शराब केस में क्लीनचिट के बाद ‘पीड़ित’ की पॉलिटिक्स? कितनी मजबूत हुई केजरीवाल की कुर्सी, कांग्रेस क्यों बेचैन?
Arvind Kejriwal AAP Politics: दिल्ली की राजनीति में बड़ा उलटफेर उस वक्त देखने को मिला जब राउज एवेन्यू कोर्ट ने आबकारी नीति (शराब घोटाले) से जुड़े कथित भ्रष्टाचार मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया समेत 23 आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि सीबीआई आरोपों के समर्थन में ऐसा ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं कर सकी, जिससे मुकदमा चलाने लायक मामला बनता।
फैसले के बाद अदालत परिसर और आम आदमी पार्टी (AA) के दफ्तर में जश्न का माहौल दिखा। भावुक केजरीवाल ने कहा कि उनकी पूरी पूंजी ईमानदारी है और झूठे केस लगाकर उन्हें बदनाम किया गया। लेकिन कानूनी राहत से आगे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह फैसला सियासी जमीन पर भी असर डालेगा।

क्या धुल गए 'भ्रष्टाचार' के दाग? (AAP Political Impact)
आम आदमी पार्टी की राजनीति का आधार 'कट्टर ईमानदारी' की छवि रही है। 2013 में इसी नैरेटिव पर केजरीवाल ने दिल्ली की सत्ता तक पहुंचने का रास्ता बनाया था। लेकिन शराब नीति विवाद ने इसी नैतिक बढ़त को झटका दिया। पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी के कई बड़े चेहरे हार गए। खुद केजरीवाल, सिसोदिया, सौरभ भारद्वाज, सोमनाथ भारती और सत्येंद्र जैन तक को जनता का समर्थन नहीं मिला।
अब जब ट्रायल कोर्ट से राहत मिली है तो पार्टी इसे नैतिक जीत के रूप में पेश कर रही है। केजरीवाल ने तो यहां तक कह दिया कि अगर आज चुनाव करा दिए जाएं और बीजेपी 10 से ज्यादा सीटें जीत जाए तो वे राजनीति छोड़ देंगे। यह बयान बताता है कि वे इस फैसले को 'चुनावी संजीवनी' में बदलने की कोशिश करेंगे।

मनी लॉन्ड्रिंग केस पर क्या असर? (ED Case Angle)
सीबीआई केस से अलग प्रवर्तन निदेशालय ने मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया था। अब जब मूल भ्रष्टाचार केस में अदालत ने सबूतों को कमजोर माना है तो सवाल उठ रहा है कि क्या ईडी का केस टिक पाएगा। कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर बुनियादी आरोप ही अदालत में नहीं ठहरते तो मनी लॉन्ड्रिंग केस की जमीन भी हिल सकती है। हालांकि ईडी की जांच अलग आधार पर होती है, इसलिए अंतिम फैसला उच्च अदालतों में ही होगा।
आखिर दिल्ली शराब घोटाला मामला था क्या? (Delhi Excise Policy Case Explained)
दिल्ली की आबकारी नीति 2021-22 को आम आदमी पार्टी सरकार ने लाइसेंसिंग व्यवस्था में बदलाव के साथ लागू किया था। अगस्त 2022 में तत्कालीन उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना की शिकायत के बाद Central Bureau of Investigation ने एफआईआर दर्ज की। आरोप था कि नीति बनाते समय कुछ निजी शराब कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए लाइसेंस फीस घटाई गई और मुनाफे की मार्जिन तय की गई।
सीबीआई ने दावा किया कि टेंडर प्रक्रिया के बाद जानबूझकर खामियां छोड़ी गईं, जिससे चुनिंदा कंपनियों को लाभ मिला और सरकार को नुकसान हुआ। 23 लोगों को आरोपी बनाया गया।
लेकिन विशेष न्यायाधीश ने सुनवाई के बाद कहा कि अभियोजन पक्ष की कहानी ठोस साक्ष्यों पर आधारित नहीं है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि साजिश का सिद्धांत अनुमानों पर टिका था। यहां तक कि एक सरकारी अधिकारी को मुख्य आरोपी बनाए जाने पर विभागीय जांच की सिफारिश भी की गई।

अरविंद केजरीवाल के बरी होने से कांग्रेस क्यों असहज? (Congress Reaction)
दिल्ली कांग्रेस ने ही सबसे पहले 2022 में इस नीति पर सवाल उठाए थे। तब प्रदेश अध्यक्ष अनिल चौधरी ने सीबीआई जांच की मांग की थी। ऐसे में अब यू-टर्न लेना कांग्रेस के लिए आसान नहीं है।
हालांकि लोकसभा चुनाव से पहले जब केजरीवाल विपक्षी गठबंधन में शामिल हुए और उनकी गिरफ्तारी हुई तो कांग्रेस ने जांच एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए समर्थन दिया। रामलीला मैदान की रैली में सोनिया गांधी और राहुल गांधी भी मंच पर थे।
लेकिन विधानसभा चुनाव में गठबंधन टूट गया और राहुल गांधी ने खुलकर शराब घोटाले और सीएम आवास के मुद्दे उठाए। अब जब अदालत से राहत मिली है तो कांग्रेस के मीडिया प्रभारी पवन खेड़ा ने इसे बीजेपी से 'सांठगांठ' का परिणाम बताया।
कांग्रेस की चिंता साफ है। अगले साल पंजाब और गुजरात में चुनाव हैं। पंजाब में आम आदमी पार्टी सत्ता में है और कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल। गुजरात में भी कांग्रेस विपक्ष में है, लेकिन आप तेजी से जमीन बना रही है। अगर केजरीवाल सहानुभूति की लहर बना पाए तो सीधा नुकसान कांग्रेस को हो सकता है।

क्या बनेगा तीसरा मोर्चा? (National Politics Angle)
कांग्रेस के भीतर भी दो राय सामने आई है। मनीष तिवारी और मार्गरेट अल्वा जैसे नेताओं ने केजरीवाल को बधाई दी। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अगर केजरीवाल की 'दूसरी पारी' जम गई तो वे राष्ट्रीय स्तर पर तीसरे मोर्चे की धुरी बन सकते हैं।
राहुल गांधी इस समय विपक्ष का प्रमुख चेहरा हैं। लेकिन अगर केजरीवाल का ग्राफ बढ़ा तो विपक्षी राजनीति में संतुलन बदल सकता है। यही वजह है कि कांग्रेस की बेचैनी बढ़ी हुई दिखती है।
आगे क्या? (What Next)
फिलहाल ट्रायल कोर्ट का आदेश आम आदमी पार्टी के लिए मनोबल बढ़ाने वाला है। लेकिन सीबीआई अपील कर सकती है और ईडी का केस अभी जारी है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगा कि सभी दाग पूरी तरह धुल गए।
राजनीति में अंतिम फैसला जनता की अदालत करती है। अदालत के आदेश ने केजरीवाल को कानूनी राहत जरूर दी है, लेकिन क्या यह राहत वोटों में बदलेगी? क्या 'कट्टर ईमानदारी' की ब्रांडिंग दोबारा असर दिखाएगी? और क्या कांग्रेस की जमीन और खिसकेगी?
इन सवालों के जवाब आने वाले चुनाव देंगे। फिलहाल इतना तय है कि शराब नीति केस का यह फैसला दिल्ली से लेकर पंजाब और गुजरात तक की राजनीति में हलचल मचाने वाला साबित हो सकता है।
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