अन्ना-केजरीवाल: जब मकसद एक तो लोकपाल पर अलग क्यों?
रविवार को रालेगढ़ सिद्धि में जो कुछ भी हुआ है उससे साफ हो गया है कि जिस आंदोलन ने अन्ना-केजरीवाल को एक किया था वो ही आंदोलन आज दोनों की दूरियों का कारण है।
गौरतलब है कि अनशन के दौरान अन्ना हजारे ने कहा कि यदि जरूरी हो तो सरकार लोकपाल विधेयक को हंगामे के बीच भी पारित करे और बाद में संशोधन पेश करे। यदि कुछ पार्टियां व्यवधान पैदा कर रही हैं तो हंगामे में विधेयक पारित करें..कई विधेयक इस प्रकार के हंगामे में पारित किए जा चुके हैं। यदि जरूरत हो तो सरकार सत्र विस्तार करे।
मालूम हो कि अन्ना हजारे का यह बयान 'आप' पार्टी की प्रतिक्रिया पर आया था जिसमें कहा गया था कि कांग्रेस की ओर से लाया गया लोकपाल विधेयक से भ्रष्टाचार नहीं रुकेगा, बल्कि यह 'भ्रष्टाचारियों को संरक्षण' देगा।
अन्ना हजारे ने कहा, "मैंने विधेयक को पढ़ा है, शायद उन्होंने नहीं पढ़ा है।" केजरीवाल ने कहा था कि अन्ना को इसके प्रावधानों की जानकारी नहीं है।
अन्ना-केजरीवाल के अलग-अलग बयानों से साफ हो गया है कि दोनों के बीच में अब काफी दूरियां आ गयी हैं। कल तक सिद्धातों की लड़ाई साथ लड़ने वाले अन्ना-केजरीवाल आज तर्कों और उसूलों की लड़ाई लड़ रहे हैं। देखते हैं इस वर्चस्व की लड़ाई में किसकी जीत होती है।
फिलहाल सरकार की पूरजोर कोशिश है कि लोकपाल बिल पास हो जाये। मालूम हो कि लोकपाल विधेयक लोकसभा में पारित हो चुका है और राज्यसभा की प्रवर समिति ने उसमें काफी संशोधन किए, और शुक्रवार को इस विधेयक को बहस के लिए राज्यसभा में पेश किया गया।
राज्यसभा में विधेयक पारित हो जाने के बाद मंजूरी के लिए उसे लोकसभा में भेजा जाएगा। सरकार विधेयक को इसी सत्र में पारित करने के लिए वचनबद्ध है। संसद का शीतकालीन सत्र शुक्रवार को समाप्त हो रहा है।













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