारा करती रहीं. पांच दिन बाद आलेहा अपने पति के साथ केले के पेड़ और बाँस से बनी नाव ( जिसे असमिया भाषा में भूर कहते है) पर चढ़कर घर को देखने आई थीं.
वह कहती हैं," बड़ी मुश्किल से घर में एक-एक सामान जोड़ा था. बाढ़ ने सब कुछ तबाह कर दिया है.अब सड़क पर रह रहे हैं.कामकाज बंद हो गया है. और पैसा भी नहीं है."
इसी गांव में आगे की तरफ रहने वाली बिनीता लस्कर अपने 13 साल के बेटे के साथ सड़क किनारे पलास्टिक के तंबू में दिन गुजार रही हैं. वो कहती हैं,"बाढ़ ने हमारा घर बर्बाद कर दिया है. पिछले छह दिनों से सड़क पर रह रहे हैं.अब तक किसी ने कोई मदद नहीं की है."
बाढ़ आने से पहले छह बच्चों की मां मोफिजा खातून का घर भी इसी बुकलुंग गांव में था लेकिन अब उस जगह पानी का दरिया है. वो कहती हैं,"पहले पति गुजर गए और अब हमारा घर भी बाढ़ में चला गया. हम आगे क्या करेंगे और कहां रहेंगे."
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एक सप्ताह से जारी है बाढ़ का कहर
जिस बुकलुंग गांव में बाढ़ आई है उसके पास से बुकलुंग नदी गुजरती है. इस गांव में रहने वाले 62 साल के सूरज अली सरकार की तरफ से राहत नहीं मिलने से नाराज हैं.
वो कहते हैं,"बाढ़ ने हमारे गांव को तबाह कर दिया है. मेरा एक मकान बाढ़ में चला गया.धान-मछली सब कुछ खत्म हो गया है.सड़क किनारे दिन गुजार रहे हैं.हमें सरकार से अभी तक कुछ नहीं मिला. 40 साल से इस गांव में रह रहे हैं लेकिन इतनी बड़ी बाढ़ कभी नहीं देखी."
असम में भारी बारिश के बाद आई विनाशकारी बाढ़ का कहर पिछले एक हफ्ते से जारी है. इस भीषण बाढ़ में अब तक 18 लोगों की मौत हो चुकी है.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस साल पहले चरण की बाढ़ में सबसे ज्यादा नुकसान नौगांव जिले के कामपुर रेवेन्यू सर्किल के तहत आने वाले गांवों को हुआ है. आलेहा बेगम का गांव बुकलुंग भी कामपुर रेवेन्यू सर्किल के तहत ही आता है.
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असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की ओर से शनिवार शाम को जारी की गई एक रिपोर्ट के अनुसार राज्य के कुल 33 जिलों में से 31 जिले बाढ़ की चपेट में है. इन जिलों में 2248 गांव बाढ़ की चपेट में आने से 6 लाख 80 हजार से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं. बाढ़ के कारण बेघर हुए लोगों के लिए 496 राहत शिविर खोले गए हैं, जिनमें करीब 75 हजार लोगों ने शरण ले रखी है.
राष्ट्रीय राजमार्ग 27 होते हुए मैं जब कठियाटोली से दाईं तरफ कामपुर जाने वाली सड़क पर आगे बढ़ा तो महज कुछ किलोमीटर बाद ही पूरा इलाका पानी में डूबा हुआ नजर आया. जहां तक नजर जा रही थी वहां चारों तरफ सिर्फ पानी ही पानी था.
मैं लोक निर्माण विभाग की जिस पक्की सड़क से ज्योति नगर नवरत्न मध्य अंग्रेजी विद्यालय पार कर आगे पहुंचा था दरअसल थोड़ी दूर बाद वो पूरी सड़क पानी में समाई हुई मिली. आगे रास्ता बंद था. कामपुर के कई गांवों का संपर्क पिछले कुछ दिनों से कटा हुआ है.
जिला प्रशासन ने बाढ़ पीड़ितों के लिए जो खाने-पीने का समान दिया है उसे गांव के लोग ही कई नावों में लादकर ले जा रहे थे.
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बाढ़ पीड़ितों के शिविरों में कई बीमार
सरकार की ओर से राहत के नाम पर भेजे गए चावल की बोरियों को नाव में लाद रहे रंजीत दास कहते है,"गांव के अंदर जाने का कोई भी रास्ता नहीं बचा है.करीब 1500 सौ लोग ऊंची जगह और पक्के पुल के ऊपर अपने बच्चों के साथ शरण लिए हुए हैं. उन सबके घर पानी में डूब गए हैं.
वह कहते हैं, ''कुछ लोग अपना सामान और जानवरों को छोड़कर आना नहीं चाहते. लेकिन जिनका इलाका पूरी तरह डूब गया है या फिर डूबने वाला है, उनको प्रशासन के लोग राहत शिविरों में ले आए है.केकुरीबारी गांव की हालत बहुत डरावनी है. तेतिलीखोवा, तेतेलीहारा और कलाईखोवा गांव भी पूरी तरह पानी में है. हारिया और नौई नदी ने इन गांवों को तबाह कर दिया है."
इलाके में सड़क के दोनों ओर पानी में डूबे खेत,कच्चे-पक्के मकान, झोपड़ियाँ और बिजली के खंभों को देखकर यह समझा जा सकता है कि बाढ़ ने किस तादाद में तबाही मचाई है. कामपुर में बाढ़ की स्थिति वैसी ही बनी हुई है, क्योंकि यहां कोपिली नदी सैकड़ों गांवों के ऊपर से बह रही है.
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तेतेलीहारा गांव की रहने वाली 23 साल पल्लवी करथा दास अपनी बूढ़ी सास और डेढ़ साल के बच्चे के साथ पिछले छह दिन से ज्योति नगर नवरत्न मध्य अंग्रेजी विद्यालय में खोले गए राहत शिविर में रह रही हैं. बाढ़ वाले दिन को याद कर पल्लवी आज भी डर जाती हैं.
वो कहती हैं,"उस दिन बारिश हो रही थी और पास की नदी में पानी धीरे-धीरे बढ़ रहा था. गांव वाले नदी के पानी पर नजर रख रहे थे. हमने घर छोड़ने की कोई तैयारी नहीं की थी. लेकिन रात करीब 11 बजे नदी से डरावनी आवाजें आने लगीं. मुझे अपने बच्चे की बहुत चिंता हो रही थी. पास के कुछ लोग घर खाली करने लगे थे. थोड़ी देर बाद पानी गांव में घुसने लगा तो हम रात को ही कुछ बर्तन और पहनने के कपड़े लेकर घर से निकल आए. पता नहीं फिर कब घर लौटेंगे."
जिला प्रशासन की तरफ से लोगों को सरकारी राहत सामग्री में लगभग दो किलो चावल, 250 ग्राम दाल, 200 ग्राम सरसों का तेल दिए जा रहे हैं. कई लोग अपने डूबते घर से बचाए गए राशन पर जीवित हैं. बाढ़ से बचकर जो लोग राहत शिविरों में आए है उनमें कई लोगों की तबीयत ठीक नहीं है.
राहत शिविर में बीमार लोगों को देखने आई डॉक्टर जेनिफा शबनम कहती है,"जिन बाढ़ पीड़ित लोगों को राहत शिविर में लाया गया है उन अधिकतर लोगों में बुखार,खाँसी जैसी शिकायत देखने को मिल रही है.कई लोगों के पैर में त्वचा संक्रमण हुआ है.शिविरों में छोटे बच्चे भी हैं. इसलिए पिछले कई दिनों चिकित्सकों की एक टीम राहत शिविरों में जाकर लोगों की जांच कर रही है और जो बीमार है उनकों दवाइयां दी जा रही है."
बीजेपी विधायक का दावा, भरपूर मदद कर रहे हैं
इलाके में बाढ़ से पैदा संकट पर सत्तारूढ़ बीजेपी के विधायक जीतू गोस्वामी कहते हैं,"इस बार अप्रत्याशित बारिश हुई है.इस तरह की बारिश पहले कभी नहीं हुई. नॉर्थ कछार हिल्स और कार्बी-आग्लोंग में जो वर्षा हुई उसने पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए. लिहाजा हमारे कामपुर इलाके के करीब सभी गांव बाढ़ की चपेट में आ गए. ''
वह कहते हैं, '' कई नदी बांध टूटने से गांवों में पानी घुस आया और इसे रोकना संभव नहीं है.लेकिन अब पानी का स्तर नीचे जा रहा है तो आने वाले तीन-चार दिन में स्थिति में सुधार हो सकता है. हमने करीब सात हजार लोगों को बाढ़ के पानी से सुरक्षित निकाला है. सरकार की तरफ से लोगों को राहत शिविरों में रखा गया है और जिन लोगों ने बाढ़ग्रस्त गांव में किसी ऊंची जगह शरण ले रखी है उन तक हम राशन पहुंचा रहे हैं."
बुकलुंग गांव के बाढ़ पीड़ित लोगों की शिकायत का जवाब देते हुए विधायक गोस्वामी कहते हैं कि उनकी टीम पूरे इलाके में घूम-घूम कर लोगों की मदद करने की कोशिश कर रही है.ऐसे में अगर किसी को कोई तकलीफ हुई है तो वे खुद जाकर पीड़ितों से बात करेंगे और उनकी मदद करेंगे.
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने कहा है कि उनकी सरकार बाढ़ प्रभावित लोगों की मदद करने और राहत उपाय करने के लिए चौबीसों घंटे काम कर रही है. सरकार के पास पर्याप्त खाद्य सामग्री मौजूद है. उन्होंने कहा कि बाढ़ से निपटने के लिए वायु सेना और सुरक्षाबलों के साथ ही एनडीआरएफ की टीम राज्य सरकार की लगातार मदद कर रही है.
वहीं असम के वन मंत्री परिमल सुकला बैद्य ने बताया कि काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान और अन्य वनांचल के जीवों को बचाने और राज्य में बाढ़ के दौरान उन्हें आश्रय प्रदान करने के लिए वैज्ञानिक रूप से डिजाइन किए गए 40 नए हाइलैंड्स का निर्माण किया गया है. सुकलाबैद्य ने कहा कि वन विभाग राज्य भर में काजीरंगा और अन्य राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों में जारी बाढ़ से जानवरों को बचाने के लिए "पूरी तैयारी" की स्थिति में है.
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क्या है बाढ़ की असली वजह?
असम में इस साल भारी बारिश और पहली चरण की भीषण बाढ़ को पारिस्थितिकी और पर्यावरण के जानकार जलवायु परिवर्तन के असर से जोड़ कर देख रहे हैं. हालांकि कुछ पर्यावरण वैज्ञानिकों का मानना है कि बिन शोध और आंकड़ों के मौजूदा हालात को जलवायु आपात स्थिति कहना सही नहीं होगा.
सिलचर स्थित असम विश्वविद्यालय में पारिस्थितिकी और पर्यावरण विज्ञान विभाग की प्रोफेसर जयश्री राउत ने असम में आई बाढ़ पर कहा,"इस बार यहां आई बाढ़ की स्थिति काफी गंभीर है और बारिश की आवृत्ति में काफी वृद्धि देखने को मिल रही है.लेकिन इसे सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन से जोड़ने से पहले यहां की प्रमुख नदियों के प्रबंधन से लेकर फॉरेस्ट कवर से जुड़ी बातों पर अध्ययन करने की जरूरत है.
उन्होंने कहा, '' हालांकि पिछले दिनों जिस कदर उत्तर भारत का तापमान असमान्य तौर पर बढ़ा है उसका असर यहां हो रही लगातार बारिश से हो सकता है. जंगलों की कटाई हो रही है जिससे नदियों में सिल्टेशन पहुंच रहा है और नदियों की आधार शक्ति कम हो रही है. खासकर नदियों के पास बड़े पेड़ो की कटाई पर रोक लगाने की जरूरत है. क्योंकि इन पेड़ों की जड़ों में पानी रोकने की क्षमता बहुत होती है."
प्रोफेसर राउत का कहना है कि न केवल तापमान बढ़ रहा है बल्कि नमी में भी इजाफा हो रहा है.बार-बार गर्मी की लहर बढ़ने से एक विशिष्ट क्षेत्र का तापमान बढ़ रहा है, लिहाजा वहां वाष्पीकरण ज्यादा होता है. इसके कारण बादल बनते हैं और भारी वर्षा की घटनाएं बढ़ जाती हैं.
वह कहती है कि पेड़ों की कटाई रोकनी होगी और उच्च तकनीकी हस्तक्षेप के जरिए प्रमुख नदियों का प्रबंधन करने से बाढ़ जैसी समस्या को नियंत्रित किया जा सकता है. हालांकि वो जलवायु परिवर्तन के असर को जानने के लिए अधिक रिसर्च करने की बात पर जोर देती हैं.
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