Article 370: पुलवामा न होता तो फरवरी में ही इतिहास बन जाता, बड़ा खुलासा
नई दिल्ली- संविधान के अनुच्छेद 370 के खत्म किए जाने को लेकर सोमवार को एक बहुत बड़ा खुलासा हुआ है। जानकारी के मुताबिक मोदी सरकार ने लोकसभा चुनाव से पहले ही इसे खत्म करने की तैयारी कर ली थी, लेकिन उसी दौरान पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हमला हो गया, जिसके चलते सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़ गए।

फरवरी में ही हो चुकी थी तैयारी
द प्रिंट में छपी खबरों के मुताबिक गृहमंत्रालय के विश्वस्त सूत्रों ने माना है कि मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल के आखिरी दिनों में ही संविधान की धारा 370 को खत्म करने का फैसला कर लिया था। इसको लेकर तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह, तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ के बीच एक बैठक भी हुई थी और चुनावों के दौरान इसकी घोषणा होने वाली थी। गृहमंत्रालय सूत्रों के मुताबिक "चुनाव के पहले एक बड़ा ऐलान करने की योजना थी और आर्टिकल 370 और 35ए को हटाने की घोषणा का निर्णय ले लिया गया था।" उसने बताया कि जब पुलवामा हो गया तो सरकार को प्राथमिकता बदलनी पड़ी और सारा ध्यान बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक की ओर चला गया। जानकारी ये भी मिली है कि गृहमंत्रालय ने सोमवार को जो ड्राफ्ट राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा और इसको लेकर सरकार का बयान भी फरवरी में ही तैयार हो चुका था।

सही वक्त का इंतजार कर रही थी सरकार
गृहमंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक सरकार आर्टिकल 370 हटाने का निर्णय पहले ही कर चुकी थी, सिर्फ उसे सही वक्त का इंतजार था। दूसरे सूत्र की मानें तो सरकार ने पहले आर्टिकल 35ए हटाने का मन बनाया था, लेकिन बाद में पूरे आर्टिकल 370 हटाने का निर्णय कर लिया। एक तीसरे सूत्र के मुताबिक सत्ता में आते ही सरकार ने इसे हटाने के लिए 3-4 महीने की सीमा निर्धारित कर ली थी और संसद के सत्र के चलते इससे बेहतर मौका नहीं हो सकता था। तीसरे सूत्र के मुताबिक पीएम मोदी ने इसे निजी वादे की तरह लिया था और इसे खत्म करने की ठान चुके थे। इसी योजना के तहत गृहमंत्री बनने के महीने भर के अंदर अमित शाह ने कश्मीर का दौरान किया और उनके एक महीने बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल भी कश्मीर पहुंच गए। यह भी उसी योजना का हिस्सा है जब डोवाल दो दिवसीय दौरे से लौटे तो उसके बाद अर्धसैनिक बलों की कई कंपनियां वहां भेज दी गईं। इस कवायद में केंद्र सरकार ने कुछ पत्रकारों को भी वहां पर भेजा था।

राज्यसभा में बदली केमिस्ट्री का फायदा
लेकिन, अभी इतना बड़ा कदम उठाने के पीछे वजह राज्यसभा में बदली केमिस्ट्री को ही माना जा सकता है। क्योंकि, सदन में सरकार के पास बहुमत का अभाव है। माना जा रहा है कि सरकार की उम्मीद जगी थी, इसलिए संसद के सत्र को 26 जुलाई से बढ़ाकर 7 अगस्त तक कर दिया था। बीजेपी के एक सूत्र के मुताबिक राज्यसभा में विवादास्पद विधेयकों पर सरकार को कितना साथ मिलता है, इसके टेस्ट के लिए ही पहले आरटीआई (संशोधन), ट्रिपल तलाक और यूएपीए (संशोधन) बिल लाया गया। यानि जब ये सारे बिल सदन की अग्निपरीक्षा पास करने में कामयाब हो गए, तब मास्टरस्ट्रोक चलने की बारी आ गई। बीजेपी सूत्र के मुताबिक, "ये वो बिल थे जिसे सरकार पिछले कार्यकाल में राज्यसभा की बाधाओं के चलते पास नहीं करा सकी थी। हालांकि, इसबार हम तीनों को भारी विरोध और हंगामें के बावजूद पास कराने में सफल हुए।" बीजेपी सूत्र ने साफ कहा कि "निश्चित तौर पर वे टेस्ट केस की तरह या प्रयोग की तरह थे कि हम राज्यसभा में कहां टिकटे हैं और कितनी अच्छी तरह से हम अपने बिलों को बचा सकते हैं।" यानि इन बिलों के आसानी से पास होने के बाद सरकार का हौसला बढ़ा और 6 महीने देर से ही सही मोदी सरकार ने जैसा सोचा था और जो वादा किया था आर्टिकल 370 पर वैसा ही करके दिखा दिया।












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